काफ़ी बड़ा क्षेत्र था चारों तरफ ऊँची सुन्दर रेलिंग से घिरा हुआ। मुख्य रोड के किनारे एक अति दिव्य फाटक आगंतुकों के स्वागत में शान से खड़ा था। ऊपर एक विशाल बोर्ड टँगा था। लिखा था – प्रभुता कंस्ट्रक्शन का मल्टी टॉवर प्रोजेक्ट।
उस क्षेत्र के अंदर एक तरफ कई टॉवर खड़े हो रहे थे। सैकड़ों मजदूर मशीन की तरह भिड़े हुए थे। उसी क्षेत्र में एक तरफ कई झुग्गी-झोपड़ियाँ आबाद थीं। उन मजदूरों के रहने के लिए। मजदूर ज्यादातर बाहर से आयतित थे। बिल्डर ने बड़ी कृपा की थी उन पर ! उसी ने बनाकर दी थी।
उस अस्थायी बस्ती के बाहर बच्चे खेल रहे थे। एक बच्चे ने कौतूहलवश एक बुजुर्ग से पूछा, “बाबा, ज़ब ये बिल्डिंगें पूरी हो जाएँगी तब हमारी झुग्गियाँ गिराकर वहाँ भी इमारते खड़ी होंगी। फिर हम कहाँ जाएंगे ?”
बुजुर्ग ने कहा, “बिल्डर बड़ा दयालु है। हमारे रहने का कोई-न-कोई जुगाड़ करेगा।”
और ऐसा ही हुआ। टॉवर तैयार हो गए , तो उनके बेसमेंट में उन मजदूरों का रहने का जुगाड़ फिट कर दिया गया। बच्चे ने सोचा था, शायद कमरे मिलेंगे। मगर ऐसा नहीं हुआ।
समय बीतता गया। पुरानी झुग्गियाँ गिरा दी गईं और उस स्थान पर भी धीरे-धीरे कई इमारतें शान से खड़ी हो गईं। नोटों के झोले लेकर शहरी इंसान आने लगे। फटाफट अपार्टमेंट गुलज़ार होने लगे। बेसमेंट में बड़ी बड़ी गाड़ियों की कतारें लगने लगीं।
अब मजदूर कहाँ जाएँ ? बच्चे घबरा गए। बच्चों ने बुजुर्ग से पूछा, “बाबा, हमारी रहने की जगह पर तो गाड़ियाँ आ गईं। अब हम कहाँ जाएँगे ?”
बुजुर्ग ने कहा, “चिंता मत करो, बच्चो। हमारा बिल्डर एक नया प्रोजेक्ट शुरू कर रहा है। उसने एक नई और बड़ी जमीन ले रखी है। एक तरफ ऊँची बिल्डिंगे बनेंगी और दूसरी तरफ झुग्गी-झोपड़ियाँ। हम सब फिर वहीं अपनी ज़िन्दगी लें जाएँगे। इमारत के निर्माण में जी-जान से काम करेंगे और उन्हीं झुग्गी-झोपडियों में दिन निकालेंगे। इस तरह इन्हीं अस्थायी झुग्गी-झोपड़ियों में हमारा जीवन जारी रहेगा। हमारा बिल्डर बहुत महान और दयालु जो है!”
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