लघुकथा.com
जून 2026
मेरी पसन्दमेरी पसंद Posted: January 1, 2019
आज लघुकथा हिन्दी की सशक्त गद्य विधाओं में सम्मिलित हो चुकी है । आकार में वामन रूप होने के बावजूद लघुकथा अपने तीन पगों अर्थात् भाषा, शिल्प और अभिव्यंजना में अखिल ब्रह्माण्ड को नापने की सामर्थ्य रखती है । हिन्दी में
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लघुकथाकारों ने अपनी पैनी तथा प्रतीकों से युक्त समर्थ भाषा से लघुकथाओं में नई अर्थवत्ता भरी है । ये लघुकथाएँ अपने समकाल की एक-एक विसंगतियों, विद्रूपताओं को खोजकर पाठक के सामने मूर्त करती हैं । मानव मन के एक-एक कोने की पड़ताल करती हैं । छद्म को उजागर करती हैं । व्यंजनात्मकता के साथ समाज के प्रति तीव्र दायित्वबोध और संवेदनशीलता के साथ आज अनेक लघुकथाकार निरन्तर लेखन कर रहे हैं । गद्य की अन्य विधाओं की भाँति लघुकथाएँ भी 1901 से लिखी जा रही हैं. लेकिन आठवें दशक में लघुकथा ने कुछ प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं के माध्यम से प्रसिद्धि पाई । आज भी ‘हंस’, ‘कथादेश’, ‘वीणा’, ‘आजकल’, और ‘अक्षरा’, जैसी पत्रिकाएँ निरंतर लघुकथाएँ प्रकाशित कर इस विधा को एक मंच प्रदान कर रही हैं। ‘लघुकथा डॉट कॉम’ जैसी वेब पत्रिकाओं ने इस विधा की सृजनात्मकता को एक विस्तृत आकाश प्रदान किया है । मुंशी प्रेमचंद, चन्द्रधर ‘शर्मा ‘गुलेरी’, विष्णु प्रभाकर, हरिशंकर परसाई, चित्रा मुदगल, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, ‘शरद जोशी, सुकेश साहनी ,रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, मुकेश वर्मा, असगर वजाहत, सूर्यकांत नागर,, बलराम अग्रवाल, रामकुमार आत्रेय, रामनिवास मानव, अनिल चन्द्रा, मीरा जैन आदि नामों के साथ एक बहुत लम्बी सूची है उन लघुकथाकारों की जिन्होंने इस विधा को अपनी सृजनात्मकता से समर्थ बनाया । आज भी नई पीढ़ी के अनेक लेखक इस विधा में सक्रिय हैं । लघुकथाएँ अर्थगांभीर्य की मिसाल होती हैं ।