
गत कुछ वर्षों से गद्य साहित्य में लघुकथा विधा बहुत प्रचलित हो गई है। दरअसल, यह बदलते जमाने की वो हवा है, जिसमें संक्षेप में अपनी बात कहने की प्रवृत्ति चारों ओर फैलती जा रही है। वैसे तो यह प्रवृत्ति सोशल मीडिया तक ही सीमित है; लेकिन साहित्य में लघुकथा विधा का भी दिल खोलकर स्वागत हुआ है। लगभग सभी साहित्यकारों ने लघुकथा विधा में अपनी लेखनी को समाहित किया है और इन्हीं में से एक नाम है, हरभगवान चावला। सिरसा निवासी चावला निरंतर लघुकथाएँ लिख रहे हैं और ‘वे परिंदे नहीं लौटते’ उनका तीसरा लघुकथा- संग्रह है। इस संग्रह में विभिन्न विषयों को खूबसूरती से व्यक्त किया गया है।
शीर्षक लघुकथा के माध्यम से जंगल और शहर की तुलना वाला भाव सीधे-सीधे छोटे शहरों और महानगरों की जीवन शैली की ओर इंगित करता है। बदलती आबो-हवा के साथ भले ही सुख-सुविधा हैं; लेकिन भावी खतरों से बचा नहीं जा सकता। बड़े शहरों में हर कोई अकेला है, जबकि बेहतर जीवन के लिए एक साथ रहना, समझना और सुख-दुख में शामिल होना बहुत आवश्यक है। निर्णायक पंक्ति प्रभावी है।
‘आवाज़ें’ में भी पक्षियों की बात उठी है। पड़ोस के घर में लगे वृक्ष पर पक्षियों की गूँजती आवाज़ों में उस परिवार की कोई रुचि नहीं है। इतना ही नहीं, उनके कारण घर में फैल रही गंदगी से वह परेशान हो जाते हैं। आख़िर पक्षियों के आश्रय स्थल पेड़ को ही कटवा दिया जाता है। ‘पिंजरा’ में भी दो पक्षी है; लेकिन एक पक्षी के प्राण पखेरू उड़ जाने के बाद दूसरा पक्षी उदास है। अगले दिन उसका पिंजरा खोल दिया जाता है, फिर भी वह वहाँ से उड़ता नहीं है। ‘पिंजरा’ के माध्यम से आसमान के डर का अंदेशा तो दिखाया है; लेकिन मूल बात उसे मुफ़्त मिलने वाले दाना-पानी पर अटक गई है। वैसे ‘ग़ुलामी’ और मुफ़्त सेवा को साथ जोड़ देने से लघुकथा का प्रभाव समाप्त हो जाता है।
अक्सर घरों में साहित्यिक किताबें तो होती हैं; लेकिन बहुत से लोग उन्हें पढ़ते नहीं हैं, फिर भी किताबें अमूल्य हैं। ‘चोट’ में साहित्यानुरागी माँ की सुविधा के लिए बेटा किताबों को अलमारी के निचले रैक में जमा देता है, तो ‘किताब’ में बेटा यह देखकर आश्चर्य से भर जाता है कि उसकी माँ को भी पढ़ने का शौक है। माँ को तो केवल अक्षर ज्ञान है और वह रात ग्यारह बजे तक भी पुस्तकालय में बैठकर पुस्तक पढ़ने का उत्साह रखती है। पुस्तकें खरीदी जा रही हैं; लेकिन अलमारी में सजावट के लिए। यह दोनों लघुकथाएँ लेखकों और पाठकों के साथ ही प्रकाशकों के उत्साह में वृद्धि करने में सक्षम बन पड़ी हैं।
‘पातिव्रत्य’ इस संकलन की सबसे बेहतरीन लघुकथा कही जा सकती है। महामृत्युंजय मंत्र की महिमा के बारे में पंडित जी और चौधरी के बीच का वार्तालाप किसी भी पाठक की आँखें खोल देने वाला है। यह इस बात का भी संकेत है कि इस प्रकार के अंधविश्वासों के कारण ही गलतफहमियाँ और अविश्वास जन्म लेते हैं। ‘अजायबघर’ भी मन को छूती है। इस लघुकथा में माँ के निधन के बाद उसके बक्से में से निकलने वाले सामान को रद्दी में बेचने की बात उठती है, तो बड़ी बेटी कहती है कि यह अजायबघर मुझे दे दो और पैसे ले लो। इसे पढ़ने के बाद सचमुच में लगता है कि रिश्तों के स्थान पर पैसे को प्राथमिकता प्रदान की जा रही है।
‘क़ैद’ में लड़की पर पाबंदियाँ हैं और वह बाद में गलत कदम उठा लेती है। ‘हवा’ में भी लड़कियाँ हैं और उनकी महत्ता है। ‘पहरा’ में डायरी की कहानी है लेकिन ‘जीना क्यों’ कुछ निराश करती है। ‘मगरमच्छ’ में माँ को आश्रम में छोड़ दिया जाता है और उसके निधन पर भी बेटा नहीं आता है। ‘पेंशन’ लघुकथा में पिता नहीं चाहता कि वह अपने बेटे पर निर्भर रहते हुए उसकी ग़ुलामी करें। ‘रिश्ता’ में बड़ों की लड़ाई है लेकिन एक बच्चा दादा जी से रोज मिलता है और उनका आशीर्वाद लेता है। ‘सवाल’ में महिलाओं की स्थिति का चित्रण है। ‘बरदाश्त’ में बुरी खबरों के बीच अच्छी खबर को पाकर अतिरेक खुशी बरदाश्त नहीं होती। ‘पाचन-शक्ति’ में ताने है तो ‘रिक्शा’ में शराबी बाप को उसका छोटा बेटा सीख देता है। ‘वर्दी’ में अभाव और भाव का संगम है। ‘दाम’ में अपने जन्मस्थान की महिमा है और वहाँ की मिट्टी से प्रेम है। ‘लय’ में भाषा और संगीत की जुगलबंदी आकर्षित करती है। ‘बस छूट गई’, ‘दहशत’, ‘मन’, ‘परवाह’, ‘विश’, ‘सुरक्षा’ जैसी लघुकथाएँ गंभीर प्रवृत्ति की हैं।
लेखक ने कुछ लघुकथाओं को बहुत संक्षेप में लिख दिया है, परिणामस्वरूप वह बहुत अधिक प्रभाव नहीं छोड़ पाती हैं। इसी प्रकार कुछ लघुकथाओं में अनावश्यक विस्तार भी देखने को मिलता है, जबकि उसका मूल चंद पंक्तियों में ही सामने आ जाता है। ‘मेरा धर्म’ लघुकथा निराश करती है, धर्म के कारण लड़की को भरतनाट्यम करने की अनुमति न देना संकीर्ण विचारधारा को इंगित करता है। बेहतर होता, प्रतिभा को निखरने का अवसर दिया जाता।
पुस्तक: वे परिंदे नहीं लौटते/विधा: लघुकथा संग्रह/लेखक: हरभगवान चावला, पृष्ठ 128 मूल्य: 195.00/-, प्रकाशक: वेरा प्रकाशन, मेन डिग्गी रोड, मदरामपुरा, सांगानेर, जयपुर-302029
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