जून 2026

दस्तावेज़आधुनिक हिंदी लघुकथा का उदय     Posted: October 1, 2025

हिंदी गद्य साहित्य में कथा-कहानी का स्थान विशेष महत्त्वपूर्ण रहा है। कथाएँ , न केवल साहित्य का ही स्रोत हैं, अपितु समस्त मानव-संस्कृति का उजला प्रतिबिंब भी हैं। कथाओं के क्षेत्र में भारत का स्थान विश्व में सर्वाधिक प्राचीन, समृद्ध एवं गौरवशाली रहा है, जिसके कथा-शेष ने विश्व कथा-साहित्य को किसी न किसी रूप में अवश्य प्रभावित किया है। कथा-रूप, अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है, जिसके द्वारा किसी विचार, घटना, अनुभूति को पाठक एवं श्रोता तक संप्रेषित किया जा सकता है। इस संदर्भ में श्रीचंद्र जैन ने ‘लोककथा विज्ञान’ में लिखा है : इंसान की समस्त आयु कथाओं के कहने और सुनने में व्यतीत होती है। मानव की बाल्यावस्था इनके सुनने में बीतती है, मदिर जवानी इनके संगठन में लगती है और बुढ़ापा इन कथाओं के अनुभूत तथ्यों से अधिक व्यापक तथा शाश्वत अनुभवों का केंद्र बनता है। वस्तुतः मानव की ज्ञान-गरिमा, नीति-कुशलता, धार्मिकता एवं अध्यात्मवाद की सफल अभिव्यंजना कथाओं के द्वारा ही मुखरित हो रही है।’

परिवर्तन के चक्र में, युगीन परिस्थितियों के साथ-साथ ही साहित्य में भी परिवर्तन आना बहुत सहज एवं स्वाभाविक है, क्योंकि साहित्य सदैव अपने युग का ही प्रतिनिधित्व करता है, इसी कारण अपनी युग सापेक्ष मांग के अनुरूप, प्राचीन कथाओं का उद्देश्य-धर्म, नीति, व्यावहारिकता आदि की शिक्षा देना या किसी आदर्श की स्थापना कर प्रेरणा देना अथवा तत्कालीन समाज का चित्रण करना या मनोरंजन प्रदान करना आदि ही रहा है और वर्तमान में परिवर्तित स्थितियों-परिस्थितियों के अनुसार, बदली हुई मानसिकता के अंतर्गत आधुनिक कथा-साहित्य का उद्देश्य भी बदल गया है। इसका उद्देश्य शिक्षात्मक-मनोरंजनात्मक भूमि से हटकर यथार्थ के धरातल पर आ गया है, जिसके अंतर्गत किसी भी प्रकार की गलत व्यवस्था पर चोट करना, व्यक्ति के बाह्य एवं आंतरिक परिवेश की विकृतियों को उजागर करना तथा ओढ़े गए मुखोटों को नोच-उतारकर उसके वास्तविक रूप से परिचित कराना आदि रहा है, जो वर्तमान युग की परिस्थितिजन्य मांग है ।

वर्तमान यांत्रिक युग की तीव्र गतिशीलता एवं विषमताओं, विसंगतियों से उत्पन्न संघर्षों के मध्य, व्यक्ति का जीवन खंड-खंड हो, टुकड़े-टुकड़े में बंट गया, और इन टुकड़ों से गुजरती उसकी जीवन-यात्रा, दिन-प्रतिदिन जटिल से जटिलतर होती चली गई। भारतीय राजनीतिक क्षेत्र में व्याप्त विकृतियों के कारण जन-सामान्य की पूर्व से चली आ रही अभावग्रस्त स्थितियों में वांछित सुधार होने की अपेक्षा उनका जीवन-स्तर और गिरने लगा। महंगाई, भ्रष्टाचार व बेरोजगारी के चक्रव्यूह से निकलने के बदले, उलटे वे उसमें अधिक फंसते चले गए। सरकारी नौकरियों में प्रवेश, बिना रिश्वत-सिफारिश-चापलूसी के कठिन से कठिनतर होता चला गया। योग्य प्रत्याशी चांदी की खनक या किसी प्रभावशील व्यक्ति से संबंध एवं पहचान के अभाव में चयनित न होने पर दर-दर भटकने के लिए बाध्य होने लगे और अयोग्य व निकम्मे प्रत्याशी इन आधारों एवं तिकड़मों के सहारे चयनित होने लगे। इन अयोग्य व निकम्मे लोगों की भर्ती के कारण अपेक्षित कार्य-कुशलता के अभाव में, कार्य-क्षेत्रों व निर्माण कार्यों की गति अपेक्षाकृत धीमी व गड़बड़ होने लगी। हड़ताल, आंदोलन, तालाबंदी आदि क्रिया-कलापों में प्रमुख लक्ष्य गौण होता चला गया और शासकों व कर्मचारियों के मध्य तनाव बढ़ते चले गए, जिससे आपसी संबंधों में दरारें पड़ने लगीं और जीवन कटु से कटुतर होता चला गया।

देश की शासन-व्यवस्था के अंतर्गत सत्ताधारियों का लक्ष्य पद-प्राप्ति एवं उसकी सुरक्षा के साथ निजी आर्थिक लाभ तक ही सिमटकर रह गया, जन कल्याण की भावना, मात्र उनके वक्तव्यों-भाषणों की रेशमी डोरी में गुंथकर सरकारी कागजों की यात्रा में ही बनने-बिगड़ने लगी। चुनाव-यात्रा में सभी प्रकार के वैध-अवैध हथकंडे अपनाए जाकर, अर्थ एवं आतंक के बल पर, विशेषकर ग्रामीणों एवं अशिक्षितों से वोट ऐंठे जाने लगे, जिससे दल की शक्ति के बदले दल-बदलुओं के आवागमन की गति बढ़ने लगी और शासन व्यवस्था की नीतियों, उद्देश्यों व कार्यप्रणालियों से अनभिज्ञ व्यक्ति शासकीय पदों पर आरूढ़ होने लगे। दूरदर्शिता, ईमानदारी, श्रम, निष्ठा व नैतिकता के अभाव में राष्ट्रीय उत्पादन कम व विदेशी कर्ज अधिक बढ़ने लगा। शासकों की लापरवाही, उपयोगिता से लाभ तो कम, किंतु उनकी शर्तों के शिकंजों की जकड़न अधिक बढ़ने लगी। साथ ही, सत्ताधीशों द्वारा अपने ईमानदार, राष्ट्र-हित-चिंतक, कर्तव्यनिष्ठ, निर्भीक एवं कर्मठ सहयोगियों का राजनीति से किसी न किसी तरह पत्ता ही काट दिया जाने लगा ताकि उनके निजी स्वार्थ-लाभ में कोई बाधक तत्त्व न रहें और चापलूस, ‘जी-हुजूर’ व्यक्तियों-पिछलग्गुओं को महत्त्व दिया जाने लगा। फलस्वरूप जन-असंतोष की लहर बढ़ती चली गई।

देश में, सन् 1962 में चीन व सन् 1965 में पाकिस्तान द्वारा हुए आक्रमणों के अंतर्गत युद्ध-व्यय तथा सन् 1970-71 में पाक-बांग्ला विवाद से उत्पन्न परिस्थितियों में हुए अतिरिक्त व अप्रत्याशित व्यय के भारस्वरूप देश की अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने लगी। मुद्रा की क्रयशक्ति घट गई, जिससे महँगाई, चोर-बाजारी आदि बढ़ने लगी। देश के इस आर्थिक संकट का प्रभाव सभी क्षेत्रों पर पड़ा।

सन् 1975-77 के मध्य देश में लगी आपातकालीन स्थिति में, कुछ तानाशाही नीतियों के अंतर्गत चल रहे सरकारी दमनचक्र के नीचे, अनेक निर्दोष, असहाय व्यक्तियों को भी अकारण पिसना पड़ा। प्रकाशन एवं प्रसारण आदि सभी क्षेत्रों में आंतरिक सुरक्षा कानून के अंतर्गत लगाए गए सरकारी प्रतिबंधों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगा दी। फलस्वरूप, होते जा रहे शोषण के लिए कुछ कह न पाने की विवशता एवं छटपटाहट से, व्यक्ति का मूक आक्रोश उसके अंदर ही अंदर सुलगता-बुझता रहा।

सन् 1977 में चुनाव चक्र के अंतर्गत हुए सत्ता-परिवर्तन से, देश में प्रथम बार विरोधी पक्ष की सरकार बनी। तत्कालीन वातावरण के आतंक से मुक्त हो जनता भविष्य के नए सुनहरे स्वप्न देखने लगी, किंतु कुछ पद-लोलुप मंत्रियों, नेताओं द्वारा पद के लिए आपस में ही झगड़ते रहने के कारण शासन की नैया डावांडोल हो गई और जनता के स्वप्न बिखर गए। सत्तारूढ़ दल की सरकार बनी, फलस्वरूप शासकीय नीतियों-रीतियों में फिर परिवर्तन हुए। इस प्रकार राजनीतिक उथल-पुथल समय-समय पर जन-जीवन को प्रभावित करती रही, शासकों की पद-लोलुपता, स्वार्थपरता, पक्षपात, थोथे आश्वासन, कृत्रिम सहानुभूति, भ्रष्टाचार, ढोंग, अनैतिकता के कारण जन-साधारण का राजनीति से विश्वास उठने लगा और स्वप्न भंग की स्थितियों से उत्पन्न पीड़ा उन्हें अंदर ही अंदर मथने लगी।

वैचारिक मंथन से युवा पीढ़ी में जो चेतना जागृत हुई, उसकी प्रतिक्रिया सामाजिक धरातल पर हुई। सामाजिक सम्मान प्राप्त करने के लिए रचे गए ढोंग, आडंबर एवं किसी भी प्रकार के बाह्य प्रदर्शन के प्रति युवा पीढ़ी को अरुचि होने लगी, परंपरागत निरर्थक रीति-रिवाजों व जीवन-मूल्यों के बोझ से मुक्ति पाने के लिए उसकी छटपटाहट बढ़ती चली गई। संबंधों में निहित रूढ़ अर्थ का खोखलापन उसे कचोटने लगा तथा उन्हें ढोते रहने की तत्परता भी समाप्त प्राय-सी होने लगी।

धार्मिक विश्वास, अनुष्ठान, कर्मकांड, पूजन, मंदिर, देवी-देवता आदि सभी के प्रति उसकी रूढ़ श्रद्धा एवं अंधविश्वासों का अवमूल्यन होता चला गया। आदर्शदादिता व त्याग के स्थान पर उसका दृष्टिकोण भोगवादी एवं उपयोगितावादी होने लगा। धर्म, अध्यात्म को वह तर्क की कसौटी पर परखने लगा। हर जगह उसे कृत्रिमता दृष्टिगोचर होने लगी। फलस्वरूप सभी ओर से उसके विश्वास खंड-खंड हो बिखरने लगे।

बिखरते विश्वासों की किरचें, उसके पारिवारिक जीवन को भी रक्तिम करने लगीं। संबंधों के अंतर्गत पितृ वर्ग के प्रति भी, इस युवा पीढ़ी की निरंतर बदलती हुई दृष्टि, पहले श्रद्धा, फिर दया, फिर उदासीनता और अंत में उपेक्षा से होती हुई उपहास व तिरस्कार की सीमा पर पहुँच गई। प्रणय ग्व परिणय के क्षेत्र में नारी-पुरुष के परस्पर संबंधों की घुटन, चाहत से बदलते-बदलते उदासीनता, फिर विरक्ति और बाद में उपेक्षा व घृणा के स्तर को छूने लगी। परस्पर संबंधों के निभाव की कटुता का अहसास दिन-प्रतिदिन अधिक नग्न होता चला गया और पारदर्शी अहसास की चुभन पल-प्रतिपल अधिक बढ़ती चली गई। फलस्वरूप पारिवारिक संबंधों की इकाई खंड-खंड हो टूटने लगी। प्रणय का अर्थ मात्र वासना में केंद्रित होने लगा। प्यार की गरिमा जैसे मंदिर से निकलकर आम चौराहों पर विक्रय की वस्तु बन गई। परिणय-बंधन की प्रतिज्ञाएँ  एवं संबंधित दायित्वों की जकड़न दोनों ओर से ढीली पड़ने लगीं। पति-पत्नी संबंध मात्र ‘देह’ व ‘अर्थ’ की सुख-सुविधा के लिए टूटने-जुड़ने लगे।

दैनिक संघर्षों से उत्पन्न पीड़ा एवं जिजीविषा के मध्य, टूटा हुआ पुरुष पेंडुलम सा झूलने लगा। आर्थिक अभाव, टूटते विश्वास, विघटित परिवार एवं रिसते संबंधों के अंतर्गत असहाय, असुरक्षित व बेबस नारी आंतरिक रूप से बिखरती चली गई, किंतु उसका स्वाभिमान उसे संघर्षों से टक्कर ले सकने का बल देता रहा तथा शोषण करने वाली व्यवस्था में टंगे सम्मानसूचक चमकीले शब्दों- ‘पति परमेश्वर’, ‘गृह लक्ष्मी’ आदि को उसने तर्क द्वारा उतार फेंका। अंतर्द्वन्द्वों से उत्पन्न पीड़ा उसे अपने प्रति आरोपित सारे नारी आदर्शों को झटककर सुविधाभोगी बन जाने को प्रेरित करने लगी। परस्पर अहम् के टकराव ने नारी-पुरुष के ‘जन्म-जन्मांतरों के बंधन’ की सनातन कल्पना को दफनाकर उसके पास तलाक के गुलाब का पौधा रोप दिया, जिसकी मधुर महक कभी उसके अहसासों को स्पर्श कर ताजगी देने लगी तो कभी उसके तीखे शूल उन्हें रक्तिम करने लगे। आपसी अपेक्षाओं की टूटन ने उपयोगितावादी दृष्टिकोण को जन्म दिया। फलस्वरूप संबंधों का बंधन छिन्न-भिन्न होने लगा तथा आपसी तनाव बढ़ते चले गए।

मध्यवर्गीय व्यक्ति की स्थिति और अधिक दयनीय होती चली गई। हर चरण पर उसे अनचाहे समझौते करते रहने को बाध्य होना पड़ा। जर्जर परंपराओं की आड़ में तथाकथित सम्मान के मोह की जकड़न, उसके पलायन में बाधक बनती रही और सभ्यता के बोझिल बाह्य आवरण को उतारने में वह असमर्थ ही रहा, चाहकर भी उससे मुक्त हो हलका न हो पाया और अपनी ही असमर्थताओं एवं विवशताओं के मध्य भटकता अर्थसंकट के चक्र में पिसता रहा। गलत व्यवस्था को अपने स्वार्थ लाभ में निरंतर बनाए रखने के लिए शोषक वर्ग, शोषितों को मधुर भ्रम की भूल-भूलैया में भटकाते रहे और उनके इस अंतहीन भटकाव की पीड़ा से उत्पन्न, उनका जमा हुआ आक्रोश, शोषकों के षड्यंत्रों की तपन से पिघल-पिघलकर बहता रहा। वे असहाय-निरुपाय-से जड़वत् इस पिघलाव के दर्द को मूक बने देखते रहे और विवश- से बने बदतर जीवन जीने को बाध्य होते रहे। युवा वर्ग ने किसी सीमा तक इन षड्यंत्रों को पहचाना और इनके विरुद्ध टक्कर लेने के क्रम में सर्वप्रथम अपने स्वयं से ही टक्कर ले सकने का साहस किया। पारंपरिक लकीरों को पीटने में विश्वास न रखने और पीटने के प्रति इन्कार कर देने के कारण वह समाज से कटता चला गया। पारिवारिक संबंधों का निभाव उसके लिए चुनौती बन गया। भावशून्य खोखले संबंधों के कारण वह कहीं भी जुड़ाव अनुभव नहीं कर पाया। संबंधों की आधारभूमि ‘अर्थ’ से परिचालित हो जाने के कारण स्वयं को निपट एकाकी महसूस करने लगा। प्रेम-प्यार, स्नेह-ममत्व आदि भावनाएँ  भी उसे खोखली एवं ठंडी लगने लगीं। ऊष्णता विहीन संबंध, उसके लिए जटिल समस्याओं के विधायक बनते चले गए। जीवन की दिशाहीनता, दुर्निवार कटुताएँ, अवमूल्यित नैतिकता, दंशित आर्थिक चक्र, तार-तार होते संबंध, टूटते विश्वास, बिखरती महत्वाकांक्षाएँ, जीवन मूल्यों का खोखलापन, शोषण से उत्पन्न तनाव आदि उसे ग्रसते चले गए।

इस प्रकार राजनीतिक, सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक सभी क्षेत्रों की जटिलताओं के चक्रव्यूह में व्यक्ति फंसता चला गया, किंतु उसकी जिजीविषा उसे इन संघर्षों से जूझ सकने का बल एवं साहस देती रही और जीवन ‘जैसा भी है’ उसे जीने के लिए उसका मोह उसे बाध्य करता रहा। चूँकि साहित्य के रूप, जीवन को समझने के भिन्न-भिन्न माध्यम हैं। अज्ञेय के अनुसार, ‘जीवन को समझने के भिन्न-भिन्न माध्यम हैं। जीवन से जो मिलता है, उसको दूसरों तक पहुँचाना साहित्यिक कर्म है। जो दूसरे तक पहुँचता नहीं, अपने को अभिव्यक्त करता है, मैं उसको साहित्य नहीं मानता। दूसरा नहीं है तो साहित्य नहीं है। साहित्य में दूसरों तक पहुँचने की तड़प होनी चाहिए।’ (सारिका : 1 जुलाई, 1978)

अतः जीवन-यात्रा में हुए विविध अनुभवों के अंतर्गत बाह्य एवं आंतरिक संघर्षों के क्षणों को वाणी देने के लिए अभिव्यक्तिकरण की दिशा में अपने भटकाव के मध्य एक रास्ता पा लेने की छटपटाहट ने नई पीढ़ी को, उपन्यास-कहानियों की भीड़ से निकाल, खुले मैदान में ला खड़ा किया, जहां वह घुटन से मुक्त हो खुली सांस ले सके, यथार्थ के आलोक में सही दिशा ज्ञात कर उस ओर नया चरण रख सके और इस यात्रा में उसे सर्वप्रथम आवश्यकता हुई- अभिव्यक्ति के किसी ऐसे माध्यम की, जो उसके खंड-खंड जीवन की जटिलताओं एवं संघर्षों के बीच गुजरती सूक्ष्मतर संवेदनाओं को व्यक्त करने में समर्थ हो सके, जो हर गलत व्यवस्था पर प्रहार करने एवं नए सार्थक जीवन-मूल्यों के लिए भूमि तैयार कर सकने में उसका सहायक हो सके तथा सामाजिक परिवर्तन हेतु क्रांतिकारी भूमिका निभाने में सक्षम हो सके। इसके लिए नई भावभूमि और भिन्न शिल्प की खोज अपेक्षित थी और इसी खोज का परिणाम रही आधुनिक हिंदी लघुकथा ।

आधुनिकता, एक सविशेष जीवन-दृष्टि व गतिशील प्रक्रिया है। अपने परिवेश व मूल्यों से निरासक्त व्यक्ति का अपनी युगीन परिस्थितियों के प्रभावों की प्रतिक्रिया से उत्पन्न स्वतंत्र वैचारिक आधार है, जिसमें जीवन के नए संदर्भों की उत्सुकता-भरी खोज की व्याकुलता है, यथार्थ की सूक्ष्म और बहुत गहरी पकड़ है। इस संदर्भ में ‘नई कहानी के विविध प्रयोग’ में पांडेय शशिभूषण ‘शीतांशु’ के विचार दृष्टव्य हैं: ‘आधुनिकता एक प्रक्रिया है, आदमी को जीने वाली जिंदगी से रू-ब-रू कराने का यथार्थ है, समय की यथार्थ अनुभूति और संवेदना की देन है, सच्चाई और प्रामाणिकता के बीच से गुजरने की अनुभूतिपरक प्रक्रिया है, परिस्थितिगत द्वंद्व का सत्यांकन, ढेर सारे प्रच्छेदों तथा आवरणों के तलातल की अन्वेषणा है।’

चूंकि लघुकथा, आधुनिकता के धरातल पर अवस्थित है, इसीलिए उसके साथ जुड़ा ‘आधुनिक’ शब्द एक सविशेष दृष्टि का सूचक है, जो परंपरागत आधारों से हटकर है। लघुकथा में ‘लघु’ शब्द से आशय-उसके कथ्य के संपूर्ण प्रभाव को सुरक्षित रखते हुए शाब्दिक मितव्ययिता के फलस्वरूप हुए आकार के सीमित मर्यादित रूप की लघुता से है। ‘कथ्’ धातु से व्युत्पन्न ‘कथा’ शब्द का साधारण अर्थ है-वह, जो कहा जाए। ‘कहने’ में ‘सुनने’ की संभाव्यता निहित है। ‘कथा’ शब्द का प्रयोग सामान्यतया किसी ऐसी घटना के लिए किया जाता रहा है, जिसका परिणाम भी निश्चित-सा हो, इस रूप में लघुकथा के शाब्दिक अर्थ से आशय हुआ – ‘लघु आकारीय गद्य-कथात्मक रूप में, जीवन के किसी प्रभावी क्षण, मनःस्थिति, विचार या घटना की वह पैनी अभिव्यक्ति, जो अपने प्रखर ताप से पाठकों को प्रभावित कर उनकी चेतना को उद्दीप्त कर सके

तथा उन्हें कोई गंभीर चिंतन-बीज सौंप सके।’ लघुकथा की परिभाषा के बारे में यह कहा जा सकता है कि उसकी अभी तक कोई एक सर्वसम्मत परिभाषा नहीं है, बल्कि जितने लघुकथा लेखक हैं, उतनी ही परिभाषाएँ  हैं, सभी ने अपने अपने ढंग से लघुकथा को परिभाषित किया है, और मुख्य बात यह है कि उनमें अंतर मूल बिंदु का न होकर मात्र शब्दों के हेर-फेर का ही है।

कुछ प्रमुख विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाएँ  दृष्टव्य हैं : ‘…यह किसी प्रकार का सार-संक्षेप न होकर, कहानी की ही पृष्ठभूमि पर उसके स्वरूपात्मक संदर्भों से जुड़ी, वह लघु रचना है, जिसमें केवल शब्द ही सीमित होते हैं, चिंतन नहीं। इसके कथानक प्रतिबंधित नहीं, अपितु मर्यादित होकर, कथ्य का निर्वाह करते हुए सीधे और सपाट ढंग से विषय में निहित मर्म का प्रतिपादन करते हैं।’ (रमेश बतरा : साहित्य निर्झर, जून, 1974) उक्त परिभाषा के अंतर्गत लघुकथा में बोध, नीतिपरक, आदर्शात्मक, उपदेशात्मक कथ्य भी सम्मिलित किए जा सकते हैं, जबकि उपदेशात्मक या आदर्शात्मक प्रयोजन से लघुकथा दूर है। यह एक ऐसी विधा है, जो कम शब्दों में प्रस्तुत विचार की सशक्त अभिव्यक्ति कर सकने की क्षमता रखती है।’ (भगीरथ : गुफाओं से मैदान की ओर, 1974) किसी जटिल संरचना को सरलता और सहजता से समझ सकने में विभाजीकरण या संक्षेपीकरण की प्रक्रिया अपना महत्त्व रखती है, इस दृष्टि से यांत्रिक युग की अनुभूतिपरक जटिलताओं को अपेक्षाकृत छोटी इकाइयों में बाँटकर ग्रहण एवं प्रस्तुतीकरण की लेखकीय चेष्टा ही लघुकथा है।’ (मोहन राजेश : साहित्य निर्झर, जून, 1974)

…. लघुकथा एक बड़ी सुगठित क्रिया, आम तौर पर सीधी और कंडेस्ड, तीव्रता कुछ इतनी कि किसी एकांगी क्षण को जीती लगे, उसे घेरती लगे।’ (कृष्ण कमलेश : मोहभंग, 1975) … यह छोटे-से आकार में जीवंत क्षणों की सशक्त, मौलिक अभिव्यक्ति है।’ (डॉ. सतीश दुबे : प्रतिनिधि लघुकथाएँ, 1976)

…. लघुकथा कम से कम शब्दों का वह रूप-विधान है, जिसकी परिवेश से जुड़ी सघन अर्थवत्ता हमारी चेतना को एकदम झकझोरकर रख देती है।’ (शंकर पुणतांबेकर : श्रेष्ठ लघुकथाएँ , 1977) यद्यपि ये सभी परिभाषाएँ  लघुकथा की छवि स्पष्ट करने में समर्थ हैं, तथापि परिभाषा, चाहे वह किसी भी विधा की हो, वही अधिक उपयुक्त एवं सार्थक मानी जाती रही है, जिसमें उस विधा को संपूर्णता देने तथा उसका रूप स्पष्ट करने की क्षमता हो। चूंकि इन परिभाषाओं में लघुकथा के गद्य कथात्मक रूप का संदर्भ अस्पष्ट है, इसीलिए इनके अंतर्गत वे रूप भी सम्मिलित हो जाते हैं, जो लघुकथा से भिन्न हैं। उदाहरणार्थ क्षणिका, नवगीत, कविता आदि पद्यात्मक रूप, क्योंकि इनमें भी कम शब्दों में किसी क्षण, विचार, घटना अनुभूति आदि की सशक्त अभिव्यक्ति एवं सघन अर्थवत्ता संभावित होती है, और लघुकथा केवल गद्यात्मक कथा-रूप से संबंधित होती है, पद्यात्मक रूप से नहीं।

यद्यपि इन परिभाषाओं में आए ‘लघुकथा’ शब्द से उसके गद्य-कथात्मक होने का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है, तथापि किसी भी परिभाषा में ‘अनुमान’ की अपेक्षा ‘स्पष्ट रूप’ का महत्त्व अधिक माना जाता है। इसीलिए लघुकथा की परिभाषा में उसके गद्य-कथात्मक रूप का उल्लेख, उसको स्पष्ट करने के लिए आवश्यक हो जाता है। ‘क्षण’ के संदर्भ में कहानी के लिए उल्लेखित स. ही. वात्स्यायन अज्ञेय के शब्द लघुकथा पर भी लागू होते हैं : ‘कहानी क्षण का चित्र प्रस्तुत करती है। क्षण का अर्थ, आप चाहे एक छोटा कालखंड लगा लें, चाहे एक अल्पकालिक स्थिति, एक घटना, एक प्रभावी डायलॉग, एक मनोदशा, एक दृष्टि (बाह्य या आभ्यंतर), झांकी, संत्रास, तनाव, प्रतिक्रिया, प्रक्रिया…’

लघुकथा जीवन के छोटे-छोटे अंशों को सूक्ष्मदर्शक यंत्र से देखने का प्रयास करती है, सूक्ष्मतर संवेदनाओं को वहन कर उन्हें प्रभावी ढंग से पाठकों-श्रोताओं तक संप्रेषित करती है और उन्हें ‘कुछ’ सोचने पर बाध्य कर देती है। ये क्षण जब लघुकथा में आकार पाते हैं तो एक पूरे परिवेश का बिंब प्रस्तुत करते हैं और ‘नावक के तीर’ की तरह गंभीर घाव कर सकने की क्षमता भी रखते हैं।

मात्र ‘लघुकथा’ शब्द या नाम नया नहीं है। यह प्राचीन काल से किसी भी प्रकार की छोटी लघु आकारीय कथा-कहानी के लिए प्रयुक्त होता रहा है, चाहे वह नीति-बोध, आदर्श-उपदेशपरक कथा हो या किसी तथ्य निरूपण के लिए गढ़ी गई कथा हो अथवा किसी विचार संप्रेषण की सुविधा हेतु दिए गए किसी दृष्टांत का कोई रूप हो या कि कोई प्रेरक, मनोरंजक प्रसंग हो अथवा किसी लंबी कहानी का संक्षिप्त रूपांतरण हो, किंतु वर्तमान में इस ‘लघुकथा’ शब्द का अर्थ, इन सबसे भिन्न एक विशिष्ट कथा-रूप में रूढ़ हो गया, जो एक विशेष प्रकार की कथा के रूप का बोध कराता है, साथ ही जिसमें नीति, आदर्श, उपदेश का बोझिलपन नहीं है और जो शिक्षात्मक एवं मनोरंजनात्मक प्रयोजन से भी दूर है।

आज ‘लघुकथा’ नाम से साहित्य की जिस कथात्मक स्वतंत्र इकाई की पहचान उभरती है, वह न केवल कथ्य, शिल्प, अपितु उद्देश्य एवं प्रभावोत्पादक क्षमता की दृष्टि से भी उस प्राचीन स्वरूप से बहुत भिन्न है। लघुकथा के इस स्वरूप से अनभिज्ञ कई संपादकों-रचनाकारों की दृष्टि में ‘लघुकथा’ का अर्थ, किसी भी प्रकार की लघु आकारीय गद्य रचना से रहा है। अनेक पत्र-पत्रिकाओं, लघुकथा-संग्रहों व संकलनों, तथा ‘विशेषांकों’ आदि में ‘लघुकथा’ स्तंभ एवं शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित लघुकथाओं में लघुकथा के नाम पर गद्य के विविध रूप यथा- देशभक्ति प्रसंग, कथा-संक्षेप, पैरोडी, किंवदंती, पुराण-अंश, उपन्यास-अंश, लोक कथा, संस्मरण, घटना, व्यंग्य-लेख, कहानी, व्यंग्य-कथा, चुटकुला, प्रेरक प्रसंग, वक्तव्य आदि-आदि जाने-अनजाने में प्रस्तुत किए जाते रहे। यद्यपि इन सबसे लघुकथा शब्द की व्याप्ति एवं प्रचार-प्रसार में तो सहयोग ही मिला, किंतु एक भ्रामक दृष्टिकोण भी विकसित हुआ, सामान्यतया यह समझा जाने लगा कि मात्र लघु-आकारीय गद्य में कुछ भी कह देना ‘लघुकथा’ है। यह सब विधा के प्रति किसी षड्यंत्र की दृष्टि से नहीं, अपितु लघुकथा को गंभीरता से न लेने के कारण ही होता रहा; और इसी कारण कामतानाथ ने भी (सारिका : 1 अक्टूबर, 1975 में) अपना लघुकथा संबंधी एकांगी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया : ‘भई, लघुकथा तो मेरी दृष्टि में बकवास है, महज मन बहलाने का सामान, और चुटकुलों से थोड़ा ऊपर ।’

किसी भी विधा में कोई रचना या किसी एक दृष्टिकोण की कुछेक रचनाएँ, किसी विशेष या प्रतिबद्ध दृष्टिकोण से ‘बकवास’ हो सकती है, किंतु बिना तर्क-कारण दिए समूची विधा को ‘बकवास’ घोषित करना उस विधा के प्रति न्यायसंगत दृष्टिकोण नहीं माना जाता। संभव है कि सही लघुकथाएँ  उनके दृष्टिपथ से न गुजरी हों, किंतु किसी भी विधा को बिना समग्रता से जाने, बिना गहनता से परखे सार्वजनिक रूप से किसी स्तरीय व जिम्मेदार पत्रिका में, किसी प्रतिष्ठित साहित्यकार के द्वारा उसे बिना कारण दिए ‘बकवास’ घोषित किया जाना, उस विधा के प्रति न्यायसंगत दृष्टिकोण न होकर मात्र एकांगी मत ही सिद्ध होता है, जो उपयुक्त नहीं लगता, साथ ही जो विधा ‘बकवास’ है, वह ‘मन बहलाने का साधन’ कैसे हो सकती है ? और जो ‘महज मन बहलाने का साधन’ है, वह ‘चुटकुलों से थोड़ा ऊपर’ किस रूप में है, यह स्पष्ट नहीं है। लघुकथा चूंकि मनोरंजनात्मक प्रयोजन से दूर है, इसीलिए वह न चुटकुलों की श्रेणी में आती है और न ही ‘महज मन बहलाने का साधन’ बनी है, उसका लक्ष्य तो गलत व्यवस्था पर चोट कर उस व्यवस्था के प्रति पाठकीय चेतना को झकझोरने, उसे कुछ सोचने पर बाध्य करना है, उसका मनोरंजन करना नहीं। अतएव इस संदर्भ में कामतानाथ के विचार, तर्क-सम्मत न होकर, एकांगी दृष्टि के सूचक हैं, जो उपयुक्त नहीं हैं।

इसी तरह ‘नवतारा : प्रतिक्रिया अंक’ में मीनू व्यास कहती हैं : ‘लघुकथा वह होती है, जो पुरानी कथाओं, लोककथाओं को आधार मानकर लिखी जाए ।’ अर्थात् ‘पुरानी कथाओं’ व ‘लोक कथाओं’ पर आधारित लघुकथाएँ  ही ‘लघुकथाएँ ‘ हैं और जो उन पर आधारित नहीं हैं, वे ‘लघुकथाएँ ‘ नहीं हैं। किंतु उन पुरानी कथाओं का वह ‘आधार’ क्या है, किस रूप में है और क्यों आवश्यक है, यह स्पष्ट नहीं है। यदि उनका आशय लोककथा की शैली से है तो वह आधार उपयुक्त नहीं ठहरता, क्योंकि लघुकथा की शैली, कथानक की बुनावट, सपाटबयानी, भाषा के तेवर आदि लोककथात्मक शैली से भिन्न पड़ते हैं और यदि कथ्य या उद्देश्य से आशय है तो वह भी समीचीन नहीं लगता, क्योंकि लघुकथा के कथ्य, सामान्यजन के यथार्थ जीवन की विसंगतियों, विषमताओं एवं संघर्षों से जूझते क्षण रहे हैं। ये प्राचीन कथाओं के कथ्य की तरह अतिरंजित सामाजिक चित्रण, अलौकिक या अतिमानवीय प्रसंग, आदर्श या उपदेशपरक घटनाएँ  नहीं हैं। साथ ही दोनों के उद्देश्य में भी अंतर है। लघुकथा का उद्देश्य प्राचीन व लोककथाओं के उद्देश्य की तरह शिक्षात्मक या मनोरंजनात्मक नहीं है। दोनों के जीवन-मूल्यों में भी भिन्नता है। फिर वह ‘आधार’ कौन-सा है, जिस पर लघुकथा का आधारित होना ही उसकी पहचान है, यह उन्होंने नहीं बताया। यदि कथ्य, शिल्प, उद्देश्य आदि सभी में हू-ब-हू लोककथा या पुरानी कथा जैसी ही होना आवश्यक है, तब इस लघुकथा विधा की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि उन पुरानी कथाओं या लोककथाओं का भंडार तो वैसे भी यथेष्ट में है, और फिर वर्तमान यांत्रिक जीवन में उनके दोहराव की न तो कोई उपादेयता है, और न ही उसका कोई औचित्य। उन प्राचीन संदर्भों, चरित्रों के उलट, उन्हें आधुनिक परिवेश में आरोपित कर प्रस्तुत करने का भी कोई अर्थ या मूल्य नहीं है, क्योंकि ऐसा सृजन मौलिकता से रहित होता है तथा अपेक्षित गंभीरता खोकर हलके स्तर का या पैरोडी मात्र रह जाता है। फिर कुछ निश्चित चरित्रों, घटनाओं, विचारों आदि का पुनः-पुनः वही दोहराव भी लंबे समय तक नहीं चल सकता। एक ही प्रकार की विषय-सामग्री या निश्चित कथ्यों का पठन, पाठकीय रुचि में नीरसता पैदा करता है। और नीरसता किसी भी प्रकार के मूल्य का निर्माण नहीं करती, बल्कि व्यक्ति को जड़ बना देती है और किसी भी साहित्यिक विधा का उद्देश्य व्यक्ति को जड़ बनाना नहीं होता। अतएव उनकी यह ‘पुरानी कथाओं’ एवं लोककथाओं के आधार की कसौटी, लघुकथा के लिए न केवल अनुपयुक्त है, बल्कि औचित्यविहीन भी लगती है।

इस प्रकार कुछ संपादकों, रचनाकारों द्वारा लघुकथा को गंभीरता से न लेने-परखने के कारण यह भ्रामक दृष्टिकोण विकसित होने लगा कि लघ्वाकारीय गद्य में किसी भी घटना, प्रसंग, आदर्श, संस्मरण, नीति-बोध आदि की प्रस्तुती या किसी लंबी रचना का सार संक्षेप आदि सभी ‘लघुकथा’ हैं, किंतु कुछ प्रबुद्ध युवा लघुकथा लेखकों ने अपने साधनों के अभाव में भी, इस भ्रामक दृष्टिकोण के अंतर्गत लड़खड़ाती लघुकथा को थामने के हर संभव प्रयास किए। फलस्वरूप वह संभलती चली गई। न केवल वह संभली ही, बल्कि कम समय में जिस तीव्र गति से उसने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई, वह उसके महत्त्व का स्वतः सिद्ध प्रतिपादन है।

‘उपन्यास संपूर्ण जीवन का, कहानी जीवन के किसी खंड का और लघुकथा, खंड के किसी प्रभावी क्षण का चित्र है। उपन्यास की अपेक्षा कहानी में अनुभूति ताप का घनत्व अधिक प्रखर होता है, और कहानी की अपेक्षा लघुकथा में और भी अधिक। जिस तरह एक कमरे में दीवार पर लगे हुए ‘बल्ब’ के प्रकाश का दायरा साधारणतः पूरा कमरा ही होता है, अतः वह अपनी विस्तृत सीमा में इतना सघन-तीव्र प्रकाश नहीं दे पाता, जितना कि वह किसी ‘टेबल लैंप’ में लगकर वांछित स्पेस में दे सकता है। अतः वह कथ्य, जो कहानी के लिए अपर्याप्त रहता है, अथवा कहानी के विस्तार व वर्णनों के बोझ तले अप्रभावी या धूमिल हो सकता है, लघुकथा के माध्यम से प्रखर प्रभावशाली बन सकता है और अपनी बात को, उसके समग्र प्रभाव सहित, पाठक तक संप्रेषित कर सकता है।

कहानी में प्रायः एक से अधिक मनःस्थितियाँ  परस्पर गुंथी रहती हैं, अतएव उनमें से किसी एक सूक्ष्मतर स्थिति का अलग से स्वतंत्र अस्तित्व या विशिष्ट प्रभाव नहीं होता; अपितु सभी का समन्वित रूप से कुल प्रभाव होता है, जबकि लघुकथा के माध्यम से वही स्थिति अपना चरम निखार प्राप्त कर सकती है। उदाहरण के लिए, आभूषणों के अंतर्गत नाक की नथ में अन्य नगों के साथ जड़ा हुआ कोई छोटा नग अपना अलग से उतना प्रभाव नहीं देता, जितना कि वह नाक की ही किसी लौंग या कील में जड़ा जाकर दे जाता है। स्पष्ट है कि नाक की लौंग आकार में बहुत छोटी होती है, वह अपने नग के अनुपात के सापेक्ष ही गढ़ी जाती है। अतः अपने अनुरूप दायरे में वह नग प्रखर प्रभावयुक्त बन जाता है, जबकि नथ के बड़े दायरे में अन्य नगों के मध्य वह अपनी स्वतंत्र पहचान देने में असमर्थ रहता है। अतः वे सूक्ष्म कथ्य, जो कहानी के विस्तार में अपना स्वतंत्र प्रभाव खो देते हैं, लघुकथा के माध्यम से सघन प्रभावशील बन जाते हैं और इस रूप में लघुकथा, कहानी की प्रतिद्वंद्वी या स्थानापन्न न होकर उसकी पूरक रचना-विधा कही जा सकती है।

कुछ विद्वानों द्वारा लघुकथा व कहानी में किसी प्रकार का अंतर न किया जाकर है, जिन्हें लघुकथा नहीं माना जा सकता, यथा ‘सारिका’ के जून, 1973 के अंक में ‘लघुकथाएँ ‘ स्तंभ के अंतर्गत प्रकाशित लघुकथाओं में राजगोपालाचारी की लघुकथा ‘झूलनी’ में संपादकीय टिप्पणी दी गई है ‘एक तमिल कथा संक्षेप’ । उसी तरह गुरजाड अप्पाराव की लघुकथा ‘सुधार’ के लिए भी लिखा है: ‘एक तेलुगु कथा-संक्षेप’ तथा टी. नागेश्वर राव की लघुकथा ‘नुक्कड़ वाला खेत’ के लिए भी टिप्पणी है : ‘एक तेलुगु कहानी का संक्षेप’; और ये सब ‘लघुकथाएँ ‘ खंड के अंतर्गत लघुकथा के रूप में ही प्रस्तुत की गई हैं, किंतु जिस तरह कहानी, उपन्यास का सार संक्षेप नहीं होती, उसी तरह लघुकथा भी कहानी का सार संक्षेप नहीं है, प्रत्युत कहानी की सहयात्री है, उसके कथात्मक रूप से जुड़ी एक स्वतंत्र इकाई है। ‘समग्र’ के लघुकथा विशेषांक जून, 1978 में व्यक्त रमेश बतरा के शब्दों में ‘दोनों अपने-अपने दायित्व में परस्पर पूरक हैं, कहानी जहाज है, अतः एक कहानी का डूबना एक युद्धपोत का डूबना है, लघुकथा उसके साथ नाव-सुरक्षा का काम करती है।’

‘छोटी-बड़ी बातें’ में अवधनारायण मुद्गल के मतानुसार ‘लघुकथा, समूची कथा-धारा की एक उपधारा है, और इसे मुख्य धारा से उसी रूप में अलग किया जा सकता है, जब हम उपन्यास को एक नदी, कहानियों को नहरें और लघुकथाओं को उप-नहरें मान लें। इन उप-नहरों का अपना अलग अस्तित्व और महत्त्व है। दूरदराज की जिस बंजर जमीन को नहरों से नहीं जोड़ा जा सकता, उसे उप-नहरों से जोड़कर उपजाऊ बनाया जा सकता है।’

आकार का प्रश्न भी लघुकथा के लिए विवादास्पद रहा है। यद्यपि आकार का प्रश्न कोई महत्त्व नहीं रखता, और न ही मात्र आकार की लघुता के आधार पर ही लघुकथा को महत्त्व मिला, क्योंकि मात्र आकार का ही छोटा या बड़ा होना किसी भी विधा के लिए मूल्य स्थापित नहीं कर सकता। लेखन वही मूल्यवान-महत्त्वपूर्ण माना जाता है, जो अपने युगीन जनजीवन की परतें उघाड़, पाठकों को उसके नग्न यथार्थ से परिचित करवा सके, जो शोषक और शोषित दोनों के मध्य पुल बन, उन्हें उनके उत्थान व पतन पर लगे प्रश्नचिह्न से अवगत करा, ‘सही’ करने के प्रति चेतना जागृत कर सके, जो हर ‘गलत’ के विरुद्ध संघर्ष कर सकनेवाली जुझारू भूमिका निभा सके तथा जो सामान्यजन के दुःख-दर्द को वहन कर उन्हें यथावत् पाठकों तक संप्रेषित कर कुछ सोचने पर बाध्य कर सके। चूंकि लघुकथा में इन क्षमताओं का अभाव नहीं है, इसीलिए यह मूल्यवान बनी है, मात्र आकार की लघुता के कारण ही नहीं।

फिर भी, आकारीय लघुता इसकी एक विशेषता मानी गई है। इसीलिए कुछ विद्वान्, शब्दों में किसी निश्चित संख्या के आधार पर, इसके आकार की सीमा-रेखा का निर्धारण करते हैं, उनमें से किसी के अनुसार इसकी सीमा एक हजार शब्दों तक की, दूसरे के अनुसार पंद्रह सौ शब्दों तक की एवं किसी तीसरे के अनुसार

चार-पांच पृष्ठों तक की भी हो सकती है।

‘लघुकथा की शब्द-सीमा पच्चीस से लेकर एक हजार शब्दों तक की हो सकती है।’ (‘समग्र’, 1978) पंद्रह सौ शब्दों में जीवन के एक अंश का अहसास कराने वाली यह अभिव्यक्ति लघुकथा है। (‘प्रतिनिधि लघुकथाएँ , 1976) तथा ‘लघुकथा की सीमा, एक से चार-पांच पृष्ठ तक की होती है। जहां मैंने बीस-पच्चीस पंक्तियों की लघुकथाएँ  लिखी हैं, वहां तीन से पांच पृष्ठ तक की लघुकथाएँ  भी लिखी हैं।

(मेरे एक पत्र के उत्तर में उपेंद्रनाथ अश्क, 5 जन., 1978) किंतु किसी निश्चित शब्द-सीमा का निर्धारण, आधुनिक हिंदी लघुकथा के लिए उपयुक्त मापदंड नहीं ठहरता और न ही उसकी पहचान की निष्पक्ष कसौटी। जिस प्रकार उपन्यास या कहानी के लिए किसी निश्चित शब्द-सीमा का निर्धारण नहीं है। एक उपन्यास पचास पृष्ठों का भी हो सकता है, जैसे मृदुला गर्ग का ‘सफर का साथी’ और पांच सौ पृष्ठों का भी, जैसे रांगेय राघव का ‘कब तक पुकारूं’ तथा कहानी तीन पृष्ठों की भी हो सकती है और तीस पृष्ठों तक की भी। ठीक इसी प्रकार लघुकथा बीस-पच्चीस या तीस शब्दों (रमेश बतरा : कहूँ कहानी : समग्र, जून, 1978) की भी हो सकती है और छह सौ (चित्रा मुद्गल : पत्नी : समग्र जून, 1978) या अधिक शब्दों की भी। यहां संख्या से आशय, किसी सीमा निर्धारण संबंधी मत से नहीं है, अपितु मात्र उदाहरण से है।

लघुकथा की पहचान, शब्द-संख्या की अपेक्षा उसके कथ्य की वेधक क्षमता पर निर्भर है। लघुकथा को उसकी तथाकथित निर्धारित शब्द-सीमा के परिप्रेक्ष्य में देखने पर कई ऐसी लघुकथाएँ  दृष्टिगोचर होती हैं, जो शब्द सीमा के अंतर्गत आते हुए भी लघुकथाएँ  नहीं है। उदाहरणार्थ सारिका के 7 जुलाई, 1978 के अंक में प्रकाशित उमाकांत मालवीय की तीन लघुकथाएँ – ‘स्याह चेहरे’ (लगभग 125 शब्द), ‘हम बिकाऊ नहीं हैं’ (लगभग 189 शब्द) तथा ‘गृहिणी’ (लगभग 178 शब्द)। ये मात्र प्रेरक प्रसंग या आदर्श उपदेशपरक कथाएँ  ही हैं, जबकि आधुनिक हिंदी लघुकथाएँ  ऐसी आदर्श-उपदेशात्मक प्रवृत्तियों से बहुत दूर या मुक्त हैं। ठीक इसके विपरीत ‘कहानी’ पत्रिका के अक्टूबर, 1972 के अंक में प्रकाशित सुधा की कहानी ‘रजाई’ (लगभग 370 शब्द) एक स्तरीय लघुकथा मानी जा सकती है, जिसमें पति-पत्नी के दैहिक संबंधों की तारतम्यता के मध्य आकस्मिक-सा व्यवधान उत्पन्न करती-सी मनःस्थिति है, जिसके अंतर्गत पति इस संबंध में समुचित निर्णय नहीं कर पाता है कि पत्नी को उसकी जरूरत है या रजाई की; और यह सूक्ष्म कथ्य अपनी अपेक्षित लघु सीमा में, अपने संपूर्ण प्रभाव सहित उजागर है।

लघुकथा और कहानी की तात्त्विक तुलना के अंतर्गत दोनों के अंतर के साथ-साथ ही, लघुकथा का रूप भी अधिक स्पष्ट हो जाता है। आकार के लिए कहा जा सकत है कि किसी भी विधा के कथानक की विस्तार-सीमा, उसके कथ्य की मांग पर निर्भर

करती है। अनावश्यक विस्तार या अनपेक्षित संकुचन उस कथ्य के प्रभाव संप्रेषण में बाधक बन सकता है। लघुकथा की आकारीय लघुता का आधार भी, किसी निश्चित शब्द-संख्या की सीमा नहीं, अपितु लघुकथा के सूक्ष्म व प्रायः एकांगी कथ्य की मांग के अनुसार उसके घनीभूत प्रभाव संप्रेषण में बरती गई शाब्दिक मितव्ययिता है। इससे अनावश्यक फैलाव के मध्य कथ्य शिथिल न होकर अपने लक्ष्य बिंदु पर ही टिका रहता है। कथानक का विस्तार या संकुचन उसके कथ्य के सापेक्ष होता है। कहानी के एकाधिक बहुमुखी कथ्य की कथानक सीमा लघु भी हो सकती है और विस्तृत भी। किंतु लघुकथा के सूक्ष्म व एकांगी कथ्य के प्रभाव संप्रेषण के लिए लघु सीमा ही अपेक्षित होती है और लघु सीमा के लिए शाब्दिक मितव्ययिता। वस्तुतः रचनाकार की यह वैचारिक निर्णयात्मक सृष्टि कि कथ्य को इससे अधिक शब्दों में बुनना निरर्थक है, उस सीमा का आधार है। कुछ शब्दों की बुनावट, कहानी के विस्तार की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ होती है। क्योंकि कहानी में से यदि कुछ शब्द या वाक्यांश घटा भी दिए जाएँ  तो उससे कथ्य संप्रेषण की समग्र प्रभावान्विति में बहुत अधिक अंतर नहीं पड़ता, और कभी-कभी तो बिलकुल भी नहीं।

द्वीप लहरी (पोर्ट ब्लेयर), अगस्त, 2002 से साभार

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