अनुवाद : अश्वनी कुमार
बर्फ में खोए हुए दो खोजकर्ता तीन कष्टदायक दिन बिताने के बाद एक परित्यक्त केबिन में शरण पाने में कामयाब रहे। अगले तीन दिनों के बाद, उनमें से एक की मृत्यु हो गई। जीवित बचे व्यक्ति ने केबिन से लगभग सौ मीटर की दूरी पर बर्फ में एक कब्र खोदी और उसके शरीर को दफना दिया। हालांकि, अगले दिन, जब वह अपनी भ पहली शांतिपूर्ण नींद से जगा, तो उसने उसे फिर से घर के अंदर मृत और बर्फ में परिवर्तित पाया, जो अपने बिस्तर के सामने एक सभ्य मेहमान की तरह बैठा हुआ था। उसने उसे फिर से दफनाया, शायद अधिक दूर की कब्र में, लेकिन जब वह अगले दिन उठा तो उसने उसे फिर से अपने बिस्तर के सामने बैठा हुआ पाया।
फिर उसका दिमाग खराब हो गया। उस समय उसके पास जो डायरी थी, उससे उसकी कहानी की सचाई जानी जा सकती है। इस रहस्य के संबंध में कई स्पष्टीकरणों में से यह सबसे अधिक विश्वसनीय प्रतीत होता है : जीवित व्यक्ति अपने अकेलेपन से इतना आहत हो चुका था कि उसने खुद ही सोते समय उस लाश को खोद कर निकाला था जिसे उसने जागते हुए दफनाया था !
( वागर्थ से साभार)