शाम का धुंधलका बढ़ने लगा था। वैसे भी सर्दियों में शाम जल्दी उतर आती है। ज्वालपुर के उस छोटे स्टेशन में ट्रेन रेंगती हुई रुक गयी थी। बस, पाँच मिनट के लिए।
इस बार दीवाली की भीड़ में अभय को स्लीपर कोच में ही जगह मिल पाई थी। स्टेशन के लिए भी वह अफरा-तफरी में ही निकला। अब चाय की बेहद तलब लग रही थी।
उसके कोच के सामने ही दस-ग्यारह साल का मासूम सा लड़का एक हाथ में चाय की केतली और दूसरे हाथ में डिस्पोजेबल कप लिये खड़ा था।
“ऐ लड़के, चाय देना।” खिड़की से ही हाथ हिला अभय ने इशारा किया।
लड़का लपकता, उसकी खिड़की के नीचे आकर एक कप में चाय भरने लगा।
“दाम तो बता।”
“दस रुपये की।”
“ऊपर तक भरना। आधा कप पकड़ा देते हो। दाड़ भी गीली नहीं होती।” अभय कुछ रौब से बोला।
“बाऊजी, चाय तो पूरी देता हूँ। आप पैसे निकाल कर रखियो। मेरी चाय तो पहुँच जाती है, चेंज के चक्कर में ट्रेन और पैसे छूट जाते है।” उसने सच रखा।
चाय तो मिल गयी थी मगर चेंज अभय के पास भी नहीं थी।
ट्रेन ने सीटी दे दी। लड़के की नजर खिड़की पर टिकी रही। ट्रेन धीरे धीरे रेंगने लगी थी। हाथ का सामान छोड़ लड़का ट्रेन के साथ कदमताल करने लगा। आस अभी भी अटकी थी।
अभय अभी भी अपनी जेबें टटोल रहा था। पर्स की अन्दर वाली पॉकेट खोली तो उसमें भगवान के खजाने का दस रुपया मिल गया। माँ ने उसकी अलाये-बलाये ले, उसकी रक्षा के लिए मन्नत का ये सिक्का रख दिया था ।
अभय ने कुछ सोचा और वहीं सिक्का लड़के के हाथ में थमा दिया।