वर्तमान समय में आम नागरिक को जीवनयापन के लिए भारी जद्दोजहद का सामना करना पड़ रहा है। नाटक और भारी भरकम उपन्यासों से नहीं जुड़ पाने के कारणों में यह एक महत्वपूर्ण कारण है। कहानी एक ऐसी विधा है जो डेढ़ -दो हजार शब्दों में, भाग-दौड़ की दिनचर्या वाले पाठक को मानसिक संतुष्टि दे जाती है। लेकिन रोजगार के लिए ‘बस’ और ‘लोकल’ में की जानेवाली घंटों की भीड़-भरी आवाजाही, दूरदर्शन और मोबाइल जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यम कहानी के पाठक को भी पत्र-पत्रिकाओं से दूर ले जाने लगे। तब क्या किया जाए! साहित्य की भूख कैसे मिटे? अस्सी के दशक में मराठी में ‘चारोळी’(चार-लाइनें) का चलन इसी भूख को मिटाने का एक प्रयास रहा। पॉकेट-साइज के सैकड़ों ‘चारोळी-संग्रह’ छपे और उन्होंने मुंबई की लोकल में सफर करनेवाले साहित्य-प्रेमी यात्रियों की जेब में अपनी जगह बना ली। हमारी ‘चार लाइना’ और ‘मुक्तक’ भी पाठकों को साहित्य-संतुष्टि प्रदान करने का एक प्रयास है,ऐसा कहना अनुचित न होगा।
‘लघुकथा’ यह विधा-गत नाम भले न प्राप्त हुआ हो पर लघुकथा तब से ही विद्यमान थी ,जब से कथा या कहानी अस्तित्व में है। दादी जल्दी में हों तो ‘कछुआ और खरगोश’ वाली कहानी ‘लघुकथा’ (अथवा लघुकहानी)का रूप ले लेती थी और झट समाप्त हो जाया करती थी। दादी फुर्सत में हैं और मुन्ना को नींद भी नहीं आ रही है तो दादी की सर्जना- शक्ति सक्रिय होकर उसी कहानी को इतना लंबाती थी कि उसकी अगली किश्त अगले दिन सुननी पड़ती थी। विस्तार देने के लिए कछुआ और खरगोश की दौड़ में आनेवाली बाधाएं यथा; बारिश, रास्ते में पड़नेवाला दरिया, नदी, रास्ता रोककर अपना भक्ष्य बनाने को तत्पर भेड़िया आदि -यह सब दादी की कल्पना शक्ति पर निर्भर करता था। सत्तर के दशक तक पत्र-पत्रिकाओं में कहानी, लंबी कहानियों की भरमार हुआ करती थीं। लघुकथा ‘कहानीकार’ या ‘तारिका’ समान किसी पत्रिका के पृष्ठ पर यदा-कदा नजर आ जाया करतीं। लेकिन अस्सी का दशक आरंभ होते ही लघुकथा ने पूरे जोशोखरोश के साथ साहित्यिक पटल पर अपना स्थान बनाना शुरू किया। अखबारों के साप्ताहिक परिशिष्ट, पत्रिकाओं के नियमित अंकों में लघुकथाएँ ‘फीलर’ के रूप में नहीं अपितु साहित्य की सम्मानित विधा के रूप में स्थान पाने लगीं। सारिका, तारिका, दीपशिखा, साहित्य निर्झर आदि पत्रिकाओं के लघुकथा-विशेषांक प्रकाशित हुए और दशक की समाप्ति तक अनेक लघुकथाकारों के संग्रह भी निकले। इस प्रकार लघुकथा ने साहित्य-जगत में अपना स्थान मुकम्मल कर लिया।
लघुकथा के तत्त्व, उसका स्वरूप परिभाषित किया गया जिसका सार- संक्षेप यही कि लघुकथा है तो कथा ही, पर उसका स्वरूप लघु हो। उसमें कथानक को ‘कहानी’ बनानेवाला विस्तार न हो। ऊपर ‘नानी की कहानी’ में उल्लिखित बाधाएं, उनका वर्णन, पात्रों द्वारा उनका निराकरण आदि विस्तार की गुंजायश नहीं होती लघुकथा में पर कथानक तो होता ही है। बल्कि लघुकथा में कथानक तेजी से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता है और पाठक को एक सम्पूर्ण कहानी पढ़ने की संतुष्टि दे जाता है। अधिक स्पष्ट करना हो तो मैं यह कहना चाहूंगा कि कहानी अगर तलवार है तो लघुकथा खंजर है। खंजर में तलवार के सारे तत्त्व मौजूद होते हैं, सिवा आकार के।
मैं पिछले पचास वर्षों से लघुकथाएँ पढ़ रहा हूँ ,अर्थात मेरा लेखन आरंभ नहीं हुआ था, तब से । नई पत्र-पत्रिका आयी कि सबसे पहले उसमें लघुकथा खोजता था। समयाभाव तो एक कारण था ही पर लघुकथा के प्रति आकर्षण का एक और महत्त्वपूर्ण कारण था। कम शब्दों में एक संपूर्ण रचना पढ़ने का समाधान ।
पढ़ी हुई सैंकड़ों लघुकथाओं में से किन्हीं दो का उल्लेख करने की बात आई तो सबसे पहले याद आई, खलील जिब्रान की (सुकेश साहनी द्वारा अनूदित) लघुकथा ‘पवित्र नगर’ यह एक बेहतरीन लघुकथा है। नपे -तुले शब्दों में, पात्रों के संवाद के माध्यम से, प्रभावशाली ढंग से लेखक ने लघुकथा को अंजाम दिया है। नोट करने लायक बात यह है कि अगला एकेक वाक्य कहानी की नई परत खोलता जाता है। शहर के सारे निवासियों के केवल एक आंख और एक हाथ थे। निवासी धर्मग्रंथों का पालन करने वाले। शहर के एक स्थान पर लगे हुए शिलालेख के अनुसार दाहिनी आँख अपराध करे तो उसे बाहर निकाल फेंको क्योंकि जीते जी सशरीर नरक झेलने से बेहतर है कि एक अंग नष्ट हो जाए। यदि दाहिना हाथ अपराध करे तो उसे काटकर अलग कर दो। सारे शहरवासियों के एक हाथ और एक आंख से वंचित होने का अर्थ है, शहर के किसी भी व्यक्ति का पवित्र न होना। बच्चे चूँकि शिलालेख को पढ़कर समझ नहीं सकते इस कारण उनकी दोनों आंखें और हाथ सलामत हैं। बच्चे अबोध होते हैं। यह भी हो सकता है कि उन्होंने कोई अपराध न किया हो ! पर यह कहने की बजाए लेखक का यह कहना कि ‘वे अभी इस शिलालेख को पढ़ और समझ नहीं सकते’ से स्पष्ट होता है कि वे भी निरपराध नहीं हैं। कहानी के अंत में ‘मैं तुरंत ही उस पवित्र नगर से निकल भागा’, यह प्रतिपादित करने के लिए काफी है कि ऐसा कोई नहीं है जिसने अपराध न किया हो। और ऐसे लोग जहाँ रहते हैं उस शहर को लेखक ने नाम दिया है, ‘पवित्र नगर !’
दूसरी लघुकथा है, बलराम अग्रवाल की ‘नागपूजा’। यह लघुकथा मैंने आज से कोई तीस वर्ष पूर्व पढ़ी थी। मोहन अनंत सागर के संपादन में एक लघुकथा संग्रह निकला था, ‘यथार्थ’, उसमें। बलराम अग्रवाल यशस्वी लघुकथाकार तथा लघुकथा-समीक्षक हैं। लघुकथा को संपूर्ण विधा के रूप में स्थापित करने के लिए जिन रचनाकारों का योगदान रहा है, उनमें वे महत्त्वपूर्ण हैं। ‘नागपूजा’ में ‘सेक्रेटरी’ को वासना का शिकार बनाने के लिए लालायित ‘साहब’ पर जबरदस्त कटाक्ष किया गया है। सेक्रेटरी अनूठा तरीका अपनाती है। वह क्रिश्चियन है। पड़ोस के हिंदू परिवार से उसे नागपंचमी पर नागपूजा के प्रभाव की जानकारी मिलती है। वह साहब को ग्लास भर दूध पिलाकर कहती है, ‘आज का दिन अगर नाग दूध एक्सेप्ट कर लेता है तो साल भर के लिए उसके डसने का डेंजर खत्म हो जाता है।’ साहब ने दूध पी लिया है। ‘यू एक्सेप्टेड द मिल्क …थैंक यू। हमको पूरा साल के लिए रोज-रोज का वरी से फ्री कर दिया।’
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पवित्र नगर
मैं यह देखकर हैरान रह गया कि नगर के सब निवासियों के केवल एक हाथ और एक आँख थी। मैंने मन ही मन में कहा, ‘पवित्र नगर के नागरिक …एक हाथ और एक आँख वाले ?’
मैंने देखा, वे भी आश्चर्य में डूबे हुए थे और मेरे दो हाथ, दो आँखों को किसी अजूबे की तरह देखे जा रहे थे। जब वे मेरे बारे में आपस में बातचीत कर रहे थे तो मैंने पूछा, ‘‘क्या यह वही पवित्र नगर है जहाँ के निवासी धर्मग्रंथों का अक्षरश: पालन करते हुए जीवन व्यतीत करते हैं?’’
उन्होंने कहा, ‘‘हाँ , यह वही शहर है।’’
मैंने पूछा, ‘‘तुम लोगों की यह दशा कैसे हुई। तुम लोगों के दाहिने हाथ और दाहिनी आँख को क्या हुआ?”
वे सब एक दिशा में बढ़ते हुए बोले, आओ…खुद ही देख लो।’’
वे मुझे नगर के बीचों-बीच स्थित मंदिर में ले गए, जहाँ हाथों और आँखों का ढेर लगा हुआ था। वे कटे हुए अंग निस्तेज और सूखे हुए थे।
मैंने कहा, ‘‘किस निर्दयी ने तुम्हारे साथ ऐसा सलूक किया है?”
सुनकर वे सब आपस में फुसफुसाने लगे और उनमें से एक बूढ़े आदमी ने आगे बढ़कर कहा, ‘‘यह हमने खुद ही किया है। ईश्वर के आदेश पर ही हमने अपने भीतर की बुराइयों पर विजय पाई है।’’
वह मुझे एक ऊँचे स्थान पर ले गया। बाकी लोग भी पीछे हो लिए। वहाँ एक शिलालेख गड़ा हुआ था, मैंने पढ़ा-
‘‘अगर तुम्हारी दाहिनी आंख अपराध करें, तो उसे बाहर निकाल फेंको; क्योंकि जीते जी सशरीर नरक झेलने से बेहतर है कि एक अंग नष्ट हो जाए। यदि तुम्हारा दाहिना हाथ अपराध करे, तो उसे तत्काल काट फेंको क्योंकि इससे पूरा शरीर नरक में नहीं जाएगा।’’
मै सब कुछ समझ गया । मैंने उनसे पूछा, क्या तुम लोगों में कोई भी ऐसा नहीं जिसके दो हाथ और दो आंखें हों?’’
वे बोले, ‘‘कोई नहीं। केवल कुछ बच्चे हैं जो अभी इस शिलालेख को पढ़ और समझ सकते हैं।’’
जब हम उस मंदिर से बाहर आ गए तो मैं तुरंत ही उस पवित्र नगर से निकल भागा; क्योंकि मैं कोई बच्चा नहीं था और उस शिलालेख को अच्छी तरह पढ़ सकता था।
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नागपूजा
‘‘अ रे! ये…ये किस खुशी में भई?’’ सीट पर बैठते ही मेज पर एकदम उनके सामने सेक्रेटरी ने गर्मागर्म दूध भरा गिलास रखा तो वे आश्चर्य चकित होकर पूछ बैठे। वे समझ गए कि उनकी बगलगीर न होने की स्थिति में उसकी जगह नई ‘सेक्रेटरी’ रख लेने की कल शाम की उनकी धमकी तेज असरदार सिद्ध हुई।
अन्य दिनों के विपरीत लड़की ने ‘मिनी- स्कर्ट’ के स्थान पर सुर्ख चौड़े बार्डरवाली लकदक सफेद साड़ी पहन रखी थी और बेहद खूबसूरत लग रही थी। नीची निगाहें करके दुग्ध-प्रस्तुति के माध्यम से काम-समर्पण के उसके सटीक संकेत को उन्होंने भाँपा और पुलककर गटा-गट सारा दूध चढ़ा गये।
‘‘हमारे पड़ोस में एक हिंदू-फैमिली रहता सर।’’ इस बीच उस क्रिश्चियन युवती ने उसकी मेज पर रोली-चावल युक्त एक प्लेट रखी और साड़ी के पल्लू से बाकायदा अपना सिर ढांपकर अनामिका और अंगूठे की सहायता से साहब की ओर रोली के छींटे उछालती हुई बोली – ‘सवेरे उसने हमको बताया कि आज नाग- पंचमी है। आज का दिन सही प्रोसेस से नाग को पूजते और दूध पिलाते हैं, सर। यदि वह दूध को एक्सेप्ट कर लेता है तो पूरा साल उसके द्वारा डसने का ‘डेंजर’ खत्म हो जाता है।’’ तत्पश्चात वह बेहद सादगी से हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी और बोली- ‘‘यू एक्सेप्टेड द मिल्क सर, थैंक यू। पूरा साल के लिए रोज-रोज का वरी से फ्री कर दिया हमको। नेक्स्ट ईयर आपकी भरपेट सेवा करेगा हम।’’
साहब ने अपने माथे पर चू आए पसीने को पोंछने के लिए जेब से रूमाल निकाला ; लेकिन उस पवित्र लड़की की आंखों में छलक आए आँसुओं को वह देख न पाए।