रसोईघर की खिड़की के बाहर छज्जे पर पौधों की टोकरियाँ लटकी हुई हैं। कइयों में मौसमी फूलों के पौधे हैं, कुछ में स्पाइडर प्लांट ख़ूब हरे-भरे लगे हुए हैं। कुछ दिनों से एक चिड़िया का जोड़ा इन पर खेल रहा था।
जोड़े ने अभी पाँच-सात दिन से कुछ सामान; तिनके, नर्म पंख, धागे इत्यादि लाकर जमा करना शुरू कर दिया है। स्पाइडर प्लांट के बेबी पफ़ निकले हुए हैं, जिन पर कई बेबी प्लांट रहते हैं। उसी बेबी पफ़ वाली टहनी के सहारे यह जोड़ा अपना घर बना रहा है। रोज़ पचासों बार उड़ना, कुछ न कुछ लाना लगा हुआ है। ये सारी गतिविधियाँ देखकर मन बहुत ख़ुश है।
डर भी है कि एक टहनी के सहारे बना घरौंदा किसी अनहोनी की भेंट न चढ़ जाए। दिन में कई-कई बार देखती हूँ, इस बात पर घर वाले अक्सर मेरा मज़ाक भी उड़ाते हैं।
चिड़े-चिड़ी को देखकर लगता है कि शीघ्र ही नए मेहमानों की आमद होने वाली है। यानी कि जचकी होने वाली है। दादी से बहुत पहले सुना था कि जब कभी घर में गाय, बकरी की जचकी होती थी; दादी की माँ उस दिन जचकी होने के पहले भोजन नहीं करती थी। कहती- “घर में कोई कष्टी है, तो निवाला गले से कैसे उतरे।” शायद यही कारण है कि इन दिनों मुझे भी ठीक से भूख नहीं लग रही है।
नन्हें-नन्हें पंख खुलेंगे, सारा दिन चहचहाना गूँजेगा। सोचकर ही मीठी -सी गुदगुदी हो रही है।
प्रार्थना करती हूँ- “हे ईश्वर इनकी ख़ुशी सलामत रखना!’’
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