सात दिनों से दीनानाथ जी डॉक्टर के आदेशानुसार रोजाना अस्पताल आ रहे थे। दरअसल सेवानिवृत्ति के कुछ दिनों पश्चात् ही दीनानाथ जी को कई व्याधियों ने आ घेरा। कभी दिल की धड़कन तेज हो जाती, तो कभी हाथ पैर ठंडे से हो जाते, तो कभी सिर में भारीपन महसूस होता। कई डॉक्टरों के पास चक्कर लगा चुके थे। जिन्होंने कई टेस्ट भी करवाए थे, पर बीमारी का कुछ पता नहीं चल पा रहा था। अंत में किसी की सलाह पर वे इस अस्पताल में आए थे। डॉक्टर ने उनका चेकअप करने के पश्चात् कहा, “दीनानाथ जी, आपको आठ- दस दिनों तक रोज अस्पताल आना पड़ेगा, ताकि मैं आपके स्वास्थ्य पर नजर रख सकूँ।” दीनानाथ जी ने हामी भर दी।
तत्पश्चात् डॉक्टर उन्हें अपने साथ अस्पताल के राउंड पर ले गए। चार-पाँच मरीजों से मुलाकात करवाने के बाद डॉक्टर ने दीनानाथ जी से कहा ,”आप इन लोगों से बातें करें, तब तक मैं आईसीयू में अन्य मरीजों को देख लेता हूँ। वहाँ गंभीर रूप से बीमार मरीज रहते हैं; इसीलिए किसी को भी अंदर आने की इजाजत नहीं होती है।”
दीनानाथ जी मरीजों से बातचीत करने लगे। बातें करते हुए उन्हें वक्त का पता ही नहीं चला कि कितना वक्त निकल गया। अब तो यह सिलसिला हर रोज का हो गया। दीनानाथ जी अस्पताल आते, तो डॉक्टर उनसे उनका हाल-चाल पूछकर मरीजों के पास भेज देते। दीनानाथ जी भी जब तक मरीजों का हाल चाल नहीं पूछते, उन्हें चैन न मिलता। कभी किसी के लिए पानी ले आते, तो कभी दवाइयाँ। इसी बहाने सीढ़ियों पर चढ़ना-उतरना भी लगा रहता, जिससे उनका व्यायाम भी हो जाता। अस्पताल में मरीजों, उनके रिश्तेदारों और नर्सों के बीच रहकर उन्हें अकेलापन भी नहीं लगता था। कुछ मरीज ऐसे भी थे, जिनके रिश्तेदार अपनी व्यस्तता के कारण उनके पास ज्यादा समय तक नहीं रह पाते थे। उन मरीजों को भी दीनानाथ जी का साथ मिलने से राहत महसूस होती थी।
आज आठवें दिन डॉक्टर ने दीनानाथ जी को अपनी चेंबर में बुलाया और पूछा, “अब कैसा लग रहा है आपको?” अब तक तो दीनानाथ जी अपनी सारी बीमारियों को भूल चुके थे। उनकी सारी तकलीफें गायब हो चुकी थीं। उन्होंने हकलाते हुए कहा, “मैं …मैं… बिल्कुल ठीक हूँ। मुझे क्या हुआ है?” इसी के साथ डॉक्टर हँसने लगे और कहा, “मैं भी तो यही कह रहा हूँ दीनानाथ जी कि आपको कुछ नहीं हुआ है। आप पहले भी स्वस्थ थे और अब भी स्वस्थ हैं। आपके रिपोर्ट्स भी यही कह रहे हैं।”
“तो …तो… फिर मुझे वह चक्कर … और वो सारे लक्षण… बेवजह थे?” दीनानाथ जी ने सकपकाते हुए डॉक्टर से पूछा।
“वह सब आपके अकेलेपन की वजह से थे। अब आप यहाँ व्यस्त रहते हैं, लोगों से बातचीत करते हैं, तो आपके दिमाग में फालतू बातों के लिए कोई जगह नहीं बचती। आप एक काम कीजिए- मेरे थेरेपी सेंटर के लिए मुझे एक सहायक की जरूरत है। अगर आप उचित समझें तो वर्तमान ट्रेनर से कुछ ट्रेनिंग लेकर वहाँ काम शुरू कर दीजिए। आपके अकेलेपन की समस्या का निदान हो जाएगा और मैं भी किसी सहायक को ढूँढने के परिश्रम से बच जाऊँगा” डॉक्टर ने हँसते हुए कहा।
दीनानाथ जी को डॉक्टर की यह सलाह बेहद पसंद आई। उन्होंने डॉक्टर साहब के प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया। वे उन डॉक्टर के समक्ष नतमस्तक थे, जिन्होंने अपनी सूझबूझ से उन्हें उनकी बीमारी का कारण समझा दिया, जिसे बातों से समझाने से शायद ही वे कभी समझ पाते।
-0-नमिता सिंह ‘आराधना’, बी.401, सानिध्य रॉयल 100 फीट त्रागड़ रोड,न्यू चाँदखेड़ा अहमदाबाद, गुजरात-382470