जॉइस कैरी
अनुवाद ; सुकेश साहनी
नर्सरी का दरवाजा खुला, आवाज में मिश्री–सी घोलते हुए नर्स से नन्हीं मेहमान से कहा, ‘‘लो, हम आ गए, डार्लिंग! अब टॉम तुम्हें अपने सभी खिलौने दिखाएगा।” भूरे बालों वाली नन्ही लड़की ने रेशमी पार्टी–फ़्राक पहनी हुई जो उसके पैरो के गिर्द किसी लैम्पशेड की फैली हुई थी। भीतर आते ही वह दरवाज़े के पास ठिठक गई और अपने मेजबान की ओर ध्यान से देखने लगी। पाँच वर्षीय टॉम ने भी पार्टी–सूट, नीली नेकर और रेशमी शर्ट पहन रखी थी। वह भी टकटकी लगाए लड़की को देखे जा रहा था। बच्ची को वहाँ छोड़कर नर्स अपने दूसरे काम निबटाने पड़ोस की नर्सरी में चली गई थी।
टॉम लड़की को इस तरह देखे जा रहा था जैसे वह उसके लिए बहुत असाधारण एवं महत्त्वपूर्ण हो। अचानक उसने दोनों पैरों को मिलाया और किसी मेंढक की तरह लड़की की ओर तीन बार कूदा और बोला, “हैलो।”
बच्ची ने बड़ी अदा से अपने सिर को एक ओर झुकाया और एक पैर की एड़ी पर धीरे से घूमकर इस तरह पीछे देखा, मानो अपनी फ़्राक का मुआयना कर रही हो। वह अचानक झुकी, फ़्राक की किनारी को यूँ ही हल्के से झाड़ा और बोली, ‘‘हैलो!’’
टॉम ने एक और कूद लगाई, घूमा और खिड़की के बाहर इशारा करते हुए चिल्लाया, ‘‘टवेंकी टवीडल्!’’ दोनों को पता था कि कि इसका कोई मतलब नहीं है। टॉम ने अपने इस अंदाज से यही जाहिर करना चाहा था कि उसके लिए यह संयोग बहुत महत्त्वपूर्ण, मजे़दार एवं खास है।
बच्ची एक कदम आगे बढ़ी, उसने दोनों हाथों से फ़्राक को इस तरह पकड़ा हुआ था मानो नम्रता से झुकने वाली हो, फिर दोनो पंजों पर उचककर बिल्कुल रस्मी अंदाज में बोली, ‘‘इक्सक्यूज़ मी!’’
टॉम ने किलकारी मारी, मेज के चक्कर लगाए और फिर फर्श पर बैठकर रेल इंजन और उसके गोल ट्रेक से खेलने लगा। लड़की वहाँ पड़ी साइकिल पर सवार हो गई और पैडल मारती हुई बोली, ‘‘मैं तुम्हारी साइकिल चला पाती हूँ।”
टॉम ने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। वह देखना चाहता था कि इंजन बिना गिरे पटरियों पर कितनी तेजी से दौड़ सकता है।
बच्ची ने एक तस्वीरों वाली किताब उठा ली, मेज के नीचे टॉम की ओर से पीठ करके बैठ गई। फिर बहुत सावधानी से एक–एक पेज देखने लगी।
“इसका एक पहिया तो टेढ़ा है,’’ टॉम ने कहा, ‘‘तभी तो…. ।”
बच्ची ने कोई जवाब नहीं दिया। वह आँखें फैलाए, मुँह सिकोड़े तस्वीरों को देख रही थी। उसके चेहरे पर उस नर्वस बच्चे जैसे भाव थे ,जिसे अचानक जू में गरजते शेरों के बाड़े के सामने खड़ा कर दिया हो। उसने बहुत धीरे से पेज पलटा। नए पेज के खुलते ही उसकी आँखें और फैलती चली गईं, होंठ ओर अधिक सिकुड़ गए। उसे लग रहा था मानो किताब से निकलकर कोई जानवर उसपर झपटने वाला हो।
“टॉम!’’ अपना काम खत्म कर नर्स हड़बड़ाई–सी लौटी, ‘‘टॉम, कितनी बुरी बात है! अपने मेहमानों के साथ इस तरह पेश आया जाता है। बेचारी जे़नी, मेज के नीचे बैठी अपने आप खेल रही है।”
“वो अपने आप नहीं खेल रही!’’ टॉम ने कहा।
“ओह, टॉम! तुम फिर अपनी हरकतों पर आ गए। तुम्हें क्या हो गया है। चलो, उसके साथ खेलो….लायक अ गुड बॉय।”
“मैं उसके साथ ही खेल रहा हूँ,’’ टॉम ने रुखाई से कहा और गुस्से भरी तिरछी निगाह से नर्स की ओर देखा।
“देखो टॉम, बातें बनाना बंद करो। मैं देख रही हूँ- तुम शरारत के मूड में हो। उठो, सुना नहीं मैं क्या कह रही हूँ।”
वह तेजी से टॉम के पास आई और उसे बाँह से पकड़कर उठा दिया, ‘‘तुम्हें उसके साथ प्यार के साथ पेश आना चाहिए। आखिर तुम्हीं ने तो चाहा था कि वह यहाँ आए और तुम इसके लिए पूरे हफ्ते जिद करते रहे थे।”
इस राज के खुलते ही टॉम अपना आपा खो बैठा और चिल्लाया, ‘‘नहीं, मैं नहीं चाहता था, कभी नहीं….कभी भी नहीं…..!’’
“तब तो बेचारी जे़नी को मुझे वापस उसकी मम्मी के पास ले जाना होगा ।”
“ना, नहीं…नहीं!’’
“तो तुम उसके साथ खेलोगे, बोलो?’’
“नहीं, आय हेट हर….मैं कभी नहीं चाहता था कि वह यहां आए।’’
यह सुनकर लड़की उठ खड़ी हुई और रोषपूर्वक बोली, ‘‘यह बहुत गंदा है, है न?’’
टॉम ने झपटकर उसके बाल पकड़ लिये। बच्ची चीखी, उसने उसके पैर पर लात मारी और बाँह पर काट लिया। बिलखती हुई बच्ची को बाहर ले जाते हुए नर्स ने टॉम को धमकाया, ‘‘आने दो तुम्हारे पापा को, मैं उन्हें सब कुछ बता दूँगी ।”
और बाहर जाते हुए धड़ाम से दरवाजा बंद किया।
टॉम दरवाजे की ओर झपटा, उस पर लात जमाई। दौड़ता हुआ इंजन के पास गया और उसे उठाकर दीवार पर दे मारा। वह पाँच मिनट तक गला फाड़कर चिल्लाता रहा। उसने निश्चय कर लिया था कि उसे पूरे दिन यह सब करना है। आक्रोश से भरा वह गहरी पीड़ा से गुजर रहा था।
तभी दरवाजा खुला और बच्ची भीतर आ गई। उसके चेहरे पर आत्ममुग्धता वाले भाव थे। मानो उसने अचानक इस तरह आकर बहुत होशियारी दिखाई हो। इस कारनामे के एवज में टॉम से शाबाशी की माँग–सी करती बोली, ‘‘मैं आ गई!’’
टॉम ने अपनी डबडब करती आँखों से उसकी ओर देखा और सिसकी भरी। उसने इंजन को वापस उठाया और रेल ट्रेक के पास बैठ गया। इस बार उसके पहले प्रयास में ही इंजन पटरियों पर से पलट गया। वह फिर सिसका, इंजन के पहियों का निरीक्षण किया और फिर उनमें से एक पहिये को उसने सीधा किया।
मेज के नीचे बैठने से पहले लड़की ने अपनी पार्टी फ़्राक को पीछे से उठाया ताकि दबकर खराब न हो जाए। उसने पिक्चर वाली किताब घुटने पर रख ली।
टॉम ने इंजन को तेज रफ्तार से पटरियों पर दौड़ाना चाहा। उसके चेहरे पर अभी भी गुस्से और कड़वाहट के मिले–जुले भाव थे ;लेकिन इस बार वह सिसकी भरना भूल गया। अचानक उत्तेजना और हैरानी से उसके मुँह से निकला, ‘‘ओह, यह पटरियाँ भी गईं, अब मैं इंजन को किसपर दौड़ाऊँ?’’
बच्ची ने जवाब नहीं दिया। उसने धीरे से किताब को बीच में से खोला और वहाँ बनी हाथी की तस्वीर को टकटकी लगाकर देखने लगी। उसकी आँखें फैलती चली गई और होंठ सिकुड़ गए। उसने राहत–भरी लम्बी साँस छोड़ी। उसके लिए यह असीम खुशी से भरा खास मौका था।
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