जिस प्रकार से काव्य विधा में कविता, छंद, चौपाइयों , दोहे में जो लोकप्रियता दोहों ने अर्जित की वह अन्य किसी को नहीं मिली। कम शब्दों में विस्तृत अर्थ समेटे दोहे के लघु आकार ने ही जनमानस को अपनी ओर आकृष्ट किया। यही कारण है कि कबीर दास के दोहे , रहीम के दोहे आज भी लोगों की जुबान पर हैं। ठीक उसी तरह गद्य विधा में उपन्यास, कहानियों, नाटक , संस्मरण के बरक्स लघुकथा ने अपनी जो पहचान कायम की है , उसके मूल में यही भावना निहित है। एक उत्कृष्ट लघुकथा पाठक के मस्तिष्क में बड़ी आसानी से अमिट छाप छोड़ देती है। पत्रिका का नाम स्मरण नहीं रहता , कभी कभी लेखक तक का नाम भी विस्मृत हो जाता है, लघुकथा का शीर्षक भी याद नहीं रहता, पर लघुकथा का प्लॉट दिलोदिमाग में हमेशा जीवंत रहता है ।
अपनी पसंद की तमाम लघुकथाओं में मैने जिन दो लघुकथाओं का चयन किया है – उसमें पहली लघुकथा स्कूल (सुकेश साहनी जी ) है और दूसरी हार (राम करन जी ) ।
लघुकथा ‘स्कूल’ में भूख और भावुकता का अंतरसंघर्ष दिखाया गया है कि कैसे तीन दिन से एक माँ अपनी अल्प वयस्क संतान की सुरक्षा हेतु बहुत ही व्यथित हैं । बार-बार वह स्टेशन मास्टर से ट्रेन के बारे में सूचना मांगती है ,और स्टेशन मास्टर संतोषजनक उत्तर नहीं देता है,फिर भी वह अपना प्रयास नहीं छोड़ती। तभी आने वाली रेलगाड़ी से उसका बालक उतरता है और वह उसे अपने अंक में भरकर अनुभूति करती है कि कैसे मेरा छोटा सा बालक आज पारिस्थितिजन्य कारकों से वयस्क हो गया है यानी अपनी उम्र से बड़ों जैसा व्यवहार करने लगा। यही लघुकथा का चरम बिंदु है, जो शीर्षक को सिद्ध करते हुए हमें बताता है कि इस दुनिया से बड़ा कोई स्कूल नहीं। यहाँ कुछ अनकहा भी निहित है – रचनाकार अपने पाठकों को सोचने के लिए विवश कर देता है, कि सामान्य आवश्यकताओं की संपूर्ति हेतु अथवा आगामी समय में कल के लिए जीवित रहने हेतु समाज का एक वर्ग प्रत्येक स्तर पर कितना संघर्ष शील होकर तरह-तरह के दबाव से गुजरता है। उसकी कोई इच्छा नहीं, मूल आवश्यकताओं की पूर्ति ही उसका लक्ष्य होता है। हिंदी कहानियों में गरीबी का अपना एक अर्थशास्त्रीय विवेचन रहा है। इस संदर्भ में प्रेमचंद जी की ईदगाह कहानी स्मरण में आती है। जब बूढी दादी अपने पोते को हृदय से लगा लेती है ,कि वह उसके लिए एक चिमटा लाया है।वह भी उस पैसे से जो उसे मेले में खर्च करने के लिए दिया गया था। लगभग एक शताब्दी से हमारे समाज में यही परिवेश विद्यमान है। कहने या प्रचार करने के लिए यह बोलना आसान है कि हमने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में खूब प्रगति की है । भूख और भावुकता का अंतरसंघर्ष यदि वर्तमान युग में भी हिंदी कथाकारों का आधार फलक कथानक बना हुआ है तो यह समाज को सचेत करता है।
लघुकथा ‘हार’ का कथानक आवश्यकता और इच्छा के संघर्ष को व्यक्त करता है। इसी कथा दर्शन को लेकर कथाकार और मोची के बीच संवाद चलता रहता है।जहाँ पर कथाकार अपने बौद्धिक पराक्रम के माध्यम से मोची को तरह-तरह के वाक्य विन्यासों से अभिप्रेरित करता है, कि वर्तमान परिवेश में चल रहे महा बहुइच्छाओं को पूरा करने की मृगतृष्णा के प्रति कितना सक्रिय है ,परंतु वह अनपढ़ ज्ञानी मोची हर वार को विफल कर देता है। प्रत्येक स्थिति में स्वयं को एक संतुष्ट व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत करता रहता है संभवत यही कारण है कि जिन्हें हम लघु आय वर्ग का एक मनुष्य मानते हैं। वह अपने स्वयं के जीवन दर्शन के सहारे अपने व्यक्तित्व और बुद्धि को निर्मल रखता है। इस संदर्भ में मुझे महान अर्थशास्त्री डॉक्टर मेहता का एक सिद्धांत स्मरण में आता है, कि हम अपने आवश्यकताओं को नियोजित कर एक विशिष्ट आर्थिक संतुलन प्राप्त कर सकते हैं। कथाकार ने तथाकथित आज के गला काट प्रतिस्पर्धा वाले जीवन में जो कुंठा और मनोविकार इस बौद्धिक और तार्किक समाज में व्याप्त हैं ।लोग अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए किन्हीं भी मानदंडों का अतिक्रमण करने के लिए उद्धत रहते हैं। उन्हें एक बड़ा संदेश दिया है ,कि अपनी आकांक्षा और क्षमता में एक स्वस्थ अनुपात विकसित करें। जिससे उनका जीवन किसी भी तरह के मनोविकारों से परे रहे। समाज में बढ़ते हुए तरह-तरह के आर्थिक अपराध, आत्महत्या कुंठा और निराशा तथा अवसाद का मूल कारण अपनी कथानक में स्पष्ट करने का सफल कार्य किया है। वस्तुत इस तरह की मनोवैज्ञानिक लघुकथाओं का लेखन वृहद चिंतन और एक स्वस्थ जीवन दर्शन आधार फलक को अभिव्यक्त करता है। यह अद्भुत लेखन क्षमता कतिपय लघुकथाकारों में ही दिखाई पड़ती है। कथा मानकों के आधार पर यह लघुकथा पूर्ण उपयुक्त है, इसकी संवाद शैली सहज और सरल पाठकों के हृदय पर अपना प्रभाव छोड़ती है। यही किसी रचनाकार की सबसे बड़ी सफलता होती है। जिसमें रचनाकार सफल रहे हैं। समाज को ऐसी रचनाओं की नितांत आवश्यकता है जो उसे परिष्कृत करते हुए स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करें।
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1- स्कूल: सुकेश साहनी
“तुम्हें बताया न, गाड़ी लेट है ।” स्टेशन मास्टर ने झुंझलाते हुए कहा – “ छह घंटे से पहले तो आ नहीं जाएगी ,अब जाओ… कल से नाक में दम कर रखा है तुमने ।”
“बाबूजी गुस्सा ना हो ।” वह ग्रामीण औरत हाथ जोड़कर बोली- “ मैं बहुत परेशान हूं ,मेरे बेटे को घर से गए हुए तीन दिन हो गए हैं … उसे कल ही आ जाना था ! पहली दफा घर से अकेला निकला है…”
“ पर तुमने बच्चों को अकेला भेजा ही क्यों ? औरत गिड़गिड़ाहट से पसीजते हुए उसने पूछ लिया ।
“ मति मारी गई थी मेरी ।” वह रुआंसी हो गई – बच्चे के पिता नहीं है ,मैं दरिया बुनकर घर का खर्च चलाती हूं । पिछले कुछ दिनों से जिद कर रहा था कि वह भी कुछ काम करेगा । टोकरी भर चना लेकर घर से निकला है…”
“ घबराओ मत… आ जाएगा ! ” उसने तसल्ली दी। “ बाबूजी वह बहुत भोला है ,उसे रात में अकेले नींद भी नहीं आती है… मेरे पास ही सोता है । हे भगवान!… दो रातें उसने कैसे काटी होंगी? इतनी ठंड में उसके पास ऊनी कपड़े भी तो नहीं है…” वह सिसकने लगी।
स्टेशन मास्टर अपने काम में लग गया था । वह बेचैनी से प्लेटफार्म पर टहलने लगी । उस गांव के छोटे से स्टेशन पर चारों ओर अंधकार छाया हुआ था । उसने मन ही मन तय कर लिया था कि भविष्य में वह अपने बेटे को कभी भी अपने से दूर नहीं होने देगी । आखिर पैसेंजर ट्रेन शोर मचाती हुई उसे सुनसान स्टेशन पर आ खड़ी हुई । वह साँस रोके ,ऑंखें फाड़े डिब्बों की ओर तक रही थी । एक आकृति दौड़ती हुई उसके नजदीक आई । नजदीक से उसने देखा – तनी हुई गर्दन …बड़ी-बड़ी आत्मविश्वास – भरी आंखें …कसे हुए जबड़े …होठों पर बारीक मुस्कान …
“ मां तुम्हें इतनी रात गए यहां नहीं आना था।” अपने बेटे की गंभीर , चिंता भरी आवाज उसके कानों में पड़ी। वह हैरान रह गई । उसे अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था- इन तीन दिनों में उसका बेटा इतना बड़ा कैसे हो गया ।
2- ‘हार’: राम करन
जेठ की दुपहरी में बीच सड़क पर किसी के सैंडल का तल्ला निकला होगा तो मेरा कष्ट समझ सकता है। लेकिन मेरे साथ अच्छी बात यह थी कि मुझे दूसरी तरफ बैठा मोची दिख गया था। वह एक फल वाले ठेले के बगल में बैठ कर छांव ढूंढ़ने का प्रयास कर रहा था। मैने कहा – ‘‘इसे गोंद से चिपका दो।’’ उसने प्रश्न किया – ‘‘सिल दूँ?’’
मैने कहा, ‘‘नही भाई, लुक बिगड़ जाएगा।’’
उसने अंगुली से इशारा करते हुए कहा – ‘‘वहाँ चले जाइये। हो जायेगा।’’
मैं तिलमिलाकर रह गया। जरा सा काम है। जब मैं कह रहा हूँ कि चिपका दो तो वह सिलने पर आमादा है। ऐसी हालत में वहाँ जाना एक सजा था।
मैने पूछा – ‘‘क्यों? तुम नही कर सकते?’’
उसने पुनः अंगुली दिखायी – ‘‘बता तो रहा हूँ कि वहाँ चिपक जायेगा।’’
मैने ध्यान से देखा। उसके पास दो पालिश की डिब्बी थी – एक काली, दूसरी लाल, एक निहाई, कैंची और कुछ चमरौधे बस।
मैने प्रश्न किया –‘‘तुम्हारे पास गोंद नही है क्या?’’ उसने मुझे केवल देखा।
‘‘कितने में मिलेगा?’’
‘‘आप वहीं बनवा लीजिए।’’
‘‘ऐसे ही दुकान लगाए हो? जब सामान नही रहेगा ता कैसे कमाओगे। पचास रूपये में मिल जायेगा?’’ उसने हामी में सिर हिला दिया। मैने उसे पैसे दिए तो वह गोंद लेने चला गया। मेरे अंदर कई सवाल उठ रहे थे। गुस्सा भी आ रहा था। वह आया तो मैने पूछा – ‘‘कितना कमाए आज?’’
‘‘ उन्नीस रूपया।’’
‘‘इतने से घर चल जाता है?’’
‘‘हाँ।’’
‘‘अनाज कैसे खरीदते हो?’’
‘‘खरीदना नही पड़ता। राशन कार्ड पर मिल जाता है।’’
‘‘सब्जी तो खरीदना पड़ता होगा?’’
‘‘आलू दस रुपये किलो है। एक दिन लाता हूँ दो दिन चलता है।’’
“बच्चों को पढ़ाते हो या नहीं ? फीस कैसे देते हो?’’
‘‘फीस नही देना पड़ता। सरकारी में हैं। खाना भी मिलता है।’’
वह मुझे हर दांव पर पछाड़ रहा था। उसके पास जरा सा भी गुस्सा या असंतोष नही था। उसे देखकर मै झुंझला रहा था।
मैने पूछा – ‘‘कभी फल वगैरह खाते हो?’’
इसबार मै जानता था कि उसका उत्तर नकारात्मक होगा।
वह बोला – ‘‘फल तो भाई साहब रोज ही खिलाते हैं।’’ उसने फलवाले को देखा और उसने हामी भरी। उसने कहा – ‘‘हो गया,’’ और सैंडल आगे कर दिया। वह शांत था और मै उद्विग्न।
मैने पूछा – ‘‘कितना दूँ?’’
वह बोला – ‘‘जो मर्जी।’’
मुझे लगा उसने मुझे धोबी पाट दे मारा और मै चित्त था ।
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