रजनी ने आते ही बताया कि उसका बेटा और बहू रिश्तेदार की शादी में जा रहे हैं। स्कूल में छुट्टियाँ हैं। वह अपनी छोटी बेटी को अकेले घर नहीं छोड़ सकती इसलिए स्कूल खुलने तक उसे साथ लेकर आएगी। उसने देखा लड़की आठ–नौ साल की है। खेलती रहेगी या घर के छोटे–छोटे काम ही कर देगी। उसने हाँ कह दिया।
रजनी काम करती रही और बच्ची अपने बैग से कापी –किताब निकालकर पढ़ने लगी। आध पौन घंटे बाद लॉन में जाकर खेलने लगी। बीच–बीच में वह माँ से आकर पूछ जाती कि वह उसके साथ काम करवाए। दो–चार दिन ऐसे ही निकल गए।
पाँचवें दिन रजनी आई तो उसने बताया कि उसकी तबीयत ख़राब है, वह अस्पताल जा रही है। लड़की को वह उसके पास ही छोड़ गई और अस्पताल से आते हुए ले गई ।
अगले दिन रजनी फिर नहीं आई। लड़की ने आकर बताया कि माँ की तबीयत ज़्यादा ख़राब है। वह नहीं आएगी। उस दिन वह बैग नहीं लाई और उसके साथ काम करवाती रही।फ्रिज साफ़ करते हुए उसने देखा दो दिन पहले के लाए हुए दो बर्गर रखे हुए थे। अब तो कोई खाएगा नहीं। उसने निकालकर लड़की को डस्ट बिन में डालने के लिए कहा। वह थोड़ी देर तक उन्हें देखती रही और फिर डरते–डरते पूछा, “ आंटी आज मेरी मम्मी ने खाना नहीं बनाया था, क्या मैं ये बर्गर खा लूँ ?”
उसने लड़की की ओर देखते हुए इशारे से ‘हाँ ‘में उत्तर तो दे दिया, लेकिन मन में चुभते हुए अनेक प्रश्नों ने उसे कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया। लड़की काग़ज़ में से एक बर्गर निकालकर खाने ही वाली थी कि तेज़ आवाज़ में- “रुको” कहकर उसने बर्गर लगभग उसके हाथ से छीनते हुए डस्ट बिन में फेंक दिया और अपने बच्चों के लिए बनाए गए ताज़ा भोजन में से खाना प्लेट में रखकर उसे खाने को दे दिया। लड़की थोड़ा झिझकी और फिर जल्दी-जल्दी खाने लगी। वह उसे तृप्ति भाव से एकटक देखती रही।