जून 2026

संचयन7-बम्मड़     Posted: September 1, 2025

सावन – भादों में बादल जितना बरसकर  सुकून देता है, साफ आसमान उतना ही धूप उड़ेल देता है। ऊमस के कारण पसीना नहीं सूखता। गांव में बिजली के भरोसे दिन नहीं कटता। किसी तरह एक बचा पुराना बरगद ही है जो कुछ ठंडक दे पाता है। बम्मड़ जब लुंगी – बनियान पहने बेनिया झलते बरगद की छांव में पहुँचे तो मियाँइन पहले से वहां बैठी बेनिया झल रही थी और बीच – बीच में बालों में कंघी कर रही थी। दोनों पोतों – पोतियों वाले थे। पर बच्चे न मियाँइन के घर में थे, न बम्मड़ के। बेनिया झलते – झलते बम्मड़ बोले – “ मियाँइन बांग्लादेश में फिर से बलबा हो गया।”

“तो निकालो लाठी – बल्लम। तुम भी भांजो,” मियाँइन ने बिना उनकी तरफ देखे कहा।

“हम काहे भांजें।”

“भांजते तो थे तुम।”

“जब भांजते थे, तब भांजते थे। बैल – बछड़े में कुछ फर्क होता है कि नहीं। जिन्दगी भर बम्मड़ ही रहेंगे!”

“चलो अच्छा हुआ कि समझ आ गई।”

बेनिया की पोंपी से पीठ खुजलाते हुए बम्मड़ बोले –”हम तो कहते हैं मियाँइन तुमको भी मुंबई चले जाना चाहिए था।”

“और जो अपने हाथों से ये घोंसला बनाया था, उसे खंडहर बन जाने देते।”

“कब तक जंजाल में रहोगी। मुंबई में होती तो ए. सी. में रहती। बेनिया नहीं झलना पड़ता।”

“तो तुम काहे नहीं गए?”

मियाँइन ने कनखियों से बम्मड़ को देखा। बम्मड़ कभी दाएँ होते तो कभी बाएँ। लेकिन उनका हाथ उनकी पीठ तक नहीं पहुँच पा रहा था। बम्मड़ उसी रौ में बोले –”हम तो बम्मड़ हैं। वहां जाकर पिजड़े में बंद नहीं हो पाऊँगा….बहुत घुटन होती।”

“ऐसे तो खुजली नहीं मिटने वाली…. वहां होते तो पोते से कहकर पीठ खुरचवा लेते।”

“मन तो करता है कि कोई फावड़े से खुरच दे। दरवाजा – दीवाल से रगड़ – रगड़कर थक गया हूं।”

मियाँइन बोली –”देखें पीठ।”

“ये भी दिन आ गया कि पीठ दिखाना पड़ रहा है,” कहकर हँसते हुए बम्मड़ ने बनियान उठा दिया।

“पूरा पीठ घमौरियों से भरा है।”

बम्मड़ ने कुछ नहीं कहा। वह तो परमानंद में डूब गए। बस यही दोहराते रहे –”थोड़ा दाएँ – थोड़ा बाएँ…..थोड़ा ऊपर– थोड़ा नीचे…..।”

“तुम्हारा शुक्रिया कैसे करें मियाँइन….।”

“शुक्रिया की जरूरत नहीं है। ये लो….।”

कहकर मियाँइन ने कंघी बम्मड़ को पकड़ा दिया और अपनी कमीज पीठ के ऊपर कर दिया।

-0-

गतिविधियाँ

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

    रचनाएँ भेजने के लिए ई-मेल-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    केवल स्वीकृत रचनाओं की ही सूचना दी जाती है।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine