दिनांक 06.10.2019,
हरियाणा प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन, सिरसा द्वारा संचालित हरियाणा प्रादेशिक लघुकथा मंच सिरसा) के तत्वावधान में श्री युवक साहित्य सदन में चौथा अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें देशभर से विभिन्न प्रदेशों यथा पंजाब, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा के विभिन्न जिलों से व स्थानीय 80 से अधिक लघुकथाकारों, समीक्षकों, सम्पादकों ने भागीदारी की। कार्यक्रम चार सत्रों में सम्पन्न हुआ। प्रथम सत्र लोकार्पण व सम्मान समारोह का था। इस सत्र में पूर्व आबकारी एवं कराधान आयुक्त, हरियाणा, लाजपतराय गर्ग ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता राजकीय नेशनल स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सिरसा के पूर्व प्राचार्य डॉ. प्रेम काम्बोज ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, रानियां के पूर्व प्राचार्य पवनकुमार गुप्ता उपस्थित थे। समारोह का शुभारम्भ मंचासीन अथितियों द्वारा माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन व माल्यार्पण से हुआ। कुछ दिन पहले हृदय विदारक दुर्घटना में लघुकथा के दिग्गज हस्ताक्षर श्री रामकुमार आत्रेय जी हमसे बिछुड़ गए थे। लघुकथा जगत को इससे भारी क्षति हुई। उन्हें व अन्य दिवंगत लघुकथाकारों की स्मृति में दो मिनट का मौन रखते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की गई। हरियाणा प्रादेशिक लघुकथा मंच मुख्य संयोजक प्रो. रूप देवगुण ने दूर-दराज से पधारे अतिथियों का भावभीना स्वागत करते हुए इस मंच के गठन व उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मंच का एक मात्र भाव लघुकथा के विकास और संवर्द्धन का सतत प्रयास करना है। तत्पश्चात हरियाणा प्रादेशिक लघुकथा मंच क प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए डॉ.शील कौशिक ने वर्ष भर में की गई गतिविधियों पर संतोष व्यक्त किया इस वर्ष 20 गोष्ठियाँ आयोजित की गई। इन गोष्ठियों की विशेषता यह रही कि लघुकथा पाठ के अंतर्गत लघुकथाकारों द्वारा अपनी-अपनी लघुकथाओं के पाठ के अतिरिक्त सुस्थापित व प्रतिष्ठित लघुकथाकारों की लघुकथाओं का भी पाठ किया गया। लघुकथाओं की पुस्तकों का लोकार्पण व विद्वतजनों व लघुकथा मनीषियों द्वारा चर्चा-परिचर्चा व विभिन्न विषयों पर आलेख पढ़े गये। इसके अतिरिक्त स्कूल के बच्चों द्वारा कुछ चुनिंदा लघुकथाकारों की लघुकथाओं का पाठ किया। लोकार्पण कार्यक्रम में निम्नलिखित लघुकथाकारों ने लघुकथा साहित्य की समृद्धि में अपना रचनात्मक अवदान देते हुए पुस्तकों का प्रणयन किया, जिनमें सामाजिक उत्थान की लघुकथाएँ (डॉ. मधुकांत), लघुकथा सप्तक-2 (सं. डॉ. रामकुमार घोटड़), मेरी चुनिन्दा लघुकथाएँ (प्रो रूप देवगुण), लघुकथा रचना- (सं.योगराज प्रभाकर), मेरी चुनिन्दा लघुकथाएँ (डॉ. शील कौशिक), गांधारी नहीं हूँ मैं (डॉ. लता अग्रवाल), लघुकथा मंजूषा (सं. प्रो रूप देवगुण, ज्ञानप्रकाश ‘पीयूष’, लाजपतराय गर्ग, संयोजक : विजय विभोर), लघुकथा सप्तक-3 (सं. डॉ. रामकुमार घोटड़), पल-पल बदलती जिन्दगी (निरंजन बोहा, अनुवादक योगराज प्रभाकर) तथा फिर वही पहली रात (विजय विभोर) पुस्तकों का मंचासीन अथितियों द्वारा विमोचन हुआ।
लघुकथाकारों की उपलब्धियों व लघुकथा के लिए किए गए कार्यों के आधार पर सम्मान समारोह में तीन तरह के सम्मान प्रदान किये गये। श्यामसुन्दर दीप्ति को श्री खुशीराम देवगुण स्मृति लघुकथा साहित्य, सारस्वत सम्मान (सौजन्य: श्रीमती इंदु देवगुण व प्रो. रूप देवगुण), डॉ. मधुकांत को मातुश्री विद्यादेवी स्मृति लघुकथा साहित्य, सारस्वत सम्मान ( सौजन्य: डॉ.राजकुमार निजात), डॉ. लता अग्रवाल को श्रीमती महादेवी कौशिक स्मृति लघुकथा साहित्य, सारस्वत सम्मान ( सौजन्य: डॉ.शील कौशिक व डॉ.मेजर शक्तिराज कौशिक), डॉ. प्रद्युम्न भल्ला को मातुश्री विद्यादेवी लघुकथा साहित्य, सारस्वत सम्मान (सौजन्य: डॉ.राजकुमार निजात) । प्रो शामलाल कौशल, सत्यप्रकाश भारद्वाज, डॉ. नीरज ‘सुधांशु’, निरंजन बोहा, त्रिलोक सिंह ठकुरेला, लज्जाराम राघव ‘तरुण’ को ‘लघुकथा सेवी सम्मान’ तथा डॉ. अशोककुमार मंगलेश को लघुकथा ‘मंच सहयोग सम्मान’ से सम्मानित किया गया। इस सत्र के अंत में सभी सम्मानितों का मंचासीन अथितियों के साथ एक सामूहिक छाया चित्र लिया गया। प्रथम सत्र का सफल मंच संचालन हरीश सेठी ‘झिलमिल’व डॉ.आरती बंसल ने किया।
द्वितीय सत्र था लघुकथा विमर्श का, जिसमें अध्यक्ष मंडल में सम्मिलित रहे लघुकथा के वरिष्ठ हस्ताक्षर डॉ. श्यामसुंदर दीप्ति, डॉ.मधुकांत, डॉ. रामकुमार घोटड़, योगराज प्रभाकर व मुख्य संयोजक प्रो. रूप देवगुण। इस सत्र का मंच संचालन करते हुए डॉ.शील कौशिक ने विमोचित हुई पुस्तकों के रचयिताओं व सम्पादकों को अपने रचनात्मक अवदान से लघुकथा साहित्य को समृद्ध करने के लिए बधाई प्रेषित की। डॉ. रामकुमार घोटड़ ने ‘आधुनिक हिन्दी लघुकथा: वर्तमान परिप्रेक्ष्य में’ विषय पर विचार प्रस्तुत किए। डॉ. लता अग्रवाल ने ‘लघुकथा में लघुता का महत्व’ पर , डॉ. नीरज सुधांशु ने ‘लघुकथा में नवीन विषयों की आवश्यकता’ विषय पर विचार प्रस्तुत किए। विमर्श-सत्र की अध्यक्षता कर रहे डॉ.श्यामसुंदर दीप्ति जी ने तीनों विषयों पर समग्रता से अपना वक्तव्य दिया। आधुनिक हिन्दी लघुकथा: वर्तमान परिप्रेक्ष्य में के सन्दर्भ में उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर आजकल जो लघुकथाएँ प्रस्तुत हो रही हैं वे केवल तुरत-फुरत लिखी गई हैं और झूठी वाह-वाही का शिकार हो रही हैं। उन्हें लघुकथा के विकास और आवश्यक मानदंडों को पढ़ना चाहिए। ‘लघुकथा में लघुता का महत्व’ के बारे ये कतई आवश्यक नहीं कि लघुकथा अधिक छोटी है तो ही अच्छी होगी। मैंने अब तक जितनी भी अच्छी लघुकथाएँ पढ़ी हैं ,उनमें से अधिकतर 400-450 शब्दों की हैं। लघुता को बहुत अधिक अहमियत देने की आवश्यकता नहीं क्योंकि लघुकथा का कथानक स्वयं अपना आकार तय कर लेता है। ‘लघुकथा में नवीन विषयों की आवश्यकता’ पर बोलते हुए उनका मत था कि यह सत्य है कि हम नये विषयों को लघुकथा में नहीं ला पा रहे हैं। यह अत्यधिक कठिन है। जब तक हम मनोविज्ञान व समाज विज्ञान को वर्तमान सन्दर्भ में भलीभांति नहीं समझ पाते तब तक नये विषयों पर लिखना सम्भव नहीं। इसके लिए हमें नई-नई जानकारियाँ जुटानी होगी, पढ़ने का दायरा बढ़ाना होगा।
द्वितीय सत्र के द्वितीय भाग में
सर्वश्री बलवीर वर्मा, राकेशकुमार जैनबन्धु, डॉ.शन्नो देवी , प्रो. शामलाल कौशल, डॉ.मधुकांत, विजय विभोर, लखविंदरसिंह बाजवा, सुभाष सलूजा, प्रि. ज्ञानप्रकाश ‘पीयूष’, जनकराज शर्मा, रचना भल्ला, सुरजीतसिंह सिरड़ी, विरेन्द्रसिंह भाटिया, ममता शर्मा, सुरेश बरनवाल व डॉ.रामकुमार घोटड़ ने अपनी-अपनी लघुकथाओं का पाठ
किया। इस सत्र के समीक्षक थे श्री रवि प्रभाकर जिन्होंने पढ़ी गई तीन-तीन लघुकथाओं
पर बारी-बारी से अपने विचार रखे व विस्तृत चर्चा की। अंत में डॉ.शील कौशिक ने सभी
का सहयोग बनाए रखने के लिए आभार व्यक्त किया। इस सत्र का सफल मंच संचालन डॉ.शील
कौशिक ने किया।
तृतीय सत्र सत्र स्थानीय जनता भवन,
सिरसा में आयोजित किया
गया। सर्वश्री/श्रीमती उषा सेठी, डॉ.श्यामसुन्दर दीप्ति, डॉ.मेजर शक्तिराज, प्रो.हरभगवान चावला, डॉ.लता अग्रवाल, डॉ.राजकुमार निजात, जगदीशराय कुलरियां, डॉ. नीरज सुधांशु, डॉ. नायबसिंह मंडेर,
योगराज प्रभाकर व प्रो.
रूप देवगुण ने इस सत्र में अपनी-अपनी लघुकथाओं का पाठ किया तत्पश्चात श्री निरंजन
बोहा ने पढ़ी गई लघुकथाओं की विस्तृत समीक्षा की। उन्होंने कहा कि हिन्दी लघुकथा
मानवीय मन के उतार-चढ़ाव का अति सूक्ष्म और लघु क्षणों को पकड़ कर सफलता से कलात्मक
अभिव्यक्ति कर पा रही है। चतुर्थ सत्र में लघुकथा पाठ किया -कृष्ण कायत, त्रिलोकसिंह ठकुरेला, प्रि. आर.पी. सेठी ‘कमाल’, सत्यप्रकाश भारद्वाज, लज्जाराम राघव ‘तरुण’, डॉ.आरती बंसल, हरीश सेठी ‘झिलमिल’, लाजपतराय गर्ग, निरंजन बोहा, दिलबागसिंह विर्क व डॉ. शील कौशिक ने। डॉ. नायबसिंह मंडेर ने एक-एक लघुकथा पर विस्तृत विचार रहे और संतोष प्रकट किया कि
वास्तव में हरियाणा प्रादेशिक लघुकथा मंच के प्रयास फलीभूत हो रहे हैं।
प्रो. रूप देवगुण
संयोजक: डॉ.शील कौशिक