जून 2026

देशहार!     Posted: May 1, 2015

पत्नी के गले में बेशकीमती स्वर्ण–हार देख, उनका ध्यान बरबस खिंच गया था। होंठ खुले के खुले रह गये थे। जिह्वा तालु से चिपक गई थी।
अपने अफसर पति की मनोदशा देख, पत्नी ने खुद बताया – अजी दीपावली थी न, उपहारों में आ गया है।
सच्चे मोतियों का हार और उपहार ?
आप दफ्तर निकले थे कि नेतानुमा एक शख्स आया। उसने अपने सूटकेस से उपहार निकाला और मुझे पकड़ा दिया।
पत्नी का हाथ हार पर था और आँखें पति के उद्विग्न चेहरे पर टिकी थीं।
लेकिन…………?
अजी एक कागज भी निकला था, हार के साथ। मैंने तो उसे खोला तक नहीं। आप ही पढ़ लें। उसने अलमारी से लिफाफा निकाला और पति की ओर बढ़ा दिया था।
कागज पढ़ते आला अफसर चिंता, क्षोम और लोभ की त्रिवेणी में उतरते चले गए थे।
कागज में उस हिस्ट्रीशीटर को बचाने की पेशकश थी, जिसने एक अबोध बालिका के साथ बलात्कार कर उसका गला दबा दिया था।
पत्नी अपने पति की ज्वार–भाटा होती भाव -भंगिमा देखकर डर -सी गई।
पच्चीस बरस की नौकरी हो गई इनकी, रिश्वत को सरकफाँसी मानते हैं।
सहमी आवाज में वह कहने लगी – अजी नियाव–अनिवाय (न्याय–अन्याय) की बात हो, तो निकाल पटकती हूँ। आएगा, छाती में मार दूँगी, उसके।
कागज जेब में रखते हुए आला अफसर ने होंठों पर जीभ फेरी और थूक निगल गये थे।
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