-ऐ लड़के।
जी साब।
-कैसी सर्विस है तुम्हारी?
-माफ़ कीजिए साब। वह मैं पेमेंट ले रहा था। इसलिए देर हुई।
-तो पेमेंट कोई और ले लेता। मैंने तुझे दो बार बुलाया। सुना क्यों नहीं?
-क्या है न साब, वह मेरी टिप चली जाती। यही तो हमारी आमदनी होती है। सेठ तो बहुत कम तनख्वाह देता है।
-सुनील कुछ मँगाओगे भी या इसके पीछे ही पड़े रहोगे। शैला को उस लड़के की मासूमियत बड़ी भली लग रही थी।
-तुम नहीं समझतीं, ये बड़े मक्कार होते हैं। इन्हें इसी बात की तनख्वाह मिलती है कि हमें किसी बात की परेशानी न हो।
क्या कहा सेठ कम तनख्वाह देता है? चल, मैं तेरी शिकायत तेरे सेठ से ही करता हूँ। सुनील फिर उससे उलझने लगा।
शैला सुनील के साथ डेट पर आई थी। उनका विवाह तय हो चुका था। सुनील और उसके घर वाले तो चट मँगनी पट ब्याह करना चाहते थे। परंतु उसने एक दूसरे को समझने का प्रस्ताव रख कर कुछ दिन माँगे थे। उसी के तहत आजकल वे दोनों घूम-फिर रहे थे। सुनील का उससे उलझना उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा।
वह बोली- यह कैसा व्यवहार है तुम्हारा। किसी से ऐसे बात करते है क्या?
उसे माँ की वह बात याद आने लगी कि किसी भी इंसान का स्वभाव इस बात से समझ आता है कि वह अपने से कम हैसियत वाले व्यक्ति से कैसे बात करता है। वह उठकर खड़ी हो गई।
सुनील ने कहा-तुम तो ऐसे बुरा मान रही हो, जैसे इससे तुम्हारा कोई रिश्ता हो।
-हाँ इससे मेरा रिश्ता है न सुनील, इंसानियत का। कहकर वह बाहर आ गई।
-0-