मैं तीसरी कक्षा में पढ़ता हूँ। रोज़ स्कूल, होमवर्क और बादमें ट्यूशन। क्या करूँ? माँ मुझे नहीं पढा़तीं, कहती हैं, ‘मेरे पासटाइम नहीं है।’
मैं शाम को बहुत कम समय खेल पाता हूँ। मुझे खेलना बहुत अच्छालगता है। टीवी मुझे पसन्द नहीं। रात को माँ अपने घर के काम और फिर मोबाइलपर व्यस्त रहती हैं। मुझसे बहुत कम बात करती हैं। पापा ऑफिस से बहुत देर सेआते हैं।
आज मैं खु़श था। आज माँ अपनी फ्रैंड्ज के साथ ‘हरिद्वार वाले’ के यहाँ आई थीं। यहाँ मेला भी लगता है। झूले और खिलौने सब यहाँ मिलते हैं।वे सब इकट्ठी हुईं और लगी खेलने, वो हॉउसी का खेल होता है ना! मैं बैठा बसदेखता रहा।
उकताकर माँ से कहा, “माँ,बाहर चलो न मुझे झूला झूलना हैं।”
माँ ने कहा, “पहले गेम पूरी होने दो, फिर बाहर चलेंगे।”
मैं क्या कहता। समझदार बच्चाबने रहना ज़रूरी है। नहीं तो फिर माँ नाराज़ होती, “अवि तुम कब ….?’चुपबैठा इंतज़ार करता रहा। कब ये गेम खत्म हों और हम बाहर जायें।
हम जैसे ही बाहर निकले, मैं झूलों कीतरफ दौड़ा। बस दो ही झूलोंपर बैठा था माँ ने कहा, “देर हो रही है, अब घर चलो अवि, हम फिर कभी आएँगे।” मेरा मन नहीं भरा था। मैं और झूलना और घूमना चाहता था। माँ से कहा भी तो बोलीं, “ज़्यादा ज़िद नहीं, बस अब घर चलो।”
घर आकर मैं रोने लगा तो माँ चिल्ला पड़ीं, “अवि, तुम बहुत जि़द्दी हो गए हो। कहना बिलकुल नहीं मानते हो।”
मेले में मैं सारा समय चुप बैठा रहा। जो झूले झूलने थे, वो बाद में झूले। वो भी बस दो।अब आप ही बताओ और कितना समझदार हो सकता हूँ?
वैसे खेलने की उम्र किसकी है, मेरी या माँ की?
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