जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: May 1, 2025

1-उदय

नारा लगाती और मुट्ठियाँ भांजती भीड़ अचानक ठिठककर रुक गई। कुछ ही दूरी पर बन्दूक संभाले सिपाहियों की कतारें थीं और उनका सरगना एक मैजिस्ट्रेट ध्वनि-विस्तारक यन्त्र के माध्यम से आगे न बढ़ने की चेतावनी बार-बार दुहरा रहा था ।
तभी एक व्यक्ति भीड़ को चीरता हुआ आगे आया और ठिठकी खड़ी भीड़ को अपने उत्तेजक नारों से आगे बढ़ने को उकसाने लगा। भीड़ अनियन्त्रित हो उठी और उस व्यक्ति के नारे लगाकर दो कदम आगे बढ़ते ही, भीड़ उससे आगे दौड़ पड़ी । वह व्यक्ति वहीं थम गया और आगे बढ़ते लोगों की पीठ पर अपने उत्तेजक नारों की थपकियाँ देता रहा।
और फिर तड़तड़तड़ा-तड़तड़तड़ की गूंज से वातावरण दहल उठा। थोड़ी देर में भागते लोगों की चीख-पुकारें विभिन्न दिशाओं में शनैःशनै खो गई।
अगले दिन के सभी समाचार-पत्रों में भले ही मरने वालों अथवा घायलों के आंकड़ों में भिन्नता रही हो, किन्तु सभी ने एकमत से उस व्यक्ति के नेतृत्व की भूरि-भरि प्रशंसा की थी ।

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2-भिखारी का धर्म

“अल्लाह के नाम पर कुछ मिल जाए बेटा ! मालिक तेरा घर रोशन और आबाद रखेंगे ! खुदा तुम्हें बरकतें देगा बेटा ! इस भूखे पर भी रहम खा ।”
भिखारी की आवाज जब काफी देर तक गूँजती रही तो झुँझलाता हुआ घर का नौकर बाहर निकला और डपटते हुए बोला, “ये हिन्दू का घर है बाबा ! यहां अल्लाह के नाम से कुछ निकलने वाला नहीं ।”
“बेटा ! बड़ी जोरों से भूख लगी है। पांच दरवाज़ों पर दस्तकें दे चुका हूँ पर कोई नहीं सुनता । अगर ‘भगवान’ के नाम पर ही कुछ मिल जाए तो ले आओ । बड़ी मेहरबानी होगी।”
“अच्छा बाबा ! तुम यहीं ठहरो, मैं अन्दर जाकर मालकिन को बोलता हूँ।” नौकर के अन्दर जाते ही भिखारी बुदबुदाया, “भला भिखारी का भी कोई धर्म होता है ? ये सब तो पैसे वालों के चोंचले हैं।” इसके साथ ही वह भिखारी वहीं फर्श पर बैठ गया और लम्बी-लम्बी सांसें लेने लगा-मानो अपने ऊपर से कोई बहुत बड़ा बोझ उतार फेंका हो उसने ।

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4-तमाचे
बी० डी० ओ० साहब की जीप जैसे ही प्रखण्ड कार्यालय के सामने रुकी, रामदीन का इण्टर फेल बेटा सूरज प्रकाश हाथ जोड़कर सामने आ खड़ा हुआ “सर आपके पास पिछले एक वर्ष से ‘लोन’ के वास्ते दौड़ रहा हूँ, यदि हुजूर कृपा कर दें, तो मैं भी एक छोटा-मोटा व्यवसाय कर…।”

“हुंह ! अभी ऑफिस में कदम रखा भी नहीं और भिखमंगों की फरियाद शुरू हो गई। बोल तो तेरा बाप क्या करता है ?”
“जी वो चौराहे पर जूते-चप्पलों की मरम्मत करते हैं।”
“तो फिर तुझे व्यवसाय करने की क्यों सूझी ? जाकर बाप का हाथ क्यों नहीं  बँटाता ? बड़ा आया है व्यवसाय करने वाला हुँह !”
“लेकिन सर, मैंने तो सुना है कि आपके पिताजी एक किसान हैं ! फिर आपने भी खेती-बाड़ी क्यों नहीं की ?”
बी० डी० ओ० साहब को लगा मानो सूरज प्रकाश के मुख से शब्द नहीं बल्कि तमाचे निकल रहे हों । उनका चेहरा इन तमाचों के आघात से रक्ताभ हो उठा था ।

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4-दफ्तर का कैरेक्टर

नए-नए पद-स्थापित बड़े साहब से मिलने कुछ विभागीय कर्मचारी आए । पता चला कि साहब अभी व्यस्त हैं, अतः वे लोग दफ्तर के बड़े बाबू से गपशप करने लगे। बातों के क्रम में ही बड़े बाबू ने कहा, “इस बार के साहिब बहुत ‘कैरेक्टर’ वाले आए हैं। अवगुण तो कोई है ही नहीं। मांस मछली, दारू-सिगरेट आदि की तो बात ही छोड़ दीजिए, लहसुन-प्याज और पान-सुपारी तक नहीं छूते हैं।”

“अरे बड़े बाबू ! इन सब बातों से भला हम लोगों को क्या फायदा ? सुना है कि ‘घूस’ तो जमकर खाते हैं।”
किसी कर्मचारी की इस टिप्पणी में अन्य सभी कर्मचारियों के सिर सहमति के स्वर में हिलने लगे- “ठीक कहते हो भाई ! हमें क्या फायदा ?”

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5-खिलाफ हवा के गुज़रते हुए

वह मजदूर दिन-भर धूप में बैठा रोड़े तोड़ता रहा। सामने ही ठेकेदार का बंगला भी था । ठेकेदार साहब पूरे दिन में मात्र एक बार पांच मिनट के लिए आए और उसे ढाढ़स बँधाकर तथा मौसम को दो-चार गालियाँ सुनाकर अपने वातानुकूलित कमरे में घुस गए ।
रात्रि में गर्मी और मच्छरों को झेलते हुए उसने किसी तरह विश्राम की अवधि समाप्त की और सुबह बासी निगलकर पुनः काम पर आ डटा ।
सात दिनों तक यही क्रम चला। आठवें दिन उसके काम की मापी लेने ठेकेदार का मुंशी आया और उसने बगैर मापी वगैरह किए चन्द रुपये उसे पकड़ाने चाहे ।

उसे लगा मानो उसके रोमकूपों से पसीने की जगह लहू टपक पड़ेगा। बड़ी मुश्किल से अपने को जब्त कर उसने फरियाद ठेकेदार तक पहुंचाई। जवाब मिला, “मुंशी जी ! इसे दस रुपये और दे दीजिए ! वैसे भी गर्मी काफी पड़ रही है।”
मजदूर ने पैसे तो रख लिए; किन्तु उसके अन्दर का शोला-सा भड़क उठा था जिसे शमित करने के वास्ते वह कच्ची शराब की भट्टी पर जा पहुंचा। किन्तु देर रात गए घर लौटते वक्त उसका वह आक्रोश और भी मुखर हो उठा और ठेकेदार की मां-बहनों की लानत-मलानत करते शब्दों के रूप में गुंजित होने लगा। ठेकेदार के घर के पास से गुजरते हुए अचानक उसकी जुबान की जगह उसके हाथ चलने लगे और जब तक नौकर-चाकर उसे धरें-पकड़ें, तब तक बीस-पच्चीम गुंडों ने ठेकेदार महोदय के आलीशान बंगले के काँच की खिड़कियों व दरवाजों की मान मर्यादा अच्छी तरह भंग कर दी थी।
कुछ ही घण्टों के उपरान्त वह हवालात में था और फिर चन्द जरूरी प्रक्रियाओं पर जबरन अपना अंगूठा लगाते-लगाते वह जेल आ पहुंचा।

जेल में भी उसे गिट्टियाँ तोड़ने का ही काम मिला। रात में खाने के समय जब सूखी-जली रोटियों के साथ पनियाली दाल से उसका साबका हुआ तो उसे लगा मानो फिर किसी ने उसकी मज़दूरी पर डाका डाला हो। उसके होंठ भिच गए और खाने की थाली हाथ में लिये-लिये ही वह डिप्टी जेलर के कमरे में घुस गया ।

डिप्टी जेलर ने उसकी बातें सुनकर वार्डन की तरफ व्यंग्य भरी नजरों से देखते हुए कहा, “अरे इसे एक-आध टुकड़ा प्याज भी दे दिया करो ! खाने-पीने का शौकीन मालूम पड़ता है पट्ठा।”

अपनी आंखों में उतर आए लहू के बावजूद उसने देख लिया कि उसके सामने डिप्टी जेलर नहीं; बल्कि वर्दी-पेटी कसे कोई ठेकेदार ही खड़ा है और फिर किस तरह उसके हाथ की थाली हवा में उछली और डिप्टी जेलर के माथे पर लगी, उसे कुछ याद नहीं।

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6-उत्तराधिकारी

उस व्यक्ति के बारे में लोगों का यही कहना है कि उसके आगे-पीछे अनैतिक कमाई रूपी खून का कतरा हमेशा बहता रहा किन्तु उसकी निजी स्वार्थ रूपी मक्खियाँ उन पर कभी न भिनभिनाई ।

जिन्दगी में पूरे पच्चीस वर्षों तक ‘मजिस्ट्रेट’ के रूप में कार्यरत वह व्यक्ति आज भी एक कायदे के घर में रहने को तरसता है और इसी अभाव में पूरे बीस वर्षों तक आंखों में कई सपनों के सच होने की आस लिए उसके सुख-दुःख की साथी उसकी जीवन-सहचरी भी पिछले दिनों गुजर गई।

इस घटना के लगभग दो सप्ताह बाद मजिस्ट्रेट साहब से मेरी मुलाकात हुई। उस समय वे अपने दो बेटों और एकमात्र बेटी के साथ शोकपूर्ण मुद्रा में बैठे थे । बातचीत के क्रम में ही उन्होंने कहा, “वो थीं तो सीमित आमदनी में भी घर अच्छी तरह चला लेती थीं, अब तो इस घर का भगवान ही मालिक है !”

तभी बड़े बेटे ने टोकते हुए कहा, “पापा ! आप भी अपना दिमाग बेकार के पचड़े मे ही उलझाते हैं ! अरे इसमें परेशानी ही क्या है? आप चाहें तो महीने में हजारों रुपये ‘ऊपर’ से कमा सकते हैं।”

“हां पापा ! अब यह जिद छोड़िए ! और फिर अब आपको टोकने वाली मां भी तो नहीं रही।” छोटे बेटे ने बादशाह पर एक्का मारा ।

पिता अन्दर से बिखरने-बिखरने को ही थे कि तब तक उनकी बेटी ने उन्हें सम्भाल लिया। उसने पिता का हाथ स्नेहपूर्वक सहलाते हुए कहा, “आप कुछ भी फिजूल मत सोचिए ! मैं हूँ न घर में ! मैं सबकुछ पूर्ववत् ही संभाल लूंगी।”

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7-सत्य की तलाश में

मैं जिन्दगी भर उसे तलाशता रहा किन्तु वह कहीं न मिला। बड़ी इच्छा थी मेरी उसे देखने की, दो बातें करने की; किन्तु जनता दरबार से लेकर राजदरबारों तक, न्यायालयों से लेकर विद्यालयों तक, हर जगह चक्कर लगाने के बावजूद मुझे उसके दर्शन कहीं न हो सके ।
एक दिन मैं शहर के जन-शून्य इलाके में घूम रहा था। काफी आगे निकल जाने पर एक वृक्ष की छांव तले एक बूढ़े को निविकार भाव से लेटे हुए पाया ।उसके झुरियों से भरे चेहरे के बीच धंसी उसकी उदास पथरीली किन्तु चमकीली आंखें तथा हाथों पर तैर रही हल्की विद्रूपतापूर्ण मुस्कान के सम्मिश्रण ने उसके समग्र व्यक्तित्व को कुछ ऐसा बना दिया था कि मेरा रोम-रोम झनझना उठा।

मैंने हिम्मत बांधकर पूछा, “बाबा ! आप कौन हैं ?”
जवाब मिला, “सत्य ।”
मेरे अन्तर्मन ने कहा, ‘बिल्कुल असत्य ! भला सत्य इस प्रकार निरीह और उपेक्षित अवस्था में रह सकता है। मर नहीं जाएगा वो ?’
अगले दिन मैं भ्रष्टाचार निरोध विभाग में घूम रहा था ।

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