बूढी सिन्ड्रैला
मोहिनी वत्स ने दर्पण में निहारा तो वह स्वयं को पहचान नही पा रही थी। विवाह की पच्चीसवीं वर्षगाँठ पर दिया गया हीरे और पन्ने का सैट जिसे उन्होंने पति के बाद कभी पहना ही नही तथा उससे मैच करती हरे रंग की किनारी वाली सफेद साडी।उनके मन में टीस-सी उठी कि वह घर में रहें या बाहर जाएँ किसी को इससे कोई प्रयोजन नही। उनका घर में होना या न होना तभी गौरतलब होता है जब कोई सेविका या परिचारिका छुट्टी पर हो।उन्होंने बहुत चाहा कि वह यह बात दोनों बेटों और बहुओं से कह पाएँ कि वह आज किसी के घर या मंदिर कीर्तन-भजन के लिए नही बल्कि राष्ट्रपति-भवन में एक भव्य कार्यक्रम में ”सरस्वती-वंदना” लिए आमंत्रित हैं।उनके अपने जाने की बात कहने पर किसी ने कुछ नही पूछा तो कुछ भी जिक्र करने का प्रश्न नही उठता।
दोपहर का समय था, डाइनिंग। हाॅल में टी वी चल रहा था। दोनों बहुएँ आज एक साथ खाने की मेज पर थी, दोनों बडे बच्चे स्कूल से आ गए थे । कपडे बदलकर खाने के लिए आ बैठे थे कि सहसा गर्वित ने कहा – दादी टी वी वाली औरत जैसी लग रही है।उसकी बात पर कोई ध्यान देता कि दरवाजे पर घंटी बज उठी।इस बार अर्पित उठा और दरवाजे पर पहुचकर बोला – मम्मा ! राष्ट्रपति भवन से कोई सी डी आई है मिसेज वत्स के नाम से । दोनों बहुएँ जैसे ही उठने को हुईं कि अर्पित ने मोहिनी से कहा – दादी , यह सी डी आपके नाम से आई है। दोनो बहुओं के चेहरे फक्क पड गए ।वे हैरान होकर कभी सुरीले स्वर में तन्मय होकर गाती हुई मनमोहिनी गायिका को देखतीं ,कभी सूती साड़ी मे लिपटी अस्त-व्यस्त सास मोहिनी को देखतीं; जो बडे सलीके से खाना परोस रही थीं ।
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