पति-पत्नी शाम को ऑफिस से आए तो घर की साफ-सफाई …… चकाचक बर्तन और धूले कपड़े देख चकित रह गए।
काम वाली बाई तो ऐसे काम करने से रही। अवश्य ही माँ ने यह सब किया होगा। उन्होंने मन ही मन सोचा।
माँ कल ही गाँव से शहर आई थी।
‘‘आ गए पुतर, क्या देख रहे हो? ये सब मैंने किया है।इन बूढी हड्डियों में इतनी तो जान है कि घर के छोटे मोटे काम तो निपटा ही सकती हूं। मुझे तो यहाँ आकर पता चला कि तुम्हारी जिन्दगी तो रेल-सी बनी हुई है…… मेरी बहू की तो और भी परेशानी, खुद तैयार होना…… बच्चों को तैयार करना…… खाना बनाना…. खाना पैक करना। अरे इतना काम। मैंने सोच लिया है जब तक मैं यहाँ रहूँगी ज्यादातर काम निपटा दिया करुंगी। मैंने तो कामवाली बाई से भी कह दिया कि वो अपना काम कहीं ओर देख ले।’’
‘‘ठीक है माँ, जैसा तू चाहती है वैसा कर।’’
रात को खाना खाने के बाद पति-पत्नी टहलने छत पर चले आए। वहाँ पत्नी कहने लगी- ‘‘मैं कहती हूँ… माँ जी ने कामवाली को भी मना कर दिया। कहीं…..।’’
‘‘…..ठीक ही तो किया, दो पैसे बचेंगे। माँ के रहते हम निश्चिंत भी रहेंगे। बच्चों को दादी का प्यार भी मिल जायेगा।’’ पति ने पत्नी की बात बीच में ही काटते हुए कहा।
‘‘वो सब तो ठीक है पर…।’’
‘‘पर क्या?’’
‘‘कहीं माँ …यहीं रहने की तो नहीं सोच रही।’’
‘‘तुम ऐसा क्यों सोचती हो। खुश रहना सीखो। रह लेगी उसका घर है।’’
‘‘और मेरा….मेरा कुछ नहीं.।’’….इतना कह पत्नी पैर पटकती हुई पति से दूर चली गई।
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