जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: April 1, 2025

1-दूध के दाम 

“सर इन्होंने भयंकर घपला किया है। पर्याप्त सबूत भी हैं।”

“………………..।”

“अनुमति हो तो इनका केस भी ई. डी . को सौंप दिया जाए।”

“फाइल तैयार करके मेरी टेबल पर पहुंचा दीजिए।”

“सर इनके संबंध सरकार में हमारे सहयोगी दल से हैं।”

“मैने कहा न कि आज शाम तक फाइल मेरी टेबल पर पहुँच जानी चाहिए ।”

“सर वे लोग सरकार से समर्थन वापस ले सकते हैं।”

“आप प्लीज वह कीजिए , जो आपसे कहा गया है।” 

“ठीक है सर।”

“जब तक फाइल टेबल पर पहुँचती, सारे खबरिया चैनलों पर खबर चल चुकी थी, सरकार अल्पमत में आ चुकी है; क्योंकि सहयोगी दल का आरोप है कि सरकार महँगाई पर नियंत्रण नहीं कर पा रही है, जबकि जनता महंगाई से त्रस्त है और सरकार ने दूध के दाम फिर से बढ़ा दिए हैं।”

-0-

2-माफीनामा 

“कोई और माल दिखाइए ?’’

“इसमें कोई कमी तो है नहीं, बिलकुल ताजा है।” 

“छोड़ो भाई। कोई बढ़िया माल हो तो दिखाइए।” 

“पैसे कुछ ज्यादा लगेंगे।”

“पैसों की चिंता मत कीजिए। बस माल में दम होना चाहिए।” 

“कितने साल तक की हो ?” 

“साल – वाल की बात नहीं है, बात मजे की है, वह आना चाहिए।” 

“खूबसूरती  वगैरह ?’’

“ठीक – ठीक हो पर स्लिम भरपूर होनी चाहिए । चेहरा मोहरा फोटोजनिक ही काफी है।”

“कोई और खास बात ?”

“हाँ ! अपना उसूल है कि माल अपनी बिरादरी का नहीं होना चाहिए।”

“तब तो थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा। खबर आ चुकी है। माल कल तक पहुँचेगा।”

“पल का भरोसा नहीं, तुम कल की बात कर रहे हो  मियाँ। इंतजार नामुमकिन है।”

“आज तो मुश्किल है जनाब।”

“अमाँ मन की सेज बेताबी से सजी है  थैली खुली हुई है। जितना चाहे निकाल लो। जो हाजिर है, उसे ही भेज दो। ऊपर वाले से माफ़ी माँग लेंगे।”

माल रवाना होते ही माफीनामा भी तैयार करवा दिया गया।

-0-

 3-अफीम 

“बिटिया ! तुम रिजाइन कर दो। मुझे तुम्हारी इस जाब की कोई जरूरत नहीं है।”

“यह कैसे हो सकता है , पापा ? यही तो वो वक्त है, जब यह तय होगा कि हम इन्सान हैं या इन्सान के रूप में जानवर हैं।”

“बिटिया, तुम्हारी जान या इज्जत ही न रही, तो कौन और कैसे तय होगा कि तुम इन्सान थीं या जानवर और फिर इज्जत से बढ़कर भी कुछ होता है क्या?’’

“पापा, आप यह क्या कह रहे हैं ? किसकी हिम्मत है जो आपकी बेटी की इज्जत के साथ खिलवाड़ कर सके? जहाँ तक जान  की बात है, तो वो तो कहीं भी और किसी भी प्रोफेशन में जा सकती है! “

“फिर भी बेटा ……..?”

“यह तो आज तक कभी नहीं हुआ कि जिन लोगों की जान बचाने के लिए तुम लोगों ने अपना जीवन दाँव पर लगा दिया हो, वही इतने अन्धें हो गए हों कि अस्पताल जैसी जगह पर बहन – बेटियों के सामने अपने सभी कपड़े उतार दें ?’’

“पापा ! आप चिंता न कीजिए । मैने जब इस प्रोफेशन को अपनाया था, तब ही तय कर लिया था कि यहाँ सभी तरह के मरीज मिलेंगें। सिर्फ लाचार और मजबूर ही नहीं, कुछ ऐसे भी हो सकते हैं, जो किसी अफीम के नशे के रोगी हों , निरे जानवरों जैसे …….जिन लोगों ने यह हरकत की है, उनका इलाज हर तरह से किया ही जा रहा है। सब ठीक हो जाएगा । आप ही तो कहा करते हैं कि इन्सान , इन्सान है या इन्सान के रूप में कुछ और , इस बात का पता  तब ही लग पाता है, जब कोई विपत्ति आती है।”

“पर इन लोगों ने तो इंसानियत की सारी सीमायें लाँघ दी हैं , ये इन्सान कहाँ रहे।”

“ये अफीम के रोगी हैं, पापा।’’

“कैसी अफीम ?’’

 ‘‘अभी आप नहीं समझेंगें। इन्हें बचपन से ही एक खास किसम की अफीम की आदत डाली गई है । इनका इलाज थोड़ा मुश्किल जरूर है पर इंसानियत को बचाने के लि यह करना तो पड़ेगा ही।”

पापा  ड्यूटी पर जाती आत्मविश्वास से लबरेज बेटी को स्नेह  से देखते रहे।

-0-

4- परिवर्तन 

“इस बार भी  वोटिंग बहुत कम हुई।”

“हाँ।”

“समझ में नहीं आता कि लोग फ्री में मिले अपने इस हक़ का भी इस्तमाल नहीं करना चाहते।”

“तू तो हर बार वोट करता है।”

“हाँ!”

“तू कभी नागा क्यों नहीं करता ?”

“क्यों का क्या मतलब है ? वोट देना मेरा हक़ है और फर्ज भी।”

“हक़ की बात तो समझ में आती है पर फर्ज किसलिए?’’

“वोट से सरकार के काम – काज का आकलन होता है, जो कैंडिडेट कामचोर या सिर्फ चोर होता है, उसे बदला जा सकता है। इससे हर कैंडिडेट के मन में  जनता का डर बना रहता है।”

“तू तो हर बार कहता रहता है कि नेता चोर हैं, लुटेरे हैं, देश और जनता को मूर्ख बनाते ही नहीं, उसे मूर्ख समझते भी हैं। तेरे वोट से तो कोई बदला नहीं।”

“मैं कोई झूठ थोड़े ही कहता हूं। मेरा वोट काम करता है। नतीजा आने दे,  देखना इस बार भी नेता बदल दिया जाएगा , पिछली बार की तरह।”

“नेता ही तो बदला जाएगा , उसका काम और मंशा  तो नहीं।”

उसे लगा बात सच- सी है। वह मायूस हो गया। उसे विचार आया, क्या इसीलिए लोग वोट देने के लिए नहीं निकलते ? खैर, नहीं निकलते तो न सही , वह तो निकलेगा और अपने कर्तव्य से कभी मुख नहीं मोड़ेगा।”

-0-

5-आखिरी  सफर 

                   तमतमाए चेहरे के साथ, वह धड़धड़ाता हुआ उनकी दहलीज लाँघ गया। दोपहर होने की वजह वहाँ इक्का- दुक्का लोग ही थे। वह गुस्से से इधर – उधर देखने लगा। 

         तभी अन्दर खाने से इदरीस मियाँ आते दिखाई दिए। उसने अपनी तैश पर बिना कोई लगाम लगाए सवाल किया, “मियाँ ! मौलवी साहब कहाँ हैं ?’’

                “अमाँ वक्त देख लो ? तीन बज चुके हैं। सुबह से यहीं थे, थोड़ी देर पहले ही अपने आरामगाह में गए हैं। आप चार बजे आइये, नमाज के बाद ही ताबीज मिल पाएगा।”

             “मुझे उनसे अभी मिलना है।”

           ‘‘यह क्या बचपना है ? सुबह पाँच बजे जग जाते हैं, उनको आराम की मोहलत का हक़ है या नहीं है।’’

               “मियाँ , मेरे भाई की जिंदगी का सवाल है। मेरा उनसे मिलना निहायत जरूरी है। भाईजान को कुछ हो गया तो सिर्फ उनके चार  छोटे- छोटे बच्चे ही नहीं, हम सब भी यतीम हो जाएँगें।”

            “तसल्ली रखो और ईमान पर यकीन भी, उन्हें कुछ नहीं होगा। इंशाअल्लाह, बड़ी जल्दी ठीक हो जायेंगें । हैं तो डाक्टरों की निगरानी में ही न ?”

                “डाक्टरों की निगरानी क्या करेगी ? मौलवी साहब ने आसमान की तरफ निगाहें फ़रमाकर जो तावीज दिया था, भाईजान ने उसे अपनी बाह में मुक़्क़मल बाँध रखा है। ताबीज देते वक्त उन्होंने कहा था कि यह ताबीज उन्हें शैतान की हर नजर से बचा लेगा। अब किसी दवा की जरूरत नहीं है, वे किसी डाक्टर के पास नहीं गए । भाईजान की हालत सुधरने की जगह बेहद बिगड़ गयी है।”

                “मियाँ ! आप तो बिला वजह घबरा रहे हैं। आपके भाई को कुछ नहीं होगा। बहरहाल अभी आप जाइए। तबियत न सुलझे तो शाम को आइए।”

                 “……………………. !” बातचीत का सिलसिला अभी चल ही रहा था कि एक बच्चा हाँफता हुआ आया और रोता हुआ बोला “चाचू ,  अम्मी बुला रही हैं ,अब्बू मर गए।”

          “यह तो बहुत बुरा हुआ मियाँ। पर अल्लाह की मर्जी के आगे हम सब बेबस हैं। जाइए अपने भाई की मैयत के आखिरी सफर का इंतजाम कीजिए।’’

    “और वह ताबीज ? वह क्या बेअसर है ?’’

    “मियाँ ,अल्लाह की मर्जी के आगे तो हम सब बेबस हैं।”

-0-

गतिविधियाँ

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

    रचनाएँ भेजने के लिए ई-मेल-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    केवल स्वीकृत रचनाओं की ही सूचना दी जाती है।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine