सुबह का अखबार पढ़ते हुए एक समाचार पर रामनाथ की नजर अटक गई। सरकार ने साठ वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों के लिए हर माह पाँच सौ रुपए पेंशन देने की घोषणा की है। पढ़कर उसका दिल बाँसों उछल पड़ा। सोचा, क्यों न बहती गंगा में हाथ धो लिए जाएँ । उसने एक सप्ताह तक दाढ़ी नहीं बनाई, न नहाया, न कपड़े बदले। आठ दिन बाद टूटी–फूटी भाषा में अर्जी लिखी। अर्जी पर वार्ड पार्षद की सिफारिश जरूरी थी। रास्ते में उसने एक किलो मिठाई खरीदी। पार्षद महोदय को घोक दी। रामनाथ की तरकीब काम कर गई।
पेंशन कार्यालय में दयनीय मुद्रा बनाकर वह कतार में खड़ा हो गया। लगभग दो घण्टे बाद उसके आगे वैसाखियों के सहारे खड़े व्यक्ति का नम्बर आया। उसने अपनी अर्जी देते हुए पूछा, ‘‘ पाँच सौ रुपए के बदले कुछ काम मिलेगा क्या, बाबूजी?’’
‘‘अरे काम–वाम काहे का भैया। सरकार घर बैठे दे रही है। लो और मौज करो।’’ सुनकर वह तैश में आकर बोला, ‘‘युद्ध में टाँग जरूर कटी है, पर विकलांग नहीं हूँ।’’ कहने के साथ ही वह लाइन से अलग हो गया।
रामनाथ केा लगा कि वैसाखियों की खट–खट करती आवाज बन्दूक से निकली गोलियों की तरह उसके शरीर में घुसती जा रही है।
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जून 2026
संचयनस्वाभिमान Posted: April 1, 2015
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