जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: February 1, 2019

1-वह जो नहीं कहा

सुबह 6 बजे

सुनो जानू! आज तुम टूर पर हो तो लग रहा है, आज यह घर पूरा का पूरा मेरा है। लग रहा है, मैं आज सच्चे अर्थो में घरवाली हूँ, वर्ना तो शाम के समय पूरे घर में तुम्हारी ही आवाजें सुनाई देती हैं– ‘सुनती हो चाय बनाओ, जल्दी से खाना लाओ, चादर नहीं झाड़ी अब तक भई! तुम तो सारा दिन सोई रहती हो और अब आधी रात तक बर्तन बजाती रहोगी। अब दूध क्या एक बजे रात को दोगी।’ पूरा दिन यही सब सुनते बीतता है। पर आज कितनी शान्ति है ! आज मैंने शादी के बाद पहली बार अदरक डली चाय बनाई है। अब आराम से अपना मनपसन्द कोई नॉवल पढ़ना चाहती हूँ। तुम तो अपनी मीटिंग की फाइलों में उलझे होगे, फिर भी बाय!

सुबह 10 बजे

सुनो जानू, मीटिंग शुरू हो गई क्या? पक्का हो गई होगी। मैंने भी मन्नू भंडारी का ‘आपका बंटी’ खत्म कर लिया। बेचारा बंटी! पर बंटी को बेचारा होने से बचाने के चक्कर में कितनी शकुन हर रोज़ बेचारी होती है। तुम मर्द कैसे समझोगे। खैर जाने दो। मैंने आज अपने लिए सैंडविच और पोहा बनाया, चटखारे लेकर खाया। रोज-रोज आलू के परांठे खा के उब गई थी। तुम तो कभी ऊबते ही नहीं परोंठों से। मन में संतुष्टि हो रही है। अब कुछ देर टी.वी. पर कोई सीरियल देखूँगी। जब तुम घर होते हो ,तब तो टी. वी. पर या तो न्यूज चलती हैं, या फिर कोई मैच; वह भी तब तक जब तक तुम्हारा मन करे, वरना टी.वी. बंद। अरे कोई अच्छा-सा सीरियल शुरू हो गया है, इसलिए बाय!

दोपहर 3 बजे

जानू, आज मैंने कई दिनों बाद फ़िल्म देखी। लगा था, जिन्दगी मशीन हो गई है। पर नहीं, दिल अभी धड़क रहा है। पुरानी फिल्म थी, साहब बीबी और गुलाम। मीना कुमारी छोटी बहू बनी है; गरीब घर की बेटी और बड़े जमींदार की पत्नी। पति को नाचने वाली से और शराब से फुर्सत नहीं। बीवी बेचारी सारी जिन्दगी उसे खुश करने के चक्कर में पागल हुई रहती है। सुनो! ये हसबैंड लोगों को बाहर वालियाँ क्यों अच्छी लगती हैं? बेशक कोई बाहर वाली घास भी न डाले, पर ये लट्टू हुए आगे-पीछे घूमते रहेंगे। घरवाली को सिर्फ कामवाली बाई बनाए रर्क्खेगें। अरे, आज सफाई तो की ही नहीं। चलो, अब थोड़ी सफाई कर ली जाय, फिर खाने के बारे में सोचूँगी। बाय!

शाम 7 बजे

जानू, शाम को सफाई में ही तीन घण्टे लग गए। आज मैंने घर रगड़-रगड़ कर साफ़ किया। एक-एक खिड़की दरवाजा, रोशनदान झाड़कर चमकाए। इस घर पर सच में बहुत प्यार आया। फिर सारी चादरें बदलीं, सोफा-कवर बदले। पूरा घर अलग ही लुक दे रहा है। कपड़े धोने के लिए मशीन में डाले। फिर अपने लिए रोटी बनाई। सब्जी तो वही पड़ी थी, जो रात तुम्हारे लिए बनाई थी, उसी के साथ खा ली। अब कुछ देर गाने सुने जाएँ, ठीक! बाय !

रात 11 बजे

सुनो जानू, शाम को खाना तो बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ीं। खाया ही आठ बजे था, पर कॉफ़ी का एक कप बनाया। एक तुम्हारा भी बन गया था ,सो दोनों कप मुझे ही पीने पड़े। फिर सास-बहू के सीरियल देखे। बहुत दिनों से देखे नहीं थें, पर लगा नहीं कि एक साल बाद देखे। वही कहानी, वही करेक्टर, वही उनके षड्यन्त्र। फिर भी अच्छा समय बीत गया। अब सोने जा रही हूँ। अच्छा अब गुड नाइट!

रात 2 बजे

सुनो जानू, तुम तो सो चुके होगे, पर मुझे नींद नहीं आ रही। तुम्हारे चीखने-चिल्लाने की आवाजें सुबह से अब तक नहीं सुनीं। शायद इसलिए या इस समय पूरे कमरे में गूँजते खर्राटो के बिना सोने की आदत नहीं रही ,इसलिए। कारण जो भी हो, पर नींद तो सचमुच ही नहीं आ रही। इतना अच्छा दिन बीता फिर तो निश्चिंत होकर सोना चाहिए न, फिर भी नहीं सोई। तुमसे पूरी तरह से न जुड़ पाने के बावजूद तुम्हारे बिना नींद नहीं आ रही। पर तुम यह सब कैसे जानोगे। तुम खुद कभी ये समझोगे नहीं और मैं तो शायद कभी कह ही नहीं पाऊँगी;क्योंकि जब तुम घर में रहोगे ,तो यह घर तुम्हारा ही होगा। तुम ही बोलोगे, तुम ही हुक्म दोगे। मैं तो सिर्फ़– ‘जी, आई जी, जी लाई जी,’ ही कह पाती हूँ। पर फिर भी तुम्हें मिस कर रही हूँ। अपनी मीटिंग जल्दी से खत्म करो और आ जाओ। मुझे नींद नहीं आ रही है।

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2-चुपड़ी रोटियाँ

            रजनी ने सिम्मी आंटी का दरवाजा जोर से खटकाया। सिमरन ने दरवाजा खोला तो रजनी एकदम से फट ही पड़ी।

            ‘‘आंटी जी! इसे कहते हैं कलयुग। घोर कलयुग आ गया घोर।’’

            ‘‘पर हुआ क्या? बता तो सही। क्यों बिना बात लाल सुर्ख हुई जा रही है।’’

            ‘‘क्या बताऊँ? बताते हुए भी शर्म आ रही है। कभी ऐसा अंधेर आपने कहीं देखा पढ़ा, कि बेटा बहुएँ ससुर का परछन करें।’’

            ‘‘क्या बोल रही है रजनी?’

            ‘‘सही कह रही हूँ आंटीजी। आपके ढिल्लो साहब शादी करने गए हैं कोर्ट में। आज माया को कह रहे थे हमें सुना कर, नीचे का पोर्शन अच्छे से साफ करके फर्श धो देना। चादर और परदे भी बदल देना। तीन बजे तक तुम्हारी नई मालकिन आ जाएगी और बाकी सब सुन लें, अगर किसी को ऐतराज है तो अपना सामान उठा के जा सकता है, नहीं तो चुप होके बैठे ऊपर। हम तो आंटी सुनके सुन्न ही हो गए। जब तक होश आया पापा जा चुके थे।’’

            ‘‘तुम्हे गलत फहमी हुई होगी रजनी। गुस्से में कह गए होंगे। वरना पैंसठ साल की उम्र में कोई शादी करवाता है।”

            रजनी चली गई तो मैं इस सारी घटना की समीक्षा में लग गई। मिस्टर ढिल्लों दस साल पहले हमारे पड़ोस में रहने आए थे। मिसेज ढिल्लों बडी प्यारी और मिलनसार महिला थी। सबसे हँसकर मिलती। किट्टी पार्टियों को तो वे जान थी। दो बेटे थे दोनों अच्छी नौकरी में अच्छे पदों पर कार्य रत थे। सब ठीक चल रहा था कि मिसेज ढिल्लो को अचानक ऐसा हार्ट अटैक आया कि साथ ही ले गया। पूरा घर ही बिखर गया। कहाँ तो वे हमेशा कहती दो साल बाद जब ढिल्लों साहब रिटायर हो जाएँगे फिर हम लम्बे टूर पर जाएँगे। पर इसकी नौबत कहाँ आई।

            पत्नी की मौत के दस महीने बीतते न बीतते ढिल्लों साहब ने दोनों बेटों की शादी कर दी। उसके सात महीने बाद ही ढिल्लों साहब रिटायर हो गए। कुछ दिन तक तो सब ठीक चला। उसके बाद घर के काम को लेकर अक्सर लड़ाई झगड़े होने लगे ,पर ये तो हर घर में  होता ही रहता है ,जहाँ दो बहुएँ हों काम के बँटवारे को लेकर अक्सर बहस हो ही जाती है।

            लेकिन चार बजते ही गली में ढोल की आवाज सुनाई दी। बाहर निकलकर देखा ,तो ढिल्लो साहब के साथ करीब चालीस पैंतालिस साल की औरत कार से उतर रही थी। मुझे देखते ही ढिल्लों साहब ने सफाई दी, ‘‘भाभी जी मेरी रोटी इन सबको भारी पड़ रही थी। तीन चार दिन से मेरी दो रोटियों के लिए दोनों वक्त ये बहुएँ लड़ना शुरू  कर देती थीं। मैंने आज इनकी सारी समस्या ही दूर कर दी। ये प्रीती है ,इसका कोई नहीं है। इसकी ससुराल वाले विधवा आश्रम छोड़ गए थे। मैंने आज कोर्ट मैरेज कर ली । इसकी भी प्राब्लम दूर हो गई, मेरी भी।’’

            वे हाथ पकड़कर उसे अंदर ले गए थे। ऊपर अमर अपनी पत्नी से लड़ रहा था, ‘‘और करो लड़ाई। तुम बड़ी थी, तुम ही इज्जत से दो रोटी देती रहती तो ये नौबत तो नहीं आती।’’

            रजनी ने क्या कहा ,यह तो पता नहीं प,र ढिल्लों साहब की जिन्दगी के साल अब बढ़ गए हैं, ये पक्का है। और प्रीती को भी एक सुरक्षित ठिकाना तो मिल ही गया।

            मिश्र जी के बेटे ने अपनी बीवी को कहा, सुन आज से पापा का खास ख्याल रखना। कहीं इनका इरादा न बन जाए।

            ढिल्लों साहब के तो पराठों का इंतजाम हो गया। बाकी मौहल्ले के बुजुर्गों की थाली की रोटियों पर भी चुपड़ी रोटियाँ दिखने लगी थी।

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3-पुरानी चीज

               आराम कुर्सी की जगह अब बालकोनी में हो गई थी। उसपर उसकी एक टाँग बुरी तरह से हिलने लगी। जब भी कोई उस पर बैठने की कोशिश करता, बेचारी हिलकर, कराहकर अपनी तकलीफों को गाती ,पर किसी को सुनाई नहीं दिया।

               बच्चों को इस पर झूला झूलने में मजा आता। अब पिंकी गिर गया ,तो सजा भी उसे ही मिली। बड़े भैया ने उठाकर अँधेरे स्टोर में पटक दिया और पटका भी इतनी जोर से कि दोनों अगले पैर अलग हो गए। सारी शानो.शौकत मिट्टी में मिल गई। धूल के अम्बार में असली रंग का अनुमान लगाना मुश्किल था। हर रोज बेचारी ईश्वर से प्रार्थना करती कि कोई तो डॉक्टर के पास ले जाए और हर रोज एक दिन ढल जाता। आज महरी ने उसे झाड़ पोंछकर बाहर निकाला। छोटी बहू कह रही थी, ‘‘ले जाओ, पता नहीं ये पुरानी चीज क्यों सँभालकर रखी है। ले जाओ जला लेना।’’ न चाहते हुए भी उसे आग में झोंक दिया गया।

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4-फुर्सत

               वक्त ने कभी इतनी फुर्सत ही नहीं दी थी कि एक साथ बैठकर दो प्यार की बातंे कर लें। कभी मिली भी ,तो पहले माँ बाप ,तो फिर बच्चों का संकोच आड़े आ जाता रहा। अन्तरंग क्षणों में भी बहनों की शादी, बच्चों की यूनिफार्म, उनकी टयूशन नही चर्चा का विषय रहे।

               अब जब बच्चे अपने अपने काम धंधे में सेट हो गए हैं। अपनी रिटायरमेंट के बाद के अगले दिन गुनगुनी धूप में चाय पीते हुए उन्होंने प्यार से पत्नी को देखा, ‘‘आज शाम झील किनारे गोलगप्पे खाने चलोगी।’’

               पत्नी ने भी मुस्कुराकर कहा, ‘‘फुर्सत है ,तो डाक्टर के पास चले जाओ। कई दिनों से खाँस रहे हो। अदरक की चाय से तो कोई फर्क नहीं पड़ रहा।’’

               ‘‘तुम भी चलो, तुम भी तो घुटनों के दर्द से हाय हाय कर रही थी।’’

               ‘‘मैंने मूव लगा ली है। अब ठीक है। तुम चले जाओ।’’

               ‘‘और तुम?’’

               ‘‘मैंने गैस पर गाजर का हलवा चढ़ा रखा है। वो सुमंत का दोस्त है न रंजन ,वो कल जा रहा है पुणे।उसके हाथ भेज दूँगी। सुमंत को बहुत पसंद है न। बेचारी बहू को तो नौकरी में कुछ बनाने खिलाने की फुर्सत ही नहीं मिलती।’’

उनका मन किया आवाज देकर कहें, तुम्हें कहाँ फुर्सत मिलती है। पर चुप ही रह गए। सारी जिन्दगी उन्हें ही कहाँ फुर्सत मिली कुछ कहने सुनने की।

5-काम

            दफ्तर में पैर रखते हुए उसे घबराहट हो रही थी। पता नहीं ऑफिसर कैसा होगा। बात सुनेगा भी या बाहर से ही भगा देगा। काम हो भी जाएगा या डांट ही मिलेगी। इन्हीं चिन्ताओं में वह दफ्तर में कागज हाथ में पकड़ कर खड़ी थी।पति की मौत के बाद पेंशन के पेपर जमा करने थे, पर हर बार आकर भी अन्दर जाने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। उसकी परेशानी देख एक क्लर्क को आखिर दया आ गई।

            ‘‘जी बहन जी! क्या काम था? आप कब से यहाँ खड़ी हैं।’’

            उसने बिना बोले कागज आगे बढ़ा दिए। मन में सोचा, ‘ये कौन है? पता नहीं काम करवाने के कितने पैसे माँग लेगा? पता नहीं काम करवाएगा भी या चक्कर ही कटवाएगा?’ ऐसा ही कितना कुछ सोच गई वे एक मिनट में।

            क्लर्क ने कागज देख लिये थे।

‘‘बस इतना काम ही है। हो जाएगा जी आप ये सब मेरे पास छोड़ जाइए। मैं खुद करवा दूँगा, आप को आने की जरूरत नहीं है बस यहाँ साइन कर दीजिए।’’

उसने अविश्वास से देखा था, ‘‘पैसे कितने देने होंगे?’’

            ‘‘पैसे कैसे?,कोई पैसा नहीं।’’ वह हँस पड़ा था, ‘‘मुझे कोई पैसा नहीं चाहिए बहनजी। बस आपका काम हो जाएगा तो आपको फोन कर दूँगा। आप निश्चिन्त होकर जाइए।’’

            उसके मन से दुआएँ निकली थी। लोग झूठ ही डरा रहे थे या शायद सारे लोग एक से नहीं होते।

            उसने साइन करके कागज पकड़ा दिए थे।



 

 

 

 

   

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