1-बचपन
मैं तीसरी कक्षा में पढ़ता हूँ । रोज़ स्कूल, होमवर्क और बाद में ट्यूशन । क्या करूँ? माँ मुझे नहीं पढा़तीं हैं कहती हैं, ‘मेरे पास टाइम नहीं है ।’
मैं शाम को बहुत कम समय खेल पाता हूँ । मुझे खेलना बहुत अच्छा लगता है । टीवी मुझे पसन्द नहीं । रात को माँ अपने घर के काम और फिर मोबाइल में व्यस्त रहती हैं । मुझसे बहुत कम बात करती हैं । पापा ऑफिस से देर से घर आते हैं ।
आज मैं खु़श था । आज माँ अपनी मित्रों के साथ ‘हरिद्वार वाले’ के यहाँ आई थीं । यहीं मेला भी लगता है । झूले और खिलौने सब यहाँ मिलते हैं । वे सब इकट्ठे हुए और लगे खेलने, वो हॉउसी का खेल होता है ना! मैं बैठा बस देख रहा था ।
उकताकर माँ से कहा, ‘माँ,बाहर चलो मुझे झूले झूलने हैं ।’ माँ ने कहा, ‘पहले गेम पूरे होने दो फिर बाहर चलेंगे ।’ मैं क्या कहता । समझदार बच्चा बने रहना ज़रूरी है । नहीं तो फिर माँ नाराज़ होतीं, ‘अवि तुम कब ….?’ चुप बैठा इंतज़ार करता रहा । कब ये गेम खत्म हों और हम बाहर जाएँ ।
हम जैसे ही बाहर निकले मैं झूलों के पास दौड़ा । बस दो ही झूलों पर बैठा और माँ ने कहा, ‘देर हो रही है, अब घर चलो, हम फिर आयेंगे ।’ मेरा मन नहीं भरा था । मैं और घूमना चाहता था । माँ से कहा भी तो बोलीं, ‘ज़्यादा ज़िद नहीं, अवि घर चलो ।’
घर आकर मैं रोने लगा तो माँ चिल्ला पड़ीं-‘अवि तुम बहुत जि़द्दी हो गए हो। बिलकुल कहना नहीं मानते हो ।’
मेले मैं पूरे वक़्त चुप बैठा रहा । झूले,जो झूलने थे, वो बाद में झूले । वो भी बस दो ।
अब आप ही बताओ और कितना समझदार हो सकता हूँ?
वैसे खेलने की उम्र किसकी है, मेरी या माँ की?
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2-गँवार
आज शंकर की जगह उसका बेटा दूध देने आया ।
घर के दरवाज़े पर उससे दूध लेते हुए मैने पूछा-“सुभाष, आज पिताजी क्यों नही आये?”
सुभाष ने कहा-“उनकी तबियत ख़राब है भाभी जी ।”
दूध लेकर घर में जाने को पलटती उससे पहले किसी जीप ने सुभाष की मोटर सायकिल को टक्कर मार दी । सारा दूध ज़मीन पर फैल गया ।
आगे सुभाष उसके पीछे मैं भागी ।इतने सारे दूध का नुक़सान मुझे बेहद दुःखी कर गया ।
सुभाष उन जीप वाले लड़कों से हाथ जोड़कर कह रहा था-“कोई बात नही, भाई साहब अनजाने में हो गया आप परेशान न हो!”
वो लड़के बड़ी गर्वीली मुस्कान के साथ जीप आगे बढ़ाकर चले गए ।
ज़मीन पर फैले दूध को देखकर मेरे गुस्सा सातवें आसमान पर था ।
मैने सुभाष को डाँटते हुए कहा-“तेरा दिमाग़ ख़राब हो गया था क्या, गँवार ! इतना नुक़सान हो गया और तू उनके आगे हाथ जोड़ रहा था ।”
अपनी गिरी हुई मोटर सायकिल को उठाते हुए घ बोला-“भाभी, पिछली बार की समझदारी का ये निशान है ।”
उसने अपने माथे पर टांके के निशान को दिखाया और बोला-“माँ ने अपने मरे मुँह की कसम देकर कहा था ।ख़बरदार!जो आज के बाद तूने किसी से हक़ की बात की, तो मेरा मरा मुँह देखेगा ।बस भाभी जी तभी से गँवार बन गया हूँ ।”
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3-हद हो गई
नौकरी लगने के बाद पहली बार माँ, मेरे साथ दिल्ली जा रही थी । हमने अपनी बर्थ पर सामान रखा और ट्रेन चल दी । एक बुज़ुर्ग दंपती हमारे इंतजार में ही बैठे थे । उनकी एक बर्थ ऊपर की थी । उन्होंने मुझसे बर्थ बदलने की बात कही और उनके सूटकेस का नम्बर वाला ताला उनसे नही खुल रहा था,वो मुझसे खुलवाया ।
ये सब देखकर माँ को कुछ अच्छा नही लगा और वो बुदबुदाते हुए बोली-“हद हो गई!”
मैने उनको आँखों से चुप रहने का इशारा किया ।
जब हम माँ बेटे खाना खाने लगे तो मैने माँ से कहा-“अचार तो निकालो, मुझे तो पहले वो चाहिए ।”
“अचार की डिब्बी तो घर में ही छूट गई ।” माँ जानती थी उनके हाथ का अचार मुझे बहुत पसन्द है ।
हमारी बात जब उन दंपती ने सुनी, तो जिद करके अपने पास से अचार हमे दिया । जिसे खाते ही मेरे मुँह से निकल पड़ा-” माँ, ये तो बिल्कुल तुम्हारे हाथ के बनाए अचार जैसा ही है ।”
अगले स्टेशन पर मुझे पानी का बॉटल खरीदना था । माँ बोली -” रवि, अब तू भी सो जा! रात के बारह बजे अगला स्टेशन आएगा, तब तक मै तो सो जाऊँगी तु अकेला बाहर जाएगा मुझे पसन्द नही!”
-“माँ, अब मै बच्चा नही हूँ । तुम चिंता मत करो सो जाओ ।”
हमारी बात सामने वाले बुज़ुर्ग सुन रहे थे ।
वे माँ से बोले-” आप चिंता मत करो दरवाज़े पर मै खड़ा रहूँगा इसका ध्यान रख लूँगा ।”
सुबह जब स्टेशन आया तो उन दम्पती ने जिद करके मुझे अचार की बर्नी दे दी । बोले-“अब अगली बार जब माँ भेजे तब तक इससे काम चला लेना ।”
उनके स्नेह के कारण हम उनको मना नही कर पाये । स्टेशन पर उनका सामान उतारकर हम जैसे ही आगे बड़े वे बोले-“बेटे, हमारी गाड़ी आ गई है ,हम आपको आपके घर तक छोड़ देते है ।”
अबकी बार माँ की आँखें एक बार फिर कह उठी, ‘हद हो गई!’
घर जाकर अपना सामान रखा और माँ ने मेरे पास आकर मेरे माथा चूमते हुए कहा-“हदों में जीना जीवन नही है । ये आज तुझसे सीखा।”
अबकी बार मेरे आँखे कह उठी….
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4-डर
रविवार का दिन था । सौरभ मेरे सामने बैठा था । उससे बात करने की हिम्मत नही हो रही था । अखबार से अपना चेहरा छुपा, आँसू रोकते हुए बोलने की कोशिश की तो दोस्तों के शब्द कानों में बजने लगे– ‘बड़े बेवकूफ़ हो तुम! मकान बेचकर बीस लाख बेटे के हाथ पर रख दिये, इतना विश्वास! ; अच्छे को बुरा बनते देर नही लगती, वह तभी तक अच्छा था ,जब तक पैसे तुम्हारे पास थे; दस-पन्द्रह दिन का कहा था, तीन महीने हो गए; कही तुम्हें सड़क पर न पहुँचा दे एक दिन; वैसे उन्हें अब तुम्हारी ज़रूरत भी क्या है? लगता है सत्तर लाख के विला के चक्कर में तुमने पुराना मकान भी गँवा लिया ।’
ख़ुद को सम्हाला और सौरभ से पूछा, “बेटा, बहुत समय हो गया, हम कब शिफ्ट हो रहे हैं?”
सौरभ जो सोचता था मुझे उसपर अटूट विश्वास है, बोला, “बाबूजी, एक दूसरा ड्यूप्लेक्स भी देखा है । मुझे लोन नही मिल पाएगा इसलिए विभा अपने ऑफिस में कोशिश कर रही है । शायद काम हो जाए ।”
मन डूबने लगा । जो मुझे दिखाया उसे छोड़ दूसरा मकान क्यों? फिर भी बात तो करनी ही थी । इसलिए बोला, “बेटा, जो हमने देखा था, वो भी तो अच्छा था, फिर दूसरा क्यों?”
“बाबूजी, वहाँ आसपास मन्दिर नही था और चौराहा पार करने के बाद ही कोई दूकान थी । आप और माँ को अकेले जाने में दिक्कत होती । अभी जो दूसरा ड्यूप्लेक्स देखा है, वहाँ सबकुछ पास ही है । आप दोनो को आराम रहेगा । बस, दस लाख ज़्यादा हैं । इसीलिए थोड़ा वक्त लग रहा है । कोई परेशानी है क्या बाबूजी?”
अब आँखों के आँसू छुपाने की ज़रूरत नही थी । मैने भर्राई आवाज़ में कहा, “तेरे होते कभी कोई चिंता हो सकती है क्या?”
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5-गाइड
पहना तो हमने आज भी सलवार सूट ही है । मंच पर खड़े हैं हम, जूनियर वैज्ञानिक का ख़िताब लेने के लिए । फर्क ये है कि कभी इसी सूट के कारण किसी ने हमें ‘बहन जी’ कहा था । वे भी आज दूर से हमें देख रही हैं ।
आज से तीन साल पहले हम इस कॉलेज में आए थे । अपने गाँव में 12 वीं में अव्वल आए तो गुरु जी ने हमें शहर में इस कॉलेज में दाखिला दिलवाया । माँ-बाबा को मनाना आसान नहीं था । पहले दिन कॉलेज में किसी से भी बात नहीं हुई । होस्टल में जो पहली मित्र बनीं वो वे ही थीं ।
उन्होंने कहा, “ये क्या ऐसे बहन जी की तरह रहोगी? ये सलवार सूट तो अपने गाँव के लिए ही रख दो सम्हाल कर । अब ये जीन्स पर कैसा शर्ट पहना है? बाबाजी का झंगा ! तुम शहर के सबसे बड़े कॉलेज में आई हो । अपने ढंग बदलो ।”
और हम बस चुप ही रह गए थे ।
वे फिर बोली थीं, “फोन? एंड्रॉइड के बगैर कैसे रहोगी? व्हाट्सअप के बिना जीना इम्पसीबिल है ।”
“…यहाँ हम पढ़ने आये हैं ना बहना! ” हमने प्रतिवाद किया था ।
“बहना..क्या बहना? डूड! यहाँ ये सब नहीं चलेगा । जस्ट चेंज योरसेल्फ! हाउ कुड?” वे इतराकर बोली थीं ।
“भाषा तो हमें अंग्रेजी और फ्रेंच भी आती है । पर हिंदी का ऐसा हाल? और हमारे पास लेपटॉप है न, फिर दूसरे फोन की क्या जरूरत?” हमने फिर अपना तर्क रखा था ।
“मेरा कहा मानो, नहीं तो सब तुम पर हँसेंगे । जैसे मैं गाइड कर रही हूँ वैसे करो । कोई तुम्हारे पास बैठना भी लाइक नहीं करेगा ।” वे झल्लाई थीं ।
तीन साल का सफर!! खुद को बदला, पर ऐसे नहीं कि अपनी जड़ों को ही भूल जाएँ । न तो हिंदी में अंग्रेजी का ऐसा घालमेल किया और न ही एंड्रॉइड लिया । बस यूँ ही अपने आत्मविश्वास का हाथ थामे….आज भी वही सलवार सूट है । हाँ ‘ड्रेसिंग सेंस’ आ गया है ।
अब आप ही बताओ किसे किसके ‘गाइडेंस’ की जरूरत है?
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