1-चुप्पी का स्वाद

रात के सन्नाटे में वह अकेली रसोई में बैठी थी।
चूल्हे पर रखा दूध उबलकर बह गया था— जैसे उसका धैर्य।
वो थाली में रोटियाँ सजाती रही। दो रोटियाँ ज़्यादा रखीं।
आदत थी न, उसके लिए भी।
कभी लौटकर आता तो कहता— “तुम्हारे हाथ की रोटी में नमक कम है, पर मोहब्बत ज़्यादा।”
मगर आज वह नहीं था कुछ भी कहने के लिए । आज उसने पहली बार रोटियों को आंसुओं के साथ निगल लिया।
नमक पूरा था; पर मोहब्बत गायब थी।
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2-भीगी ख़ामोशी
बारिश अचानक से आ गई थी। छत की दरारों से पानी रिसकर फर्श पर टपकने लगा। वह खिड़की पर खड़ी थी, चेहरा भीगता रहा, पर उसने पल्लू नहीं खींचा।
बरसों पहले, ऐसी ही एक बारिश में उसने उसका हाथ थामा था। बोला था— “चलो, भीगते हैं, मोहब्बत में भी और इस आसमान की बूँदों में भी।”
वह हँसती रही थी, और बारिश उनकी हँसी में घुल गई थी।
आज वही बारिश थी, वही बूँदें थीं, पर साथ नहीं था। वह खिड़की से बाहर देखती रही। कहीं दूर, भीगते बच्चों की हँसी गूँज रही थी।
उसे लगा, उसकी अपनी हँसी भीगते-भीगते कहीं छूट गई है।
उसने हथेलियों को फैलाया—बूँदें उस खालीपन को नहीं भर पाईं, जो बरसों से भीतर टपक रहा था।
वह आहिस्ता-से बुदबुदाई—”बारिश कभी पुरानी नहीं होती, बस इंतज़ार बूढ़ा हो जाता है।”
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3-चाँदनी का टुकड़ा
वह बरामदे में बैठी थी। रात अपनी ख़ामोशी समेटे उतरी हुई थी। अचानक हवा का एक झोंका आया—उसके बाल बिखर गए।
उसने सोचा, किसी ने अभी-अभी मेरी पेशानी चूमी है।
पलटकर देखा—कोई नहीं था, सिर्फ़ नीम के पेड़ से झरती चाँदनी ज़मीन पर टुकड़ों में बिखरी थी।
वह धीरे से उठी, एक टुकड़ा अपनी हथेली पर रख लिया। उसकी हथेली गीली हो गई—जैसे किसी ने बहुत देर तक रोकर उसे छुआ हो।
उसने आँखें मूँद लीं।
“तुम यहाँ नहीं हो, पर तुम्हारी रूह अब भी मुझे छू लेती है।”
चाँदनी का वो टुकड़ा उसकी हथेली में पिघलता रहा और उसके दिल में किसी अधूरी मुहब्बत की ख़ुशबू फैल गई।
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4-अधूरी किताब
उसने अलमारी से एक पुरानी किताब निकाली। किताब के बीच से सूखा गुलाब गिर पड़ा।
उसने गुलाब उठाकर होंठों से लगाया। पन्नों पर लिखा था— “आगे की कहानी तुम्हारे बिना नहीं लिखी जा सकती।”
उसकी आँखें भर आईं। किताब बंद कर दी गई—मगर कहानी आज भी खुली रह गई।
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5-आईना
रीना रात साढ़े दस बजे दफ़्तर से घर लौटी। हाथ में लैपटॉप बैग, चेहरे पर थकान।
माँ भड़क उठीं—“इतनी देर तक बाहर? औरतों को इतनी रात घर से बाहर शोभा देता है क्या?”
रीना ने बैग सोफ़े पर रखा— “माँ, यही तो नौकरी है। देर से लौटना अपराध नहीं।”
पापा अख़बार मोड़ते हुए बोले— “हम मना नहीं कर रहे, पर यह दुनिया अच्छी नहीं है। अख़बार नहीं पढ़ती? हर दिन कितनी ख़बरें आती हैं। अगर कोई हादसा हो गया तो?”
रीना ने तीखे स्वर में कहा— “तो क्या समाधान है पापा? हर लड़की को दीवारों के पीछे क़ैद कर दिया जाए?”
माँ ने तुनक कर कहा—“संस्कार भी कोई चीज़ होती है रीना। लड़कियों को अपनी मर्यादा समझनी चाहिए।”
रीना ने झट जवाब दिया— “मर्यादा सिर्फ़ लड़कियों के लिए ही क्यों माँ? लड़कों के लिए कोई मर्यादा क्यों नहीं?”
तभी बारहवीं में पढ़ रहा अमन हँस पड़ा— “वाह! पापा, माँ! कल रात तो आपने मुझे दोस्तों के साथ दो बजे तक पार्टी करने दी थी, तब तो कोई खतरा नहीं था? क्या सड़कें सिर्फ़ लड़कियों के लिए ही असुरक्षित होती हैं?”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
पापा को जैसे किसी ने आईना दिखा दिया हो ।
रीना ने अमन की तरफ़ देखा और फिर धीरे से बोली—“खतरा सड़क पर नहीं, सोच के आईने में है।”
सन्नाटा और गहरा गया!
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6-ख़त
रात के सन्नाटे में अलमारी के पुराने बक्से से एक पीला सा लिफ़ाफ़ा गिर पड़ा।
उसने काँपते हाथों से उसे उठाया। लिफ़ाफ़े के किनारे फट चुके थे, मगर अंदर ख़त के अक्षरों की स्याही अब भी ताज़ा थी…जैसे किसी ने अभी-अभी लिखकर रख दिया हो।
उसने धीरे से लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर से ख़त निकाला—उस पर लिखा था— “नीलम, अगर यह चिट्ठी तुझ तक पहुँचे, तो समझ लेना कि मैं तुझसे कभी रूठा नहीं था। बस वक़्त ने हमें अलग कर दिया। अगर मेरा इंतज़ार कर सको, तो मैं लौटकर ज़रूर आऊँगा।”
नीलम की आँखें नम हो आईं…यादों की परछाइयाँ उसे अपने घेरे में ले गईं। वह इंतज़ार ही तो नहीं कर पाई थी। घरवालों को जब उसके प्रेम का पता चला, तो जल्दबाज़ी में उसका विवाह तय कर दिया।
मगर सुदेश- वह नीलम को कभी समझ ही न सका। सीधी-सादी, घरेलू-सी लड़की उसकी चाहत नहीं थी। उसे एक आधुनिक, खुलकर जीने वाली पत्नी चाहिए । और इस कमी का एहसास नीलम हर रोज़ करती रही। वह बस चुपचाप अपना फ़र्ज़ निभाती रही—बिना शिकायत, बिना अपेक्षा।
आज बरसों बाद यह पुराना ख़त हाथ में लिए वह ठिठक गई। जिन्दगी कितनी बदल चुकी थी, मगर इस काग़ज़ ने एक ही पल में सब याद दिला दिया। उसके आँसू काग़ज़ पर गिरने लगे, अक्षर धुँधला गए। जैसे उसके जीवन के रंग कभी धीरे-धीरे धुँधले पड़ गए थे।
वह फूट-फूटकर रो पड़ी—”क्या प्यार इतने कम समय का ही होता है?”
उसने हाथों की लकीरों की ओर देखा और बुदबुदाई— मैं बस इसी छोटी-सी लकीर के सहारे जी लूँगी। राज, तुम्हारा प्यार हमेशा मेरे साथ रहेगा- तुम्हारी याद बनकर।
और उसने ख़त को हौले से चूम लिया ।
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