1-एंटी वायरस
“मैम आपको स्टेशन तक छोड़ दूँ? वो अपनी मनपसंद दोस्त और कॅलीग से बोला”-“रोज छोड़ता हूँ, आदत हो गई है, मुझे परेशानी नहीं होती।आपकी लोकल जाने के बाद, मैं पैदल इसी रास्ते रूम पर निकल जाऊँगा मैम।”
“नहीं,आज रहने दो, खुद ही चली जाऊँगी। आज भी कंम्प्यूटर पर काम करते हुए देर हो गई। वोही कल वाला वक्त ही हो गया।”
दोनों के बीच कुछ देर चुप्पी छाई रही। आज पुनः उसने कॉफी साथ पीने का आग्रह किया।
“कॉफी कब पिएँगे साथ मैम, रोज देर हो जाती है।”
“देखेंगे जब रिलैक्स्ड होंगे, तब साथ बैठेंगे ।” मैडम फिर टाल गईं थीं। वो अपनी फाइलें और डेटा बचाने की चिंता करतीं। आजकल कब अनजान वायरस कंप्यूटर पर अटैककर सब फाइलें उड़ा दे -।
“अब सिक्स मंथ हो गए रोज आते-आते। नौकरी अच्छी है और पेमेंट भी। मैं छोडूँगा नहीं, हरगिज नहीं।
क्या?”
“ये-जॉब – मैम ।” वो कुछ हकला सा गया।
“मुझे भी ये जॉब रास आ गया है ।”
फिर रुककर मैम का स्वर-“पर अब मुझे डर नहीं लगता।।”
मैडम की नजरें नीचे झुकी हुई थीं।
“मैम! किससे डर,कैसा डर?” वो पूछ ही बैठा।
“तुमसे, बिल्कुल डर नहीं लगता अब ।”
हमउम्र मैम की आँखों में लाल डोरों के साथ ‘एंटी वायरस’ भी काम करने लगा था। अब वे दो कदम पीछे हटकर कम्प्यूटर के मापदंडों पर लड़के को कस रहीं थीं। अपने डेटा और फाइलों उन्होंने बड़ी खूबी से बचा लिया था।
-0-
2-क्रेजी
“सुनो! अपना अखिल बेटा मनपसंद लड़की से शादी करना चाह रहा है। यानी प्रेम करता है उससे तो लव मैरिज हीं करेगा न ।”
“कहाँ मिला वो उससे? “पति ने पत्नी से पूछगछ शुरू कर दी।
“उसने बताया है सब। एफ- बी- , अरे वही फेसबुक पर ।पहली बार में ही दोनों एक दूसरे को लाइक करने लगे थे। ।”
पति ने कटाक्ष किया –“गहरे- दोस्त? बिना देखे, जाने?”
“अपना बेटा उसे पिछले सात महीनों से जानता है। दोनों को एक दूसरे से प्यार हो गया है। अब वे गहरे दोस्त – ।”
“अच्छा –आ!” अचरज में पड़े पापा का स्वर। रिटायर्ड पापा का स्वर अविश्वास से भरा था।
“जब बेटा खुुश है,तो हम भी खुश । आखिर हमें उसी के साथ रहना है ।” उन दोनों ने खुद को बेटे के साथ एडजस्ट करने की ठान ली थी।
बस बेटे की उदासी वे नहीं देख सकते थे। शादी तो करनी ही थी।
वो सुबह ही पहुँच गई थी। किसी होटल में ठहरी थी। आज सारा दिन बेटा अपनी आभासी दुनिया की प्यारी दोस्त-प्रेमिका अब मंगेतर, के साथ शहर के तमाम मॉलों में घूमता रहा दोनों ने मूवी देखीी, लंच किया, शॉपिंग की और-ढेर सारी बातें। पर वो शाम को जब लौटा तो न जाने क्यों कुछ ऑफ मूड में था। घंटे भर बाद उसने स्वयं ही चुप्पी तोड़ी।
“माँ! वो वैसी नहीं,जैसा अब तक पेश आती रही ।”
“तुझे कैसे पता? इतनी जल्दी किसी को जज नहीं कर सकते। वक्त लगता है बेटा।”
“पापा! वो सिर्फ अपने लिए ही सोचती है ।”
अभी भी, रात-दिन फेसबुक पर हीं चैटिंग करती रही, उसका मानना है कि ‘एफबी’ का परिवार ही उसका असली परिवार है। वो क्रेजी है माँ, अपने आभासी जगत के दोस्तों के लिए _इसलिए मेरे लिए भी वो हमेशा ऑन लाइन रहती — पहले तो मैं समझा था मेरे कारण -अब पता चला उसे नशा था,सोशल साइट पर सारे दिन व रात भर चैटिंग करने का। माँ! वो बीमार –कई युवाओं की तरह। बेटा ठगे जाने से सदमें में था।
उसे भी काउंसलिंग की जरूरत– ।”
माँ मन में मुस्कुरा दी-चलो जान बची और–। अगले दिन से एक सुकन्या की तलाश पुनः शुरू करना जो था!
-0-
3-पहली बारिश
पड़ोसी युगल को बारिश में भीगते-हँसते देऽ अपने कमरे की खिड़की के सहारे बैठी रेणु की सास मुँह ही मुँह में उन्हें बेशर्म, बेहया वगैरा न जाने क्या-क्या कहे जा रही थीं। घर के बरामदे में सुधांशु के साथ बैठी रेणु दूर से ही उस पड़ोसी युगल की मस्त जिंदगी का आनंद ले रही थी।
तभी गुड़िया ने ठुनकते हुए आकर मम्मी के कान में कुछ कहा।
पापा से पूछो। रेणु ने धीरे से जवाब दिया। यह सुनकर गुड़िया दोनों पैरों पर जोरों से ठुनक दी। कहा किसी से कुछ नहीं।
“सुनो, गुड़िया बारिश में नहाने को पूछ रही है। ठुनक के माध्यम से जाहिर होती उसकी मंशा भाँपकर रेणु ने पति से विनती-सी की ।”
“जाने दो, उसकी बात सुन सुधांशु ने तुरंत कहा,बारिश का थोड़ा आनंद उसे भी ले लेने दो ।”
पापा की सहमति पाते ही गुड़िया बरामदे के पार जा पहुँची।
इतने में, शायद सुधांशु की आवाज सुन, अपने कमरे से उठकर अम्मा वहाँ आ खड़ी हुईं। फटकार सुनाती हुई बोलीं, “पहली बारिश है,बीमार पड़ जाओगी। सर्दी लगेगी, सो अलग। कॉपी-किताब निकाल लो और यहीं बैठकर नजारा लो बारिश का। चलो भीतर– ।”
लेकिन, कौन सुनता? गुड़िया तो हो गई-फुर्र! मस्त होने लगी बारिश में।
आखि़र सुधांशु बोले, “जाओ रेणु! लिवा लाओ। रेणु का मन-मयूर नाच उठा यह सुनते ही। वह पल्लू सँभालती जा कूदी बारिश की फुहारों में। भीगती हुई बेटी को पकड़ने का हो गया नाटक शुरू। बेटी तो थी ही खेलने के मूड में, वो और दूर भाग गई।
“मैं लाता हूँ अम्मा”, यह देख सुधांशु ने कुर्सी से उठते हुए कहा और अम्मा का उत्तर सुने बगैर बरामदे से उतर नीचे की ओर दौड़ गए।
काफी देर तक बेटी अपने ममी-पापा को दौड़ा-दौड़ाकर छकाती रही। बेटे-बहू की चालाकी समझ, अम्मा दो पल वहीं ऽड़ी उन सब को देखती रहीं। पड़ोसी युगल की मस्ती को देखने से उपज रही कुछ देर पहले की बुदबुदाहट अब हल्की-सी मुस्कान में तब्दील हो चुकी थी। खिड़की का पर्दा एक ओर को सरकाकर वे तेजी से किचन की ओर मुड़ गईं–सब के लिए मसाला चाय बनाने और पकौड़ियाँ तलने को।
-0-
4-रिश्ता
श्रावन की पूनो आने में अभी वक्त था।सकीना आपा का पूरा परिवार रािऽयाँ बनाने में जुटा था। हमारे छोटे शहर में उसकी बनाई खूबसूरत राखियाँ खूब धूम मचातीं। हमेशा की तरह इस बार भी काफी बड़ा ऑडर मिला था। हालाँकि बाजार में प्रतिस्पर्धा कम न थी।
सकीना आपा बुखार से निढाल थीं। हालत बिगड़ी तो अस्पताल में जाँच के बाद भर्ती होना पड़ा। उन्हें खून चढ़ रहा था। डॉक्टर का कहना था कि जब तक प्लेटलेट्स सामान्य नहीं आ जाते उन्हें छुट्टी नहीं मिलेगी।अली मुंबई पढ़ने चला गया वर्ना वो सारी भाग-दौड़ कर लेता। सबके हाथ-पाँव फूल गए। ऐसे आड़े वत्तफ़ में बड़ी फूफी और उनकी बेटियाँ आगे आईं। दिन-रात एक करके ,कर्मठ अँगुलियाँ , मनमोहक स्नेहसूत्र बनाने के काम में जुटी हुई थीं। सकीना आपा की सकुशल घर लौट आने की खुशी दोगुनी हो गई, जब फूफी ने गले लगाके राखियों का ऑर्डर पूरा कर लेने की सुखद ख़बर सुनाई।
लक्ष्मी स्टोर वाले अपना ऑडर उठाने आ पहुँचे थे। सकीना आपा ने देरी के लिए माफी माँगते हुए पहली राखीी उसकी कलाई पर बाँध दी। तभी मोबाइल बज उठा।
अली का फोन था। सकीना आपा बिस्तर पे बैठ गईं और मोबाइल कान से सटा अली को इधर के हाल बताने लगीं।
“मैं ठीक हूँ, राखियों का ऑर्डर फूफी ने पूरा किया, ख़ु़दा की रहमत – ।”
“तुझे कमरा मिला?”
अभी दोस्तों के साथ कमरा शेयर कर रहा हूँ,अम्मी! मेरा नाम ही परेशानी का सबब –। वर्ना अब तक इतनी मुसीबत-कोई बात नहीं,मिलकर इकट्ठे रह लेंगे। राकेश के कमरे में चार लड़के रह रहे हैं, मैं भी शिफ्रट हो गया हूँ। फिक्र न करें, अपनी सेहत सँभालें अम्मी- ।”
सकीना दुपट्टे से आँखें पोंछने लगी तो राखियों के डिब्बों को थैलों में सजाते हुए लक्ष्मी स्टोर वाले के बेटे ने सवालों-भरी निगाहों से आपा को देखा।
वे बोल पड़ीं -बीमारी की कमजोरी से आँखें बार-बार पनिया रहीं हैं मेरी -।
-0-