पहले के जमाने में बच्चों के स्कूल की छुट्टियाँ होते ही ननिहाल जाना एक रिवाज़ -सा था। ननिहाल के संयुक्त परिवार में बहुत सारे सदस्य होते। ममेरे, मौसेरे बहन- भाई सब मिल धमाल मचाते। बड़े लोगों के हथाइयों (गप्प-शप) के दौर चलते।
एक छोटे नाना थे। मुझे उनकी क़िस्सागोई में विशेष आनन्द मिलता। वे पशुपालन करते थे। वे बहुत बार अपने पशु भेड़े, गाएँ, ऊँट आदि को मेलों में खरीद फ़रोख्त के सिलसिले में ले जाते। बहुत बार चरावन के लिए रेवड़ (पशुओं) को लेकर राजस्थान से बाहर हरियाणा, पंजाब भी जाते।
बाहर के लोगों के रहन-सहन, फसलों, पशुओं, जगहों आदि के बारे में उनके पास ख़ास जानकारी मिलती, जो कि अन्य कहीं से नहीं मिलती। फिर उनका सुनाने का तरीका भी लुभावना होता।
रात होते ही चबूतरे पर हथाई की महफ़िल जम जाती। चमकते तारों से भरा आसमान, मीठी सी बयार और छिटकी हुई चाँदनी और रह-रहकर उठते ठहाके।
महफ़िल बिखरती न देखकर, नानी वहीं सबको खाने की थालियाँ भी ला देतीं। सीधी-साधी सब्जी, दाल रोटी अमृत का-सा स्वाद देती; परन्तु छोटे नाना के मुँह से कभी भोजन की तारीफ़ न निकलती। ऐसा नहीं था कि वे बहुत नखरेबाज थे; लेकिन हर बार कुछ न कुछ कमी बताकर वे फिर अपने क़िस्से सुनाने लग जाते। सब्जी तो हमने वहाँ बनाई थी, वैसी सब्जी कोई नहीं बना सकता। कभी दाल में नमक कम या तीखे की शिकायत करते, कहते- दाल तो हमारे फलाँ साथी जैसी कोई नहीं बना सकता। उनकी इस तुनकमिनजी पर मुझे चिढ़ होती। पर नानी एक शब्द भी न कहती।
एक दिन मैंने नानी से पूछ ही लिया- ‘‘नानी ये छोटे नाना हरदम ही खाने में कमी क्यों निकालते हैं? इतनी स्वाद दाल भी इनको पसन्द नहीं आती। आप कुछ कहती क्यों नहीं? रेवड़ को चराते हुए ऐसा क्या पकाते होंगे कि इनको ये खाना भी स्वाद नहीं लगता। ऐसा ही जादू है इनके हाथों में, तो हमें भी एक दिन पकाकर खिलाएँ न, हमें भी तो पता चले।’’
मेरा रोष देखकर नानी को हँसी आ गई। नानी ने समझाया कि नाना रेवड़ को चरावन के लिए जब ले जाते हैं, तो वहाँ इतनी कम सुविधाओं में गुजर बसर करनी होती है कि साधारण खाना भी बहुत स्वाद लगता है। खुले आसमान तले पशुओं को बिठाकर निगरानी रखनी होती व कहीं भी अस्थायी चूल्हा बनाकर बाजरे की रोटी बना लेते। साग-सब्जी की सुविधा न होती, तो मिर्ची छोंककर ही खा लेते। बकरी का दूध गर्म कर उसमें रोटी डूबाकर खा लेते। खूब मेहनत से बहुत अच्छी भूख लगती जिससे खाना बहुत स्वाद लगता।
“तो वे जब घर के खाने में कमी निकालते हैं, आपको बुरा नहीं लगता?’’ मेरा सवाल सुन नानी के होठों पर मधुर स्मित तैर गई।
उनका कहना था कि बुरा क्या मानना, वो कमी थोड़े ही निकालते हैं, वो तो अपने अनुभव बताते हैं, वो हमें नहीं बताएँगे तो किसे बताएँगे।
-0-