जून 2026

देशअनागत शंकाएँ     Posted: August 1, 2025

ट्रेन अपनी रफ्तार पर थी। थर्ड एसी की बोगी में बमुश्किल पंद्रह-बीस पैसेंजर होंगे। एक बर्थ पर मैं अपनी नई-नवेली दुल्हन, गौरी के साथ बैठा था।

मेरे ठीक सामने की बर्थ पर बैठे फौजी ने मुस्कराकर  हैलो कहते हुए मेरी ओर अपना हाथ बढ़ाया, तो मैंने भी गर्मजोशी से हाथ मिलाया। मैंने अंदाज लगाया कि वह मुझसे उम्र में चार-पाँच साल बड़े होंगे।

रात के नौ बज गए थे, जैसे ही गौरी ने खाने का टिफिन खोला,  पूड़ी-आलू की सूखी सब्जी, और आम के अचार की खुशबू कोच में फैल गई। मैंने शिष्टाचारवश फौजी को भी साथ में खाने के लिए आमंत्रित किया। अब, मैं शादीशुदा नवयुवक था अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक नागरिक। थोड़ी ना-नुकर के बाद फौजी भी पूड़ी, अचार के स्वाद में सम्मिलित हो गए।

भारतीय खाने में चुंबकीय आकर्षण होता है, अनजानेपन की दूरी सिमटकर अपने-पन की परिधि में आ गई थी। अब चूँकि मेरे और फौजी के बीच दोस्ताना भाव जाग गया था, साथ ही मैं गौरी को भी प्रभावित करना चाहता था। फौजी से बातचीत शुरू करते हुए मैंने अपना और गौरी का परिचय दिया, अपने गाँव के रीति-रिवाज़ के बारे में बताया। कुछ और इधर-उधर की चर्चा के बाद मैंने पूछा, “कहाँ पोस्टिंग है आपकी, लद्दाख  या—?”

“सियाचिन में।” फौजी ने प्रश्न पूरा होने से पहले जवाब दे दिया।

“ओह, बहुत कठिन जीवन होता है सैनिक का। मैंने सियाचिन के बारे में पढ़ा तो है; पर आपसे सुनना चाहता हूँ, कैसे रहते हैं हमारे जाँबाज सैनिक, विपरीत परिस्थितियों में वहाँ?”

“कुछ कठिन नहीं लगता अशोक जी। सरकार हमारा ध्यान रखती है। हमारे लिए प्रतिदिन पाँच करोड़ रुपये खर्च करती है। हमें दुश्मनों से डर नहीं लगता। डर लगता है, वहाँ की अचानक हमला करती बर्फ़ीली आँधियों, पिघलते ग्लेशियर, और हिमस्खलन से, जो सैनिकों की अकाल मृत्यु का कारण बनते हैं।”

“आह! बहुत भयावह होता होगा। आप छुट्टी लेकर घर जा रहे हैं?”

“अब ऐसा है अशोक जी, माइनस सत्तर-अस्सी के नीचे तापमान रहता है, इससे ऑक्सीजन की कमी के कारण नींद नहीं आने से यादाश्त कमजोऱ होने लगती है, स्किन डिसीज अलग परेशान करती है। मुझे भी प्रॉब्लम होने लगी थी। वैसे सैनिकों की  विपरीत परिस्थिति को सहन करने की शारीरिक-मानसिक क्षमता को देख, दो-तीन महीने में ड्यूटी चेंज होती है।”

“इतनी ठंड! आदमी की हड्डियाँ ही अकड़ जाएँ।”

“बिलकुल, टमाटर और कई सब्जियाँ इतनी टाइट हो जाती हैं कि हथौड़े  से तोड़नी पड़ती हैं।”

“बाप रे! सेल्यूट है आप फौजियों को। होम-सिक भी होती होगी,परिवार से दूर रहने पर?”

“होम…सिक!” एक गहरी साँस ली फौजी ने। कहा, “इतना सर्द मौसम…बाइलॉजिकल नीड…सिक… नेस होती है।” उबासी लेते हुए फ़ौजी अपनी बर्थ पर करवट लेकर लेट गया।

रात का समय, बोगी में सन्नाटा, मैंने गौरी की तरफ देखा- वह बर्थ की सीट पर पीछे सिर टिकाए बेखबर सो रही थी। उसके दूधिया चेहरे पर बालों की लटें बिखरी थीं।

अनागत शंकाएँ मेरे मन पर हावी होने लगी। मैंने गौरी के ऊपर चादर डाल दी, यथासम्भव उसका चेहरा ढक दिया। उससे सटकर बैठ गया। नींद…? वह तो कब की गायब हो गई। पत्नी के लिए सुरक्षा-चक्र बुनता रहा।

फौजी ने पास रखी रायफल पर अपना हाथ रखा, मैं चौकस हो गया, अगर ये आदमी कोई हरकत करता है, तो मैं चिल्लाकर यात्रियों को जगा दूँगा। मार-मारकर बेहाल कर दूँगा, हाथ तो लगाकर देखे मेरी पत्नी को…।

फौजी ने करवट बदल, मेरी तरफ पीठ कर ली। थोड़ी राहत मिली। पर मैं जागता रहा। पलक नहीं झपकी मैंने।

अचानक फौजी उठा, घड़ी में समय देखा और उठकर अपना बैग बाँधने लगा। आवाज़ सुन गौरी भी जाग गई।

उसने अपना बैग कंधे पर टाँग लिया। मेरी ओर देखकर बोला, “बॉस, हमारा गाँव आ गया।” फिर गौरी की तरफ देखते हुए बोला, “बहन, बॉस ने बताया था कि तुम पहली बार अपनी ससुराल जा रही हो।” उसने गौरी के हाथ में कुछ रुपये रखे, फिर उसके सर पर हाथ रखकर कहा, “सुखी रहो।”

-0-सुनीता मिश्रा, सुदर्शन नेत्रालय,MIG-14, डिपो चौराहा भोपाल (म. प्र.) -462003

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