सुबह- सुबह ही फोन आया था। दोनो पति- पत्नी जल्दी से अपनी गाड़ी में निकल पड़े।
‘‘एक महीने पहले ही माँ जी बेटी के घर गई थी।आज उनकी मौत पर जब उसने फोन करके वसीयत देखने को बुलाया है तो सब कुछ अपने ही नाम करवाया होगा न,” गाड़ी में मोनी बोल रही थी।
‘‘पर तुमने ही तो माँ को कहा कि वह बेटी के घर जाकर रहें। तुमने बीमारी में सेवा करने से इनकार किया था। ऐसे में वह बेटी के पास गई तो उसमें उसका क्या कुसूर?’’ गाड़ी चलाते हुए रोहन बोल रहा था।
‘‘हाँ, तो गलत क्या किया। बेटा- बेटी एक समान , सिर्फ कहने के लिए थोड़े ही होता। एक समान ही सेवा भी करनी चाहिए,’’ ‘मोनी ने तुनकते हुए कहा।
‘‘वसीयत में भी तो एक समान वाला नियम लागू होना चाहिए। फिर तुम्हे चिंता क्यों हो रही,’’ रोहन ने शांति से कहा।
‘‘सम्पत्ति पर तो बेटों का ही अधिकार होता है,” मोनी की यह दलील सुन रोहन चुप रह गया। उसे अपराधबोध हो रहा था कि जब बहन, माँ को ले जा रही थी तो उसने रोका क्यों नहीं। क्या वह पत्नी के तानों से डर गया था। माँ तो उसकी थी।
बहन के यहाँ संस्कार की सारी तैयारियाँ हो चुकी थीं। अर्थी पर माँ को देख रोहन एकबारगी भावविह्वल हो गया। वह उधर बढ़ा ही था कि बहन ने टोका, ‘‘भैया, पहले वसीयत सुन लो।”
‘‘इसमें सुनना क्या है, सबकुछ अपने नाम करवा लिया होगा तुमने,” मोनी झट से बोल पड़ी।
तबतक वकील साहब ने वसीयत पढ़ना शुरू किया।
मकान, गाड़ी, बैंक बैलेंस, सभी तरह की चल अचल संपत्ति रोहन के नाम किया गया था। यह सुनते ही मोना की आँखें चमक उठी। किन्तु रोहन की आँखे बुझ गयी और कुछ कहीं गहरे दंश बनकर चुभ गया जब वसीयत में उसने आगे माँ की अंतिम ख्वाहिश सुनी।
‘‘ मेरी मृत्यु के बाद मेरे शरीर को हाथ लगाने का अधिकार बेटा- बहू अर्थात रोहन या मोनी को नहीं होगा। मुखाग्नि का अधिकार मैं अपने नाती को सौंपती हूँ।”
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