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जून 2026
संचयनलघुकथाएँ Posted: May 1, 2018
गर्मी का मौसम शुरू हो गया था, आँधी-बारिश कभी-भी आ सकती थी। रीना को चिंता थी अपने घर की छत साफ करवाने की। पिछले साल नालियों में कचरा फँसने से पूरी छत पानी से भर गई थी व सीढ़ियों के रास्ते पानी घर में घुस आया था। बड़ी विकट
नींद में भी कसमसा रही थी निक्कू, ठीक से सो नहीं पा रही थी। माँ समझ गई, उसने तेल मालिश की व थोड़ी देर पैर दबाए, तब जाकर उसे नींद आ पाई।
उम्र होते ही माँ-बाप ने तो ‘लड़का डॉक्टर है’,यह जान कर ही शादी कर दी थी। तब लड़कियों से पूछने का चलन ही कहाँ था।
गुप्ता जी का पालतू कुत्ता टॉमी, जब भी गले में चमचमाते पट्टे व जंजीर के साथ घूमने निकलता तो उसका सामना रोज़ ही मोती व अन्य गली के कुत्तों से होता। वो उन्हें मुँह चिढ़ाता, हिकारत भरी नज़रों से देखता, नाक भौं सिकोड़ता हुआ शान से गरदन उठाकर चलता। गली के कुत्तों को उसकी ये हरकत नागवार गुज़रती।
5-अपेक्षा
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समस्या खड़ी हो गई थी, घर साफ करतेे हुए कमर के दर्द को याद करके ही रीमा सिहर गई। सफाई वाली पहले से बीमार चल रही थी। कामवाली बाई ने भी ‘समय नहीं है’ का रोना रोकर इंकार कर दिया था। नौकर हरी भी अकेला करने में असमर्थ था। अब करे तो क्या करे! उसने काफी समझा-बुझाकर, अनुनय विनय कर, एक्स्ट्रा पैसों का लालच देकर माली को तैयार किया इस काम के लिए। अगले दिन सुबह-सुबह माली आ गया। उसने नौकर हरी को भी साथ लगा दिया उसकी मदद को। दोनों ने मिलकर थोड़ी-ही देर में छत साफ कर दी। अब रह गया तो एक पुराना बड़ा-सा टब, जिसमें कुछ दिनों पूर्व कराए गए मरम्मत के काम में से बचा रेत रखा था।