1- तिलिस्म
जीप के पिकनिक स्पॉट पर पहुँचते ही बकरे की बैचेनी बढ़ गयी। भय से कलेजा मुँह को आने लगा। थोड़ी देर में ही उसे मसालेदार गोश्त में बदलकर इन हुड़दंगियों के बीच पेशकर दिया जाएगा। उसने कातर नजरों से सामने की ओर देखा..! वे चार थे। कॉलेज के सहपाठी और गहरे दोस्त !! पिकनिक के नाम पर हो-हल्ला, नाच-गाने और कमर मटकाने में मशगूल ! एक ने बेसुरे राग में आलाप लिया – मजहब नहीं सिखाता आपस मे बैर रखना..! दूसरे ने हुलसकर कदमताल मिलाते हुए अंतरा जोड़ा – यारी है ईमान मेरी, यार मेरी जिंदगी..!
‘यार सुशील, बहुत थक गया..! टॉनिक लेना होगा अब !’ सलमान ने खिलखिलाते हुए सिगरेट निकाली और माचिस की काठी को ‘झटके’ से सुलगाकर सिगरेट धरा ली। थोड़ी देर बाद सुशील सामानों की ढेरी से केक निकाल लाया। बड़ा सा गोलाकार चॉकलेट केक ! ऊपर क्रीम से लिखा था – हैप्पी फ्रेंडशीप डे ! छूरी से केक को विलंबित लय में ‘हलाल’ करते हुए छोटे छोटे टुकड़े किये और दोस्तों में बांटने लगा।
बकरा नेक दिल और धार्मिक प्रबृत्ति का जीव था। उसने ईश्वर से गुहार लगायी -‘ हे प्रभो, तेरे भक्त की जान संकट में है। रक्षा करो।’ भक्त की पुकार पर ईश्वर द्रवित हो उठे। थोड़ी देर आंखें बंद करके चिंतन किया। फिर मन ही मन मुकुराते हुए एक छटे हुए शातिर और घाघ नेता की रूह को आदेश दिया – ‘नेतागिरी के सारे नायाब गुर और दांवपेंच की सरताज है तू। जा.. ऐसा कोई तिलिस्म रच कि इस मासूम की जान बच जाए..!’
रूह ‘जो आज्ञा देव..’ कहती हवा में उड़ी और सीधे बकरे की काया में जा दुबकी। काया में प्रवेश करते ही बकरे की आंखों में बिल्लोरी चमक भर गयी। सुशील लघुशंका के लिए झाड़ियों की ओर गया हुआ था। बकरा कुलांचे भरता उसके पास आया और थोबड़े को सुशील के कान के पास लाकर कोई मंत्र उच्चारा। मंत्र के सम्मोहन से सुशील की आंखें क्रोध से सिकुड़ने लगीं और चेहरे पर तनाव खिंचने लगा।
फिर बकरा ठुमकता हुआ जाजम पर बैठे सलमान के पास आ खड़ा हुआ। सलमान ने प्यार से उसकी गर्दन पर हाथ फेरा और तीसरे नेत्र से उसके गोश्त के लजीजपन का महसूसा। इसी बीच बकरे ने थुथून उठाकर उसके कान में भी कोई कलमा फूंक मारा। सलमान की भौंहे प्रत्यंचा सी तन गयीं।
पलक झपकते सुशील और सलमान एक दूसरे को टेढ़ी नजरों से घूरते हुए आमने सामने आ खड़े हुए। दोनो की सांसें तेज तेज चल रहीं थीं और आंखों में खून उतरा हुआ था।
‘ये पिकनिक अब नहीं हो सकती। जोजेफ के संग साजिश रचकर हमें हलाल खिलाना चाहते थे न .. हंह ?’ सुशील ने फूफकार छोड़ी।
‘साजिश तो तुमने की है ! चुपके चुपके जोजेफ को पटा लिया झटका बनाने को ?” सलमान भी जोरों से गुर्राया। आरोप प्रत्यारोप व तीखी झड़प का कड़ुवा सिलसिला ! दोनों की तकरार पर जोजेफ दौड़ा आया – ‘बिरादर, अपुन जोजेफ..दस साल का तजुर्बा वाला बावर्ची ग्रांटी देना मांगता कि हलाल करो या झटका , गोश्त का टेस्ट में कोई फरक नई होयेगा..!’
‘शटअप यू..! हमको बेवकूफ समझते हो ?’ सालमान ने गुस्से से केक को उठाकर एक ओर उछाल दिया। सुशील भी भला पीछे क्यों रहता ! आपे से बाहर होकर फलों की टोकरी और बकरे के पेट दोनों पर कसकर दुलत्ती मारी तो दोनों दूर झाड़ियों में जा गिरे – ‘फ्रेंडशिप.. माय फूट !’
वे चार थे। दो दो के दो गुटों में बट गए। एक गुट के सर पर केशरिया तो दूसरे पर हरा रंग चढ़कर तीन ताल बजा रहा था।
झाड़ियों में औंधा पड़ा बकरा पूंछ फटकारता उठ खड़ा हुआ। बकरे के भीतर से नेता की रूह बाहर निकली और छितराये पड़े केक को और उस पर क्रीम से लिखे ‘हैप्पी फ्रेंडशीप’ को खी खी करती कुतरने लगी।
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2- नाम में क्या नहीं रखा है
लगभग एक साल के अंतराल के बाद अम्मां बाबूजी का शहर आना हुआ। अफसर बेटे की कोठी पर !
रविवार था। बेटा खुद स्टेशन से लेकर आया उन्हें। कार कोठी में प्रवेशकर रही थी तो बाबूजी की नजरें गेट पर लगी नेमप्लेट पर गयी – यजुवेंद्र प्रताप सिंह, संयुक्त सचिव, समाज कल्याण मंत्रालय। बेटा सामाजिक समरसता व न्याय के लिए कामकर रहा है। आंखें गर्व से भर गयीं।
दोनों के सोफ़ा पर बैठते ही कोठी के सारे सदस्य इर्दगिर्द सिमट आये। पत्नी, दोनों बच्चे, बच्चों का कुत्ता और घरेलू नौकर ! यजुवेंद्र ने सबका परिचय कराना शुरू किया।
‘अम्मां.. ये तुम्हारी बहू मणिका मोहिनी सिंह..!’
‘जानती हूँ.. जानती हूँ। कोई पहली बार नहीं मिल रही !’ अम्मां-बाबूजी मुस्कुराए तो सारे लोग ठहाका लगाते हंस पड़े -‘और इन दोनों को भी.. रघुवेन्द्र प्रताप और रमणिका ! मेरे पोता पोती !’
‘दो नए सदस्यों की आमद हुई है कोठी में।’ यजुवेंद्र बोला।
तभी अम्मां की नजरें पिल्ले पर गयी। लंबे लंबे सफेद झबरैले बालों वाला मासूम पिल्ला ! अम्मां चहकी -‘तेरा कुत्ता तो बड़ा प्यारा है री !’ तभी पिल्ला छोटी सी पूंछ को चंवर की तरह दाएं बाएं डुलाता कूं कूं करता गुर्रा उठा। रमणिका पिल्ले को गोद मे उठाती खिलखिलायी -‘दादी, इसे कुत्ता मत बोलो, गुस्सा आता है। टाईगर बोलो। इसका नाम टाईगर है।’
‘ओके ओके, हेलो टाईगर ..!’ अम्मां ने टाइगर को गोद मे लेकर पुचकारा।
‘और अम्मां, ये कोठी का नौकर है..’ मणिका ने पास खड़े नौकर की ओर संकेत किया।
‘नाम क्या है रे ..’ बाबूजी ने पूछा तो इसके पहले की नौकर हुलसकर बता पाता, यजुवेंद्र बोल पड़ा -‘नौकर तो नौकर ही होता है न पापा। नौकर का क्या तो नाम और क्या धाम ! जरा रंग रूप देखिए। जैसे कोयला ढोने वाली बोरी को पीट पीटकर धो दिया गया हो ! हम तो इसे कालिया बुलाते है..!’
‘कभी कालिया याद नही रहता तो नौवा कहकर हँका लेते हैं। जाति से नाई है न।’ मणिका ने हंसते हुए अंतरा जोड़ा।
नित्यानंद ही ही करता सूखी हंसी हंस पड़ा। पर भीतर एक भट्ठी धधक उठी। बहाने से बाथरूम में आया। आग्नेय नजरों से बाएं हाथ पर गुदे ‘नित्यानंद ठाकुर’ के पिस्तई गोदने को घूरता रहा, फिर फूफकारते हुए नाखूनों से वहाँ खरोचने लगा।
राम जाने क्या खरोंच रहा था – गोदने को, अपने स्याह रंग को या नस्लवादी टिप्पणी से उपजी टीस को..!
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3- नृशंस
देश के सबसे जांबाज कमांडो के अभेद्य सुरक्षा कवच से घिरा सीएम हाउस !
सुबह का वक्त ! बेटे- बहू और पोते से घिरे सीएम साहब नाश्ते की टेबल पर बैठे हैं। बेदाना जूस से भरा गिलास होंठों तक आ भी न पाया था कि सचिव दौड़ते हुए कक्ष में प्रवेश करते हैं -‘सर, अभी अभी खबर आयी है कि सचिवालय के पास ब्यस्त मार्किट एरिया में आठ जगहों पर सीरीयल बम ब्लास्ट हुए हैं। सौ से भी ज्यादा मारे गए, पचासों घायल..!’
सीएम साहब बिना किसी विचलन के घूंट घूंट करके सारा जूस उदरस्थ करते हैं, फिर तृप्ति की डकार व तनी भृकुटि के साथ सचिव की ओर मुँह करके फुफकारते हैं -‘कब से हो इस पद पर .?’
‘सर..दो तीन माह ही हुए हैं..’ सचिव हदस जाते हैं। इस सवाल का हादसे से क्या संबंध !
‘तभीए.. हंह !’ सीएम साहब खनकते हैं -‘ बम ब्लास्ट हुआ है तो इसमें सीएम साहब का करेंगे भाई ? एन एस जी, बीएसएफ, सीआरपीएफ, एसपीजी और नाना तरह का गारद का एतना बड़ा अमला काहें बना है ? जो करना है ऊ लोग न करेंगे। हादसा हुआ नय कि दनदनाते हुए मुख्ख मंतरी के कपार पर तबला बजाने चले आये। मुख्ख मंतरी घटनास्थल के दौरे पर कब जाते हैं सब खोल के बताना होगा ? बुड़बक के नाती, नाश्ता का सारा मजा किरकिराकर दिया। अब खड़े खड़े मुँह का ताक रहे हैं ? जाईये और ऐसे मौकों के लिए आलरेडी रिकॉर्ड किया हमरा वीडियो मेसेज सभी चैनल पर टेलीकास्ट करवाइए..जल्दी !’
थोड़ी देर में टीवी चैनलों पर नियमित प्रोग्रामों को रोककर सीएम साहब का ‘लाइव’ संदेश उभरता है -‘हम इस तरह के नृशंस आतंकी वारदात का भरपूर निंदा करते हैं और विश्वास दिलाते हैं कि सरकार उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दिलाकर ही दम लेगी।तब तक के लिए हर मृतक के परिजन को पांच लाख और आहतों को दो लाख के मुवावजे की घोषणा की जाती है।’
चैनलों पर लाइव मेसेज को देखकर सीएम साहब का चेहरा गोभी के फूल की तरह खिल उठता है।
‘पापा, अब होनोलुलू के दौरे का क्या होगा.?’ पोता कुनमुनाता है तो सीएम साहब उसकी पीठ पर प्यार का धौल जमाते हिनहिनाते हैं -‘अरे बिटवा, महत्वपूर्ण राजकीय यात्रा ऐसे छोटे मोटे हादसे से टला करती है का ? वह तो होगी ही और उस राजकीय प्रतिनिधि मंडल में तुम भी शामिल रहोगे, बूझे ?
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4- रावण
आकाश मार्ग से ‘राफेल’ में गुजरते रावण ने नीचे झांककर देखा.. विस्तृत क्षेत्र में फैला ‘रामलीला ग्राउंड’ ! ग्राउंड के एक ओर उसका साठ फुटा विशाल पुतला ..! दूसरी ओर सुसज्जित मंच और ठाठे मरता विशाल जनसमूह !
सुसज्जित मंच पर विराजमान भगवान राम और लक्ष्मण की पूजा अर्चना हो रही थी। घनी मूछों के बीच रावण मुस्कुराया – ‘ओ..यानी कि आज दशहरा है। यानी कि मेरा दहन करने का नाटक खेला जा रहा है ..! हंह.. अरे मूर्खों, पहले मैं एक था। अब तो सहस्राक्षु बनकर हर गली, कस्बे और शहर में व्याप गया हूँ। किस किस को और कब तक जलाओगे..हंह !’
रावण के मन मे दशहरा के ‘कौतुक’ को देखने की इच्छा जगी। झटके से राफेल से कूदा और कलाबाजी खाते हुए मैदान में खड़े अपने विशाल पुतले में जा समाया।
भगवान राम लक्ष्मण की पूजा की औपचारिकता पूरी हुई। उसके बाद जैसे ही राम ने रावण को भस्म करने के लिए धनुष पर तीर साधा , रावण खिलखिला उठा। दसों मुख से निकलती उपहासात्मक हंसी , मानो चुनौती की गूगली फेंक रहा हो राम की ओर – “यह मुँह और ‘अरहर’ की दाल..! मुझे भस्म करोगे , मुझे..? हा हा हा..!”
राम ने प्रत्यंचा कान तक खीचकर जलता हुआ तीर पुतले की ओर छोड़ दिया। एक झपाका हुआ । इसके पहले कि तीर ‘सूं~’ की आवाज करता पुतले से टकराता, रावण हर बार की तरह इस बार भी सूक्ष्म रूप धरकर पुतले से निकला, हवा में घुमेरे घालता सीधे मंच पर बैठे राम की ओर लपका और चुपके से उनके भीतर की अशोक वाटिका में उतरकर कोने में जा छुपा।
आज भी रावण वहीँ आराम से बैठा हुआ है और राम के भीतर के ‘राम’ को शनैः शनैः कुतरने में लगा है। बाहर खड़े राम भक्तों का जन सैलाब भक्तिभाव से ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाता पुतले को धू धू करके जलता देख भावविभोर हो रहा है।
‘जय श्रीराम’ के नारों का समवेत कोलाहल इतना बुलंद और तेज है कि राम के भीतर की वाटिका में सुरक्षित बैठे रावण की अट्टाहासी खिलखिलाहट किसी भी भक्त के कानों से नहीं टकराती।
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4- एक और शबरी
शुभ्रा की आठ वर्षीय बेटी मीरा अत्यंत मेधावी और स्मार्ट थी।
एक दिन पड़ोस की मिसेज तिवारी उनसे मिलने आयीं। उस समय मीरा ड्रॉइंग रूम में बैठी टीवी देख रही थी। उसके दोनों हाथों में एक एक अमरूद था।
‘अरे वाह..अमरूद !’ मिसेज तिवारी चहकी और बायीं हथेली की ओर संकेत करती बोलीं –‘बेटे, ये वाला हमें दे दो। हम खाएंगे।‘
एक क्षण का मौन रहा, फिर मीरा उस अमरूद पर दांत गड़ा बैठी।
‘धत्त तेरे की !’ मिसेज तिवारी हंसी –‘ अच्छा चलो, वो दूसरा वाला ही दे दो न..!’
फिर से एक क्षण का मौन ! मोटी- मोटी आंखों को नचाती मीरा उस अमरूद को भी मुँह तक लायी और उस पर भी दांत गड़ा दिए।
‘नॉटी गर्ल ..!’ मिसेज तिवारी लहराती किचेन की ओर बढ़ गयीं जहाँ शुभ्रा चाय बना रही थी।
‘देख तेरी स्मार्ट बेटी की करतूत ! अमरूद मांगा तो देने की बजाय दोनों पर दांत गड़ा दी, हाहाहा !’
तभी मीरा दौड़ती हुई किचन में आयी और दूसरा वाला अमरूद मिसेज तिवारी की ओर बढ़ाती हुई खिलखिलाई –‘ आंटी जी, ये वाला अमरूद भोत मीठा है, आप ये खाओ प्लीज। वो तो एक दम खट्टा था।‘
मिसेज तिवारी ठगी सी खड़ी मीरा के निर्दोष मासूम चेहरे जो अपलक निहारती रह गयी।
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5- स्क्रैप
पिता के मरने के बाद जब दोनों के बीच निरंतर झगड़ा बढ़ता गया तो दोनों ने अलग होने का निर्णय ले लिया।
बंटवारे के तय शुदा दिन आँगन में घर का सारा सामान इकठ्ठा किया जाने लगा। सोना चांदी, पलंग अलमारी , फर्नीचर आदि कीमती सामान एक ओर ! बर्तन भांडे, कपडे लत्ते, छिट पुट कबाड़ , स्क्रैप आदि दूसरी ओर !
‘ लगभग सारा सामान आँगन में आ गया है । है न ?’ बड़का फ़नफ़नाया -‘ फिर भी चल, एक बार सारे कमरों में झाँक आते हैं। कहीं कुछ छूट न गया हो।’
छोटू को बात पसंद आई। बड़के की नीयत का कोई ठिकाना नहीं। सचमुच ही कहीं कुछ छुपाकर रख लिया हो ! पत्नी की ओर देखा। उसने भी इशारे से सहमति जता दी।
दो तल्ला मकान ! चार कमरे ! ऊपर छत पर एक कोठरी ! झाँकने का काम नीचे से शुरू किया गया। एक एक कोना..! एक एक ताख ! दोनों थककर चूर !
‘छत वाली कोठरी को भी क्यों छोड़ें ? छोटा सा स्क्रैप भी रह गया तो बाद में ताना मारेगा.. हह !’ बड़के ने व्यंग्य किया।
” ठीक है , ठीक है .,’ छोटू ने मुँह बिचका दिया।
दोनों दनदनाते हुए ऊपर आ गये। किवाड़ उड़के हुए थे। बड़के ने झटके से खोल दिए। भीतर चारों ऒर कबाड़ बिखरा हुआ था और बीच की थोड़ी सी जगह में अम्मा गुदड़ी पर लेटी थी। गुड़ीमुड़ी ! खटका हुआ तो आँखें खुलनी ही थीं। दोनों को एक साथ देखकर चौंक उठी… आज फिर झगड़ा हुआ क्या !
दोनों सकपका गए, मानो अप्रत्याशित कुछ सामने आ गया हो। अम्मा की याद तो दूर दूर तक जेहन में थी ही नहीं। एक पल का मौन.! संकेतों में बात !! फिर बड़के ने हकलाते हुए कहा – ‘अम्मा .. आज हम अलग हो रहे हैं। रोज रोज का टंटा सहन नहीं हो रहा। घर का सारा सामान बंटवारे के लिए आँगन में इकठ्ठा किया जा रहा है। तुझे भी नीचे चलना होगा।’
अम्मा मिचमिची आँखों से एक टक बड़के को निहार रही थी । अचानक झपाका हुआ और पच्चीस साल पहले के लम्हे जेहन में जुगनुओं से कौंधने लगे.. काफी मनौतियों और व्रत-उपवास की अष्टावक्री गलियों से गुजरने के बाद गर्भ में भ्रूण का अंकुरण ! नौ माह तक कोख की कोहकाफी गुफा में भ्रूण का भरतनाट्यमी नृत्य ! नृत्य से उपजती असह्य वेदना ! ऑपरेशन थिएटर का श्मशानी कक्ष ! सीजर की नोच खसोट ! फिर किलकारी की मीठी फुहार से ओत प्रोत होता तन मन !!
फुहार की स्वप्निल मिठास में खोई बूढ़ी अम्मा को पता ही नहीं चला , कब दोनों ने उसे नीचे लाकर कबाड़ वाले सामान के साथ लिटा दिया है।
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6- चोर
दिवाकर बाबू ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़े होकर टाई की गांठ ठीक कर रहे थे कि कोई काम याद आ गया और बेटी को पुकार उठे – ‘ कृष्णा बेटे, जरा यहाँ आओ..’
कृष्णा सामने ही पलंग पर बैठी किसी पत्रिका के पन्ने पलट रही थी।उसने कोई जवाब नहीं दिया तो दिवाकर बाबू ने पुनः प्यार से पुकार – ‘ बेटा, यहाँ आओ न ‘
कृष्णा की ओर से अभी भी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो दिवाकर बाबू को आश्चर्य हुआ। कृष्णा अत्यंत सुशील, सम्बेदनशील और सचेत लड़की थी। धीमी पुकार पर ही गौरैया सी फुदकती आ जाती -‘ क्या हुक्म है जहाँपनाह ..?’ उसकी भोली चुहल पर दिवाकर बाबू वात्सल्य से भीतर तक भींग उठते। पर आज .? पुकार को अनसुना कैसे कर रही है !
वे उसके समीप चले आये। कृष्णा ने कौतुहल भरी बड़ी बड़ी नजरों से पिता को निहारा -‘ आपकी पुकार सुन ली थी मैंने पापा, पर लगा आप मुझे नहीं , किसी कृष्णा बेटे को पुकार रहे हैं। मैं तो बेटी ठहरी न।’
दिवाकर बाबू उसकी बात पर चौंक पड़े, फिर मुस्कराये -‘बेशक बेटी हो , पर दुनिया के किसी भी नायाब बेटे से कम नहीं।’
‘ न न .. छद्म में बात न करें पापा। सच तो यह है कि बेटा न हो पाने का द्वंद्व अभी भी कचोट रहा है आपको। इसीलिए मुझे पुकारते हुए हर बार ‘बेटा’ होंठों पर आ धमकाता है। एक किस्म के अप्राप्य और दमित संतोष की तलाश..! संभव है ‘बेटी’ पुकारने में हीनता का बोध भी होता हो।’
‘ धत्त.. दोनों में से एक भी बात सच नहीं। बल्कि बेटा कह कर तो हम तुम्हारा मान बढ़ाना चाहते हैं कि बेटी होकर भी बेटे से किसी मायने में कम नहीं तुम..’।
‘यानी कि बेटियां बेटों से कमतर होती हैं और बेटा होना सम्मान की बात है ?’ कृष्णा खिलखिलाकर हंस पड़ी तो पायल की रुणझुनी झंकार से भर गया कमरा।
दिवाकर बाबू कृष्णा के तर्क पर चकित थे। इस लड़की ने तो शब्दजाल में फ़ांस लिया। उन्होंने मन के अंदर झाँका।क्या सचमुच बेटा न होने की कसक अभी भी चील की तरह जेहन में फड़फड़ा नहीं रही ? क्या इतने दिनों के प्रयास के वावजूद इस कचोट को तिरिहित कर पाने में सफल हो सके हैं वे ? इस लड़की ने कही भीतर बैठे चोर को विजुअलाइज तो नहीं कर लिया ?
‘ विश्वास करो बेटे, मैं बेटे और बेटी में कतई कोई फर्क नहीं करता। न बेटी पुकारने में किसी तरह की हीनता का बोध ही होता है।’ दिवाकर बाबू के कंठ से टूटे-फूटे लफ्ज निकले तो सही पर एक किस्म की खिसियानी हंसी भी होंठों पर आ पसरी। कृष्णा लरज कर पिता के गले से लग गयी -‘ मैं जानती हूँ पापा, समाज के जेहन में अनंत काल से कुंडली मार कर बैठा बेटों के प्रति सम्मोहन का भाव इतनी जल्दी दरकने वाला नहीं। पर आप तो मेरे बहादुर पापा हैं। मन को दृढ करें और आगे से जब भी पुकारें , पूरे अंतर्मन से , मन के रेशे रेशे से बेटी ही पुकारें। मुझे बेटे का नहीं , बेटी का सम्मान चाहिए पापा..’। दिवाकर बाबू ने भावातिरेक में कृष्णा को अपने से चिपटा लिया -‘ हमारी कृष्णा बेटी ..।’
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