‘दृष्टि’ लघुकथा का पाठ गम्भीर सिंह पालनी द्वारा बरेली गोष्ठी 89 में किया गया था। पढ़ी गई लघुकथाओं पर उपस्थित लघुकथा लेखकों द्वारा तत्काल समीक्षा की गई थी। पूरे कार्यक्रम की रिकार्डिग कर उसे ‘आयोजन’ (पुस्तक)के रूप में प्रकाशित किया गया था।लगभग 28 वर्ष बाद लघुकथा और उसपर विद्वान साथियों के विचार अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रतीत होते हैं-
दृष्टि
गम्भीर सिंह पालनी
सहसा आँगन से किसी ने उसे पुकारा। यह तो कई बरस बाद अचानक दिखाई पड़ा उसका सह्पाठी रणजीत था। घर के भीतर रणजीत को ले जाते हुए उसने सामने बैठे बाबूजी से उसका परिचय कराने के इरादे से कहा, ‘‘बाबूजी ये मेरा दोस्त है रणजीत सिंह।’’
‘‘हुँह, होगा तेरे जैसा ही कोई, बाप की कमाई फूँकने वाला।’’ का भाव दृष्टि में लिए बाबूजी ‘‘अच्छा, अच्छा’’ कहते हुए भीतर चले गए। फिर कुछ देर बाद बाहर आकर बोले, ‘रमेश तेरी माँ कह रही है कि अगर चाय बनवानी है तो पहले कुल्हाड़ी से लकड़ियाँ फाड़कर पतली कर दे कि चूल्हे में जल सके।’’
रमेश समझ गया कि अब और भी बहुत कुछ कहकर बाबूजी उसके दोस्त के सामने ही उसकी बेइज्जती करेंगे, जैसा कि वे अक्सर ही लोगों के सामने करने लगे हैं। मैं दो वर्ष बेरोजगार क्या रह गया हूँ कि बाबूजी हाथ धोकर पीछे पड़े रहते हैं।
‘इस रणजीत के बच्चे को भी घर ही आना था मिलने, वह भी बाबूजी के सामने’’, रमेश ने सोचा, लेकिन रणजीत को भी भला क्या मालूम कि रमेश के घर में महाभारत होता रहता है।’
‘‘तो सरदार रणजीत सिंह जी आजकल आप क्या कर रहे हें, पढ़ लिख के? मैं तो पहले ही कहता था अपने बरखुरदार से कि बी.ए.,एम.ए. करके कुछ होने वाला नहीं है। ये हजरत तो झख मार रहे हैं और आप…आपको कुछ काम मिला या नहीं?’’
रमेश को लगा कि जैसे सब कुछ मिट्टी में मिला देंगे बाबूजी। तभी रणजीत सिंह बोला,
‘‘नहीं सर, आपके आशीर्वाद से मैं खाली नहीं हूँ। मेरी नौकरी लग चुकी है तथा मैं आजकल इस कस्बे के पहाड़ बैंक मैंनेजर के छुट्टी पर जाने पर उसकी जगह डेपुटेशन पर बैंक के प्रधान कार्यालय से आया हूँ। मुझे सहसा ध्यान आया कि मेरा पुराना सहपाठी रमेश यहाँ का रहने वाला है तो लोगों से घर पता करे खोज-खबर लेने चला आया।’’
तो…तो …तो क्या रणजीत की नौकरी लग चुकी है। वह इतने अच्छे पद पर है। रमेश को लगा कि जैसे आज उसने बाबूजी को परास्त कर दिया है। बाबूजी भी अब सोचेंगे कि उनके बेटे के दोस्त बैंक में अच्छे पद पर हैं। इस कस्बे के एक मात्र बैंक का मैंनेजर उनके घर में आया था….यह सोचकर बाबूजी की दृष्टि में उनका बेटा रमेश ऊँचा उठ जाएगा।
उसने गौर से देखा, बाबूजी निरुत्तर हो गए थे। उन्होंने कहा, ‘आप लोग बैठिए। मैं बाजार से अभी आता हूँ।’’
बाजार से बाबूजी द्वारा लाए गए अच्छी क्वालिटी के बिस्कुट माँ ने चाय के साथ रखे थे। बाद में बाबूजी उसके दोस्त को छोड़ने उसके साथ खुद भी चौराहे तक आए।
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1-डॉ भगवानशरण भारद्वाज
पालनी की ‘दृष्टि’ हमारे साम्प्रतिक परिवेश के घिनौने नासूर-बेरोजगारी को पूरी भयावहता के साथ उजागर करती है।
2-डॉ.सतीशराज पुष्करणा
इस सत्र में गम्भीर सिंह पालनी ने ‘दृष्टि’ लघुकथा का पाठ किया है जो असहज एवं अस्वाभविक है। कारण, बेकार बेटे के आफिसर मित्र के प्रति पिता के मन में ईर्ष्या तो भर सकती है, उसके प्रति सम्मान भाव उत्पन्न नहीं कर सकती। इसी कारण इस लघुकथा को श्रेष्ठ नहीं कहा जाएगा। किन्तु इसके शिल्प एवं प्रस्तुति की प्रशंसा तो करनी ही पड़ेगी जो अन्त तक रंजनात्मकता बनाए रखती है।
3-डॉ. स्वर्ण किरण
गम्भीर सिंह पालनी की लघुकथा ‘दृष्टि’ में रणजीत बैंक में डेपुटेंशन पर अपने मित्र रमेश से मिलने आता है। उसे मालूम नहीं था कि रमेश के घर में महाभारत होता रहता है, रमेश समझता है कि बाबूजी बेइज्जत कर रहे हैं…स्पष्ट विवरण रहने से आम पाठक के अधिक अनुकूल है।
4-जगदीश कश्यप
दूसरे सत्र की लघुकथाओं पर संक्षिप्त रूप में ही अपने विचार रखूँगा, ‘दृष्टि’……निम्न मध्यवर्गीय परिवारों में एक बेरोजगार की विडंबनीय स्थिति सबको मालूम है। उससे सम्बन्धित पात्र उसी नियति को प्राप्त हो जाते हैं। बाकी इस रचना पर भाई सतीश पुष्करणा ने कह ही दिया है।
5-डॉ. शंकर पुणतांबेकर
गम्भीर सिंह पालनी की ‘दृष्टि’ लघुकथा मुझे अच्छी लगी। उपयोगितावादी दृष्टि जमाने की देन है। इस लघुकथा को और चुस्ती के साथे पेश किया जा सकता था।
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