1-गुनाहों का हिसाब
जिस दिन का वह क़ब्र में पड़े-पड़े बरसों से इन्तज़ार कर रहा था आख़िर वह आ ही गया। मुर्दे जी उठे। लोगों से ठसाठस भरे मैदान में पॉल ने अपनी नज़रें दौड़ाईं। हर तरफ़ बस एक ही सवाल तैर रहा था, “किसे जन्नत नसीब होगी और किसे दोज़ख़?” हालाँकि यह सवाल पॉल के लिए, जिसने जीवन में एक मच्छर भी नहीं मारा, उतना कठिन नहीं था।
धोखेबाज़ विक्टर पुल के पास खड़े होकर सिगरेट के कश लगा रहा था। विक्टर ने अनगिनत अपराध किए थे, उन्हीं में से एक पॉल की संपत्ति और उसकी प्रेमिका जेसिका को धोखे से हथियाना भी था। “तुम्हें मैंने अपने भाई की तरह माना विक्टर और तुम्हीं ने मुझसे…”हमेशा की तरह अपनी कुटिल मुस्कान बिखेरकर विक्टर ख़ामोश था। “मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था जेसिका कि तुम मेरे साथ ऐसा करोगी।” पॉल को जेसिका से, जिसने विक्टर की तरह ही पॉल को धोखा दिया था, बेपनाह मुहब्बत थी।
धीरे-धीरे लोगों ने न्याय के पुल पर चढ़ना शुरू किया। इससे पहले कि विक्टर की सिगरेट ख़त्म होती जेसिका उसके पास थी। उसने विक्टर के होठों से सिगरेट को लेकर अपने होठों से लगाया और फिर पॉल की तरफ़ देखा। अब तक विक्टर के हाथों में जेसिका का हाथ आ चुका था। दोनों न्याय के पुल की तरफ़ चल दिए। आजीवन सबकुछ चुपचाप सहने वाला पॉल आशान्वित था, ‘आज तो इनके गुनाहों का हिसाब होगा ही।’
मगर विक्टर और जेसिका, जिन्हें पुल के बीच में ही गिरकर नरक पहुँच जाना था, पुल पारकर चुके थे। पॉल हैरान था। ‘ये पापी स्वर्ग कैसे पहुँच सकते हैं?’
थोड़ी ही देर में दुनिया भर के प्रसिद्ध लुटेरे, बलात्कारी, बड़े-बड़े भ्रष्टाचारी और सामूहिक हत्यारे, सभी के सभी पुल पार थे। “असम्भव! यह कैसे हो सकता है?” पॉल ने अपना पसीना पोंछते हुए कहा।
मैदान में खड़े बाक़ी लोग भी हतप्रभ थे। वे डर के मारे पुल से दूर भागने लगे। तभी कुछ अजीब से लोग वहाँ आए और लोगों को पकड़-पकड़कर पुल पर ले जाने लगे। पसीने से तर-ब-तर पॉल सोच रहा था कि जब उसने कोई ग़लत काम किया ही नहीं तो वह दोज़ख़ में कैसे जाएगा।
फ़रिश्तों ने पॉल को उठाया और पुल के बीच में ले जाकर छोड़ दिया। पॉल ने जैसे ही पहला क़दम बढ़ाया, वह पुल के नीचे था। इससे पहले कि नरक की आग उसे पूरी तरह झुलसाती, वह ज़ोर से चीख़ा, ‘‘यह दुनिया ईश्वर ने नहीं शैतान ने बनाई है।’’
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2-विद्वत्ता के पैमाने
एथेन्स के प्रसिद्ध चौराहे पर सुकरात जोकर बनकर खड़ा था। जो भी आता उसके ठिगने कद, चपटी नाक, मैले-कुचैले पुराने कपड़े, निकली हुई तोंद और नंगे पैर को देखकर हँसे बिना न रह पाता। “कौन हो तुम?” भीड़ में से किसी ने पूछा।
“एक दार्शनिक।” उसे लगा कि नाम बताने की अपेक्षा यदि वह दार्शनिक कहेगा, तो लोग उसे कुछ गंभीरता से लेंगे मगर वह गलत था। चौराहा एक बार पुनः ठहाकों से गूँज उठा।
“वो देखो, दार्शनिक उन्हें कहते हैं।” विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर्स को बाहर आते देख एक छात्र ने उनकी तरफ़ इशारा करते हुए कहा।
कोट-पैण्ट और टाई पहने हुए उन सभी प्रोफेसर्स के हाथ में एक ब्रीफ़केस था। भीड़ देखकर वो भी उधर ही आ गये। उस छात्र ने पुनः कहा, “सर! ये पागल अपने को दार्शनिक कहता है।”
प्रोफेसर्स ने उस बदसूरत आदमी को ऊपर से नीचे तक देखा और समवेत स्वर में पूछा, “किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं आप?’’
“नहीं।” प्रोफेसर्स ने पुनः सवाल पूछा, “तो क्या किसी अन्य शैक्षिक संस्थान से जुड़े हैं?”
जवाब फिर से वही था इसलिए सवाल एक बार और पूछा गया, “आपने कोई किताब या शोध-पत्र आदि लिखा है? किसी कॉन्फ्रेन्स में गये हैं? कितने सेमिनार अटेण्ड किया है?”
ऐसे भारी-भरकम शब्द सुनकर उसका दिमाग चकराने लगा। किसी तरह ख़ुद को संभालते हुए उसने कहा, “एक भी नहीं।”
प्रोफेसर्स समझ गये कि यह किसी काम का आदमी नहीं है इसलिए वो थोड़ा पीछे हट गये। मगर उस लम्बे कद के प्रोफेसर को अभी भी उम्मीद थी। उसने अपनी टाई को ठीक किया और झुकते हुए पूछा, “तुमने कहीं से पी-एच०डी० तो की होगी?”
बार-बार न कहने से अब उसे शर्म महसूस हो रही थी। उसका दिल किया कि इस बार वह हाँ कह दे मगर “नहीं” ही कह पाया। एक बार फिर सब ठहाके मार-मार के हँसने लगे।
अन्ततः एक आख़िरी टिप्पणी सबसे वृद्ध प्रोफेसर ने की, “तुम विद्वता के किसी भी पैमाने पर ख़रे नहीं उतरते। तुम दार्शनिक हो ही नहीं सकते।”
उसका दिल टूट गया। वह पूरी तरह निराश हो चुका था। इतने सालों में पहली बार उसकी नज़र अपने गन्दे कपड़ों और नंगे पाँव पर गई। उसने प्रोफेसर्स के चमचमाते सूट-बूट को देखा और फिर अपना सर झुकाकर चुपचाप वहाँ से चला गया।
वह थोड़ी ही दूर गया होगा कि अचानक उसके अन्दर से आवाज़ आई, “मैं सिर्फ़ एक ही बात जानता हूँ कि मैं कुछ भी नहीं जानता हूँ।” उसने पलटकर देखा, भीड़ अब भी उसकी तरफ़ हाथ दिखाकर हँस रही थी।
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3-मरीचिका
‘‘प्यार से कोई आदमी कैसे डर सकता है?’’ यही वो सवाल था जिसने उसे उस पागल को केस स्टडी बनाने पर मजबूर कर दिया। जब वह पहली बार उससे मिली तो वो ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ था; कभी ज़ोर-ज़ोर से चीखता तो कभी गाना गाता और कभी चुपचाप बैठकर रोने लगता।
उसने अपनी गाड़ी रोकी और गुलाब का एक फूल ख़रीदा। फिर उसे डैशबोर्ड के ऊपर रखी किताब पर रखा और पुनः ड्राइव करने लगी।
‘‘आपने इससे प्यार से बात क्यों की मैडम? मैंने बताया था न कि ये भड़क जाता है। इससे ऊँची आवाज़ में बात कीजिए, इस पर चिल्लाइए, झल्लाइए, गाली दीजिए पर इससे प्यार मत जताइए वरना ये यूँ ही दीवारों पे अपना सर पटकने लगेगा।’’ पागलखाने के प्रबन्धक की बात सुनकर उसे लगा कि वो तुरन्त वहाँ से चली जाए; लेकिन उसने हार नहीं मानी और अन्ततः उसे ठीक करके ही दम लिया।
‘‘मैं पागल नहीं हूँ, बीमार हूँ; इतना बीमार कि अब कभी ठीक नहीं होऊँगा।’’ यही वो शब्द थे जो उसने थोड़ा ठीक होने पर उससे पहली बार कहे थे। पर ये सब इतना आसान नहीं था। क्या कुछ नहीं किया उसने, किस किस को नहीं ढूँढा, किस किस से नहीं मिली।
‘‘उन्हीं की बदौलत आज उसकी ये हालत हुई है।’’ पागल के उस दोस्त की आँखों में गुस्सा था। ‘‘क्या चाहा था उसने? बस थोड़ा सा प्यार! मगर… पहली ने अपनी जाति के एक दौलतमन्द से शादी कर ली तो दूसरी ने अपने धर्म वाले से। सबने उसको धोखा दिया, सबने उसका इस्तेमाल किया, यहाँ तक कि मैंने भी… वो सही कहता था, निःस्वार्थ प्रेम एक भ्रम है।’’ वह बड़बड़ाता जा रहा था। ‘‘इस दुनिया को प्यार की नहीं, नफ़रत की ज़रूरत है।’’
बहुत खोजने पर उसे उसकी नोटबुक मिली। उसे सरप्राइज़ देने के लिए उसने उसकी नोटबुक से कविताओं को संकलित करके एक किताब छपवाई जिसे मेण्टल हॉस्पिटल से आज उसके छूटने पर वह उसे गिफ्ट करना चाहती थी। वही किताब उसके डैशबोर्ड पर रखी थी। उसने गुलाब को उठाया, उसे चूमा और फिर वहीं पर रख दिया। वो आई तो थी उस पर शोध करने पर कब उसके प्यार में पड़ गई उसे पता ही नहीं चला। ‘‘तुम्हारी तलाश मुझ पर ख़त्म होती है। आई लव यू!’’ कल उसने उसका हाथ पकड़ते हुए उससे कहा था।
वह हॉस्पिटल पहुँच चुकी थी। हॉस्पिटल के अन्दर भीड़ जमा थी। लोग आपस में बातें कर रहे थे। ‘‘पता नहीं कल शाम से इसको क्या हो गया? कभी हँसने लगे तो कभी रोने लगे, कभी ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाये तो कभी एकदम शान्त हो जाए।’’
भीड़ को चीरकर वो अन्दर पहुँची। वहाँ एक लाश पड़ी थी। वो लाश उसी पागल की थी जिसने कल रात दीवारों से सर फोड़-फोड़कर अपनी जान दे दी थी। वो धम्म से ज़मीन पर गिर गई । उसकी आँखों से आँसू बहने लगे जो कभी किताब पर गिरते तो कभी उस गुलाब पर।
तभी किसी ने पीछे से कहा, ‘‘बेचारा पागल!’’ वह पलटकर ज़ोर से चिल्लाई , ‘‘वो पागल नहीं था, बीमार था… बीमार!’’
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4-ज़िन्दा क़ब्रें
अफ्रीका के घने जंगल में दो नंगे आदमी एक दूसरे के सामने से गुज़र रहे थे। पास आने पर एक ने पूछा, ‘‘इतिहास से छेड़छाड़…’’, दूसरे ने कहा ‘‘…नहीं होनी चाहिए।’’
किसने सोचा था कि इतिहास को लेकर भी विश्वयुद्ध हो सकता है; मगर हुआ। पहले तो सभी देश सिर्फ़ अपने ही इतिहास को बदलते थे पर शीघ्र ही उन्होंने दूसरों के इतिहास को भी बदलना शुरू कर दिया।
‘‘उन कमीनों की इतनी हिम्मत कि उन्होंने हमारे महान राष्ट्रपति के चरित्र पर कीचड़ उछाला। कल का सूरज उनके मुल्क का आख़िरी सूरज होगा।’’ यही वह चिंगारी थी जिसने आग का रूप धारण कर लिया। इससे दूसरे देशों के नागरिकों ने भी अपनी सरकारों पर दबाव बनाया कि वे भी उन देशों के साथ ऐसा ही सुलूक करें ताकि फिर कोई उनके गौरवशाली इतिहास के साथ छेड़छाड़ न कर सके। शीघ्र ही पूरी दुनिया युद्ध की आग में जलने लगी।
चारों तरफ़ भीषण मारकाट मची हुई थी। यह भयावह स्थिति बद से बदतर तब हो गई जब सभी देशों में गृहयुद्ध छिड़ गया। ‘‘दुनिया का जितना भी इतिहास है वह दरबारी है। इसमें महिलाओं की तरह दबे-कुचले लोगों का भी कहीं ज़िक्र नहीं है।’’ वंचित वर्गों ने इसे अवसर के रूप में लिया। परिणामस्वरूप एक को दूसरे से श्रेष्ठ बताने वाली सभ्यताएँ अब दो मोर्चों पर लड़ रही थीं।
जल्द ही युद्ध को रोकने के लिए इस पर चिन्तन आवश्यक हो गया कि आख़िर हम किस इतिहास को सही मानें? और इस पर भी कि ‘इतिहास से छेड़छाड़’ का क्या अर्थ है? उत्तर यह प्राप्त हुआ कि ‘इतिहास से छेड़छाड़’ का अर्थ ‘सत्य को छिपाना’ है। इसके लिए इतिहासकारों से कहीं ज़्यादा कवि तथा कलाकार ज़िम्मेदार थे। इसलिए उन्हें चौराहों पर चुन-चुनकर लटकाया गया। सत्य को ज़िन्दा रखने का काम दार्शनिकों का था जिसमें वे पूरी तरह से असफल रहे। इससे पहले कि सरकारें उन्हें ढूँढतीं वे यूनान की एक प्राचीन गुफा में जाकर छुप गए।
‘‘मानव इतिहास की शुरुआत अफ्रीका से हुई है।’’ सभी राष्ट्राध्यक्षों ने इसे एकमत से स्वीकार करते हुए युद्ध समाप्ति की घोषणा की और कहा कि ‘‘इसके इतर जितना भी इतिहास है वह सब दूषित है। इसलिए अपने पूर्वजों की भाँति हम भी अफ्रीका के घने जंगलों में निर्वस्त्र होकर रहेंगे।’’ जिन चन्द लोगों ने इसे स्वीकार नहीं किया उन्हें देखते ही मार डालने का आदेश लागू है।
‘‘इतिहास से छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए।’’ दोनों ने दोहराया और फिर एक दूसरे से दूर जाने लगे। उनमें से एक अभी थोड़ी ही दूर गया होगा कि उसने एक आदमी को पेड़ पर बन्दर की तरह लटके हुए देखा। इससे पहले कि वह पूछता, ‘‘इतिहास से छेड़छाड़…’’, बन्दर की तरह लटके हुए उस आदमी ने अपनी जीभ निकाली और उसे चिढ़ाने लगा।
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5-वह तोड़ती पत्थर
वह महिला आज भी इलाहाबाद के पथ पर पत्थर तोड़ रही थी।
एक आदमी जो बहुत देर से उस महिला को देख रहा था, उसने क़लम से काग़ज़ पर कुछ लिखा और कहा, “यह एक हृदय विदारक कविता होगी।” महिला ने उसकी तरफ़ देखा और पुनः चुपचाप पत्थर तोड़ने लगी।
वह महिला अब बूढ़ी हो चुकी थी। उसके चेहरे पर झुर्रियाँ थीं तो जिस्म पहले से और ज़्यादा काला। उसने आज भी वही मैली-कुचैली धोती पहनी थी जो अब लोकतंत्र की तरह जगह-जगह से फट चुकी थी।
“तुम चिन्ता मत करो, मैं तुम्हें अमर कर दूँगा।” उस आदमी ने पत्थर तोड़ती हुई महिला से कहा।
महिला ने घूरकर उसकी तरफ़ देखा और खड़ी हुई। फिर हथौड़ा फेंककर उसे मारा और कहा, ‘‘कविता क़लम से नहीं, हथौड़े से लिखी जानी चाहिए।”
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6-नरक
‘‘क्या जिसका कोई देश न हो, उसका कोई घर भी नहीं होता?’’ बिना पेट वाली वह लड़की अभी भी उस सवाल में ग़ुम थी जिसका अभी तक उसे कोई उत्तर नहीं मिला था।
अभी कुछ महीने पहले ही वह अपने पिता के साथ इस देश में आई था, सोलह दिन समुद्र में तो बाइस दिन पैदल चलने के बाद। बड़ी मुश्किल से दोनों की जान बची थी। थोड़ी राहत उन्हें तब मिली जब वो शरणार्थी शिविर पहुँचे। यहाँ उनके जैसे हज़ारों थे।
‘‘क्या हुआ था तुम्हारे साथ?’’ किसी ने उसके पिता से शिविर में पूछा। ‘‘क्या होगा, वही जो सबके साथ हुआ।’’ और उसके पिता शून्य में खो गये। ‘‘जी भर गया हो तो मारो इन सालियों की छाती पे गोली। इन्हीं से ये सपोलों को दूध पिलाती हैं।’’ फौजी अफ़सर ने जैसे ही अपने सिपाहियों से कहा पूरे गाँव में गोलियों की आवाज़ गूँज उठी। बच्चों के गले रेत दिये गये। बुड्ढों को मारकर नदी में फेंक दिया गया। जहाँ जो भी सामान मिला उसे लूट लिया गया। घरों में आग लगा दी गई । हर तरफ़ लाशों पर लाशें बिछी थीं। बड़ा ही ख़ौफ़नाक मंजर था। कुछ एक लोग जो जंगल में भागकर अपनी जान बचा सके उन्हीं में ये दोनों भी शामिल थे।
लोग अक्सर आपस में बातें किया करते थे, ‘‘आख़िर हमारी ही सरकार और हमारी ही सेना हमारे साथ ऐसा कर सकती है?’’ हालात यहाँ बेहतर तो थे पर अच्छे नहीं। लोगों को न तो भरपेट खाना मिल रहा था और न ही साफ़ पानी। उनके पास कोई रोज़गार भी नहीं था। नागरिकता तो थी ही नहीं। बच्चों को भी स्कूल में पढ़ने का कोई अधिकार नहीं था। ‘‘मेरे पास दस एकड़ ज़मीन थी पर अब मैं एक बोतल पानी भी ख़रीदकर नहीं पी सकता।’’ अपनी एक टांग गँवा चुका शख़्स अक्सर यह कहते-कहते रो पड़ता था। ऐसी ही न जाने कितनी कहानियाँ लोगों की आँखों में तैर रही थीं।
तभी एक लड़का उस बिना पेट वाली लड़की के पास दौड़ते हुए आया और चीख़ते हुए बोला, ‘‘जल्दी चल तेरे पिता को पुलिस वाले उठा ले गये हैं।’’ वह बिना एक भी पल गँवाये वहाँ से भागी। उसके पीछे वह लड़का भी चिल्लाते हुए दौड़ रहा था, ‘‘तेरे पिता आतंकवादी हैं क्या? तेरे पिता आतंकवादी हैं क्या?’’
अचानक काग़ज़ का एक टुकड़ा उड़ते हुए उस लड़की के मुँह पर आया और चिपक गया। लड़की वहीं औंधे मुँह गिर गई । उस काग़ज़ में गुलाबी रंग से परियों की कहानी छपी थी पर वह धूल से इतनी ज़्यादा सनी थी कि उसे पढ़ा नहीं जा सकता था।
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7-वैक्सीन
डेविड और पीएम हाउस के बीच बस अब थोड़ी-सी ही दूरी बची थी।
उधर देश की सबसे बड़ी फार्मास्यूटिकल कम्पनी के बंगले पर जहाँ देश के सभी बड़े दवा व्यापारी मौजूद थे, अँधेरे के बादल साफ नजर आ रहे थे। ‘‘अगर उसने वह फॉर्मूला प्रधानमन्त्री को दे दिया, तो हम सब तो रोड पर आ जाएँगे।’’
डेविड एक स्वतन्त्र शोधार्थी थे, जिन्होंने एक ऐसे टीके का आविष्कार किया था, जिससे अब तक की ज्ञात सभी बीमारियों से पल भर में छुटकारा पाया जा सकता था। बस एक बार बच्चे को यह टीका लगा दिया और वह आजीवन रोगों से मुक्त। डेविड का एकमात्र उद्देश्य जन कल्याण था; इसलिए उन्होंने इस फॉर्मूले को पेटेंट कराने की जगह प्रधानमन्त्री को देने की सोची, जो अब तक के सबसे ईमानदार और स्वच्छ छवि वाले प्रधानमन्त्री थे। इसके लिए उन्होंने प्रधानमन्त्री को एक पत्र भी लिखा था, जिसमें इस विषय की विस्तृत जानकारी थी सिवाय फॉर्मूले के। पीएम हाउस से कॉल आने के बाद आज वह उसी फॉर्मूले को देने जा रहे थे।
‘‘अरे कोई ज़रूरी है उसने ऐसे किसी टीके की खोज की हो। साला झूठ भी तो बोल सकता है।’’ मोटे व्यापारी ने अपनी दाढ़ी खुजाते हुए कहा।
‘‘हाँ। ऐसा कैसा हो सकता है कि एक ही टीका सभी बीमारियों से लड़े?’’ अन्य लोगों ने भी अपनी शंका ज़ाहिर की।
अब तक ख़ामोश खड़े सफेद कोट वाले उस व्यक्ति ने, जिसके बंगले पर आज ये लोग इकठ्ठा हुए थे, कहा, ‘‘हो सकता है। मैंने उस ख़त की कॉपी विशेष सूत्रों से प्राप्त कर अपनी रिसर्च टीम को दिखाई है।’’
‘‘सर, तब तो हम लोग बर्बाद हो जाएँगे।’’ सभी समवेत स्वर से बोल उठे। ‘‘देश-विदेश में हमने जो इतने बड़े-बड़े प्लांट लगा रखे हैं, जो इतना बड़ा बिज़नेस फैला रखा है उसका क्या होगा?’’
‘‘शायद यही समय हो नये सूरज को सलाम करते हुए किसी दूसरे धन्धे के बारे में सोचने का।’’ उसने अपनी सिगार जलाते हुए कहा।
डेविड पीएम हाउस पहुँचने ही वाले थे कि तभी एक अनियन्त्रित ट्रक आया और उन्हें रौंदते हुए निकल गया।
‘‘बधाई हो! काम हो गया।’’ सफेद कोट वाले के फोन से आवाज आई । ‘‘अच्छा हुआ, नहीं तो इस बार चुनाव में आपकी पार्टी रोड पर नजर आती मिस्टर पीएम। हा हा हा…’’
अँधेरे के बादल छँटते ही बंगला पहले की तरह रौशनी से जगमगाने लगा।