जून 2026

देशअनकही     Posted: October 1, 2024

चलते हुए लड़के ने लड़की का हाथ पकड़ लिया।

वह झिझकी।

उसने हाथ छोड़ दिया। वे मौन चलते रहे।

“हम बहुत दिन के बाद मिल रहे हैं!”

“मन तो बहुत करता रहा पर समय ही नहीं निकाल पायी।”

“सब ठीक है न ?” लड़के ने पूछा

“हूँ” -उसने संक्षिप्त- सा उत्तर देते हुए कहा

वे चलते हुए पार्क के अंतिम छोर तक आ गए। ख़ाली बेंच देखकर लड़की ने बैठने का इशारा किया।

“आज बहुत थक गई हूँ।”

“तुमने घर में मेरे बारे में बात की या नहीं

“ना, नहीं कर नहीं पायी।”

“तुम मुझसे शादी करना तो चाहती हो न!”

लड़की ने भावुक होकर लड़के का हाथ पकड़ लिया-“मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ। तुम्हारे बिना रह नहीं

पाऊँगी।”

“मैं भी कहाँ रह पाऊँगा; पर मैंने अपने घर में सबको मना लिया है। उन्हें तुम्हारे विजातीय होने से कोई एतराज नहीं है।”

लड़की थोड़ी देर ख़ामोश बैठी रही। फिर बोली,“मैं घर से भागकर तुमसे शादी करने के लिए तैयार हूँ।”

लड़के ने लड़की का हाथ हटाते हुए कहा, “नहीं, प्रेम में स्वार्थ नहीं होता, आज प्रेम के लिए घर छोड़ोगी, कल

को—।”- कहते हुए वह रुक गया।

लड़की शाम के धुंधलके में लड़के की आँखों में देखकर उसकी बात को समझने की कोशिश करने लगी।

-0-

गतिविधियाँ

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

    रचनाएँ भेजने के लिए ई-मेल-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    केवल स्वीकृत रचनाओं की ही सूचना दी जाती है।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine