शेखर बाबू की पदोन्नति पिछले कई वर्षों से रुकी हुई थी। लेकिन एक दिन करिश्मा कुछ ऐसा हुआ कि उन्हें सिर्फ पदोन्नति ही नहीं मिली, स्थिति पीड़ित होने के कारण लिफ्ट देकर आफिस सुपरिटेंडेंट भी बना दिया गया।
लेकिन साल बीतते-न-बीतते उन्हें ऐसा लगा कि वह जाने कैसी एक गीली चिपचिपी अंधी सुरंग में धँसते जा रहे हैं, धँसते जा रहे हैं। और उनकी पत्नी उनके कंधे पर दोनों पाँव रखे अपना पूरा बोझ डाले है।
उस रात शेखर बाबू की पत्नी कुछ ज़्यादा देर से लौटी। किसी की कार उसे पहुँचा गई थी। शेखर बाबू ने स्पष्ट देखा कि पत्नी के पाँव लड़खड़ा रहे हैं। उसने पी रखी है।
शेखर बाबू तिलमिला कर बोले- “तो अब तुम यहाँ तक पहुँच गई हो?”
पत्नी ने पति की तिलमिलाहट को वक्र दृष्टि से देखा। बोली-“कहाँ तक पहुँची हूँ, बोलो ! तुमने अपने कैरियर में ऊपर चढ़ने के लिए मुझे सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया और अब, जब मैं अपने कैरियर के लिए खुद अपने को इस्तेमाल कर रही हूँ, तो…”
शेखर बाबू को लगा कि वह एक मछली है और उनके गले में काँटा फँसा है।