जून 2026

देशआधे घण्टे की कीमत     Posted: April 1, 2015

वह अक्सर मेरे पास आ बैठता। कल भी आया था; लेकिन और-दिनों की तरह बोला कुछ नहीं, गुमसुम बैठ गया। मुझे अजीब तो लगा, लेकिन पहली बार ऐसा हुआ कि उसे छेड़ा नहीं। छेड़ने का मतलब था—बाढ़ के पानी की रोक को हटा देना। उसके हटते ही मेरा आधा घंटा खराब। चला रखे आर्टिकल की ऐसी-तैसी। उसकी बातचीत कूड़े के ढेर से पन्नियाँ बीनने वालों की हरकत जैसी होती थी—उलट-पलट। एक ही बात में कई मसले जोड़ देने का आदी था। मसलन—घर-परिवार के सदस्यों के बीच से छोटे-बड़े का लिहाज मिट जाना, देश के छुटभैये नेता से लेकर बड़भैये बापू तक का बेगै़रत हो उठना, अमेरिका-जैसे बड़े देश के नेताओं के बीच से इन्सानियत का उठ जाना…वग़ैरा-वग़ैरा। इनमें से वह किसी भी एक का सिरा पकड़ता और सबका रोना-पीटना उसी में समेट लेता था। उसके मुद्दों में नयापन हो न हो, गरियाने में रोचकता जरूर होती थी।
एक दिन आया तो इराक पर हमले के खिलाफ अमेरिका पर बरस पड़ा। कहा, “इन्सान की शक्ल में गिद्ध हैं साले। किसी को सुख और शान्ति से रहते देखा नहीं कि झपट पड़े।… ”
“और पाकिस्तान?” मैंने छेड़ा।
“सारा स्वाद खराब कर दिया प्रोफेसर साहब आपने…” यह सुनते ही वह बोला, “जब बड़े-बड़े गुण्डों की बात चल रही हो तो इन टुच्चों की क्या औकात। चीन हुआ, यह हुआ… ये भी कोई देश हैं साले; जिनका न कोई दीन है न ईमान!”
गरज़ यह कि चीन और पाकिस्तान से उसे ऐसी चिढ़ थी जैसी हंसराज रहबर को गाँधी से, संघियों को लाल और हरे झंडों से, वामपंथियों को खाकी निकर से तथा सम्पन्नता का स्वाद चख चुके बहुत-से दलितों को अपने ही जाति-भाइयों से।
तो हुआ यह कि कल वह आया, कुछ देर अनमना-सा बैठा और मेरी ओर से कुछ न छेड़े जाने पर उठकर चला गया। उसके जाने के बाद एक घंटा भी नहीं बीता होगा कि गली में शोर-सा सुनाई दिया। कुर्सी से उठकर मैंने खिड़की से झाँका और नीचे से गुजरते एक लड़के से पूछा, “क्या हुआ शंकर, यह शोर कैसा है?”
“वो रहमत अंकल थे न सर, ” शंकर बोला, “जो आपके पास भी आ बैठते थे…”
“हाँ, क्या हुआ उन्हें?”
“पंखे से लटककर आत्महत्या कर ली उन्होंने।” शंकर बोला, “पुलिस को एक पर्ची मिली है उनकी जेब से।”
“सुसाइट नोट?” मेरे मुँह से निकला, “कुछ पता चला, क्या लिखा है उसमें?”
“हाँ, ” शंकर ने बताया, “लिखा है—सुनने की अपनों को भी फुरसत नहीं। जीना बेकार है।”
“उफ् ।” यह सुनते ही दोनों हाथों में सिर को थामकर मैं दूसरी ओर को घूम गया और जहाँ का तहाँ फर्श पर ही बैठ गया।
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