जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: May 1, 2026

1-मुखौटा

सुबह-सुबह उसने उठते ही आदतन चप्पलें पहनीं और सीधा बाथरूम में घुस गया।

मुँह धोने के लिए जैसे ही उसने आईने की ओर देखा, लगभग लड़खड़ा गया।

पूरे आईने में उसका शरीर तो है, पर चेहरा नहीं। मानो चेहरा है ही नहीं।

उसने अपने चेहरे पर हाथ फेरा। उसे पक्का पता था, उसके हाथ में जो कुछ भी महसूस हो रहा है वो उसका अपना चेहरा ही है। लेकिन यह आईने से गायब क्यों है?

उसने वहाँ  लगी लाइट ऑफ की। फिर ऑन की: पर कोई फर्क न पड़ा। ये अजीब-सी घटना उसे हैरान कर गई थी। अभी कल रात जब वो सोया था, तब उसका चेहरा, उसकी आँखें, उसके होंठ, बाल सब कुछ व्यवस्थित थे। जैसा वो है।

या फिर उम्र के इस पड़ाव पर, जहाँ  आज वो खड़ा था, उस हिसाब से चेहरे पर सब कुछ बराबर था।

प्रौढ़ चेहरा, झुर्रियों भरा चेहरा, आधे काले-आधे पके सफेद बाल। कल उसने ना जाने कितनी बार अपने बालों में कंघी की थी। चेहरे पर हाथ मारा था। मुँह धोया था। सोने से पहले तक सब ठीक ही था।’ अचानक रात में ये क्या हो गया! कहाँ  हूँ  मैं? मेरा चेहरा!’

कल वो देर रात लौटा था। टैगोर थिएटर में उसके एक नाटक का मंचन था। आते ही शायद कुछ थकान, कुछ हड़बड़ी में सो गया था।

उसने अपने चेहरे को जोर से झिंझोड़ा। तभी खड़खड़ाकर कुछ गिरने की आवाज हुई। एक साथ कई सारे मुखौटे जमीन पर गिरे और चारों ओर फैल गए।

वह घबराकर उन मुखौटों को उलट-पलटकर देखने लगा था।

उसका अपना चेहरा कहीं नहीं था। उन तमाम मुखौटों में बहुत से पात्रों के चेहरे वहाँ  बिखरे पड़े थे।बहुत देर तक अपने असली चेहरे को तलाशता रहा,लेकिन वहाँ सिर्फ़ वो मुखौटे थे।

आईने में लगातार मुखौटे बदल रहे थे। बीच-बीच में उसका चेहरा वहाँ आता तो ज़रूर था, मगर कुछ क्षणों के लिए।

अब वह अपने असली चेहरे को जैसे भूल गया था ।बिना चेहरे के वह शीशे के सामने खड़ा था।

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2-घरौंदा

बेटा बहू घर छोड़ कर जा रहे हैं। गाड़ी पर सामान लादा जा रहा है।

‘‘क्या यह जरूरी है, बेटा’, मां ने धीरे से बेटे को एक कोने में ले जा कर पूछा।

‘‘लोग क्या कहेंगे। हमारा घर टूट जाएगा, बेटा, प्लीज।’ पिता जी ने बेटे का हाथ पकड़कर कहा।

बेटा चुपचाप सामान रखे जा रहा था। बहू गाड़ी वाले को बता रही है, ‘‘यह भी रख लो।’

‘‘आप लोग समझ ही नहीं पाए कि हमें क्या चाहिए। मेरी पत्नी आप दोनों के साथ नहीं रहनाचाहती।’ बेटा बोले जा रहा है।

‘‘हमने तुम्हें कितने प्यार से पाला है, हम तुम दोनों से तीस साल बड़े हैं, इस उम्र में अकेले कैसेरहेंगें।’ पिता बोल रहे थे।

किसी ने कुछ नहीं सुना, गाड़ी चली गई।

थोड़ी देर सारा घर चुप रहा। अचानक खुली खिड़की से दो चिड़ियां कमरे में घुस आईं।

‘‘हटाओ इन्हें’’, पति चीखा! वह चुप थी।

चिड़िया ने खिड़की पर एक तिनका रखा, दूसरी चिड़िया ने दूसरा तिनका रख दिया। दोनों ने दिनभर में एक छोटा-सा घोंसला बना लिया था।

तब कहा, ‘‘रहने दो, मन लगा रहेगा। खाली घर कब तक अच्छा लगेगा।’’ पत्नी ने आगे धीरे से कहा, ‘‘चाय पियोगे, लाती हूँ। नए मेहमान आए हैं। चाय तो बनती है।’’

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3-मददगार

सुबह- सुबह सड़क पर एक एक्सीडेंट हुआ है, एक लड़का सड़क के किनारे बने गड्ढे में, बाइक के साथ ही गिर गया है।

वो अपने आप को बचाने की गुहार लगा रहा है, फ़ोन पर किसी को बुला रहा है ।

गढ्ढा गहरा है , वो धीरे धीरे डब रहा है।

भीड़ में कुछ लोग , वीडियो बना रहे हैं , कुछ मज़ाक़ बना रहे हैं।

‘‘इतने उजाले में कोई कैसे गढ्ढे में गिर सकता है।’’

बाइक वाला लड़का देख रहा है, दूर बैठा एक कुत्ते का पिल्ला उसे देख रहा है।

इस लड़के ने उसे बचा लिया , लड़का डूब रहा है।

कोई उसे बचाने पानी में नहीं उतर रहा है, लगता है वो डूब जाएगा ।

तभी कुत्ते ने पानी में छलाँग लगा दी ।

‘‘अरे कोई बचाओ , दोनों मारे जाएँगे,’’ कोई चिल्लाया ।

भीड़ में से किसी ने रस्सी फेंक दी है , वो व्यक्ति रस्सी पकड़ कर बाहर आ रहा है। कुत्ते का पिल्ला , पीछे पीछे तैरता हुआ आ रहा है।

पता नहीं किस ने किसको , मुसीबत से बचा लिया था ।

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4-शायद


जनवरी की सर्द रात, सड़क पर दूर दूर तक सिर्फ हवा है , जो दरवाजों को चीर देना चाहती है ।
उसने अपने घर के खिड़की पर एक छोटी सी चिड़िया को फड़फड़ाते हुए देखा।
खिड़की के बंद पल्लों पर वो बार बार पंख मार रही है, भीतर आना चाह रही है।
घर में सारे लोग डिनर टेबल पर गर्म भोजन कर रहे हैं।
चिड़िया थोड़ी देर बाद वहाँ नहीं दिखी ।
सारी रात मन में एक ग्लानि थी , कहीं मर तो नहीं गई , वो नन्ही चिड़िया ।
टीवी पर एक सीरियल चल रहा है, जानवरों ने सारी धरती पर क़ब्ज़ा कर लिया है, मनुष्य डर कर भाग रहे हैं।
ये हम सब की धरती है, हम एक दूसरे पर निर्भर हैं। सीरियल में कोई बोल रहा है , शायद ।
मैंने भाग कर देखा रात को घर का रोशनदान खुला रह गया था,शायद ।
शायद वो चिड़िया घर के किसी गर्म कोने में आ गई होगी ।
मैंने कुछ दाने निकाल कर एक प्लेट में रख दिये। शायद कल से भूखी भी हो।

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5-रेशम का रिश्ता

एक दुपट्टे का टुकड़ा उंगलियों से उलझ कर दूर आ गया है , जैसे माँझा भटक कर पतंग के साथ आ गया है।
घर से लौटे दो दिन हो गए हैं। मैं अपनी पेंट में से रूमाल निकालने के लिए हाथ डालता हूँ, तो रूमाल के साथ ही एक चिट्ठी जमीन पर गिर पड़ती है। साथ ही कुछ रेश्म के धागे जैसा कुछ किनारे से फँसा हुआ है।
‘‘मेरी शादी होने जा रही है, क्या तुम मुझसे मिलने आओगे ।’’
नीचे न कोई नाम, न पता ।
मैं कमरे में कुर्सी पर बैठ गया, कौन हो सकता है। घर पर मुझसे मिलने कौन- कौन आया था। कुछ याद नहीं आ रहा है ।
अचानक दुपट्टे का कोना नज़र आया, शुभम गारमेंट्स लखनऊ, कुछ याद आया,वसुधा अब भी मेरा इंतज़ार कर रही है।
ये चिठ्ठी मेरे दफ्तर के पते पर आई थी, मैंने बिना देखे ही जेब में रख लिया था ।
मैंने चिट्ठी तो फाड़ दी; लेकिन वो रेशम का टुकड़ा रख लिया था।
मैंने उसी पते पर अपनी शादी का कार्ड जो दो साल पुराना है, उसे भेज दिया था, साथ में एक छोटा सा ख़त भी लिखा।
वक्त बहुत आगे निकल चुका है, गोमती नदी में बहुत- सा पानी बह चुका है, रेशम का टुकड़ा हमेशा मेरे पास रहेगा ।
कुछ रिश्तों को तत्काल ही समाप्त हो जाना चाहिए। थैंक्स ।
एक दिन पत्नी ने पूछा था , “ये रेशम का टुकड़ा यहाँ कैसे।”
मैं क्या बोलता सिर्फ़ इतना ही कहा था , “किसी पतंग की डोर में फँसा था, अच्छा लगा तो रख लिया।”
शाम को उसे जला दिया। कुछ रिश्ते यूँ ही सुलगते रहें तो अच्छा लगता है।

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6-तथास्तु

एक पति और उसकी पत्नी किसी सुनहरी नदी के किनारे बैठे थे । दोनों किसी बात पर उलझे थे , बिना आवाज़ किये झगड़ रहे थे । तुम्हारी माँ , तुम्हारा बॉस ।
दोनों एक दूसरे की ग़लतियाँ गिना रहे थे , धीमी आवाज़ में ।
वहाँ , लोग थे , बच्चे थे , मोर था , नदी थी , नदी में बत्तख़ थी । दोनों अब भी झगड़ रहे थे।
वहाँ से नदी चली गई , बत्तखें चलीं गईं , मोर लौट गया।वो अब भी एक ही बात पर चुपचाप झगड़ रहे थे।
ना वहाँ एक की माँ थीं ना दूसरे का बॉस। वहाँ कोई नहीं था ।

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