जून 2026

पुस्तकसंवेदनाओं से भिगोती लघुकथाएँ     Posted: May 1, 2020

सुपरिचित संवेदनशील लघुकथाकार डॉ. वसुधा गाडगिल और अंतरा करवड़े ने लघुकथा विधा में एक नवीन प्रयोग किया है। इन दोनों रचनाकारों का जल तत्व पर आधारित सूक्ष्म संवेदनाओं की अभिव्यक्ति के प्रवाह का एक अनूठा लघुकथा संग्रह ‘धारा’ रश्मि प्रकाशन, लखनऊ से प्रकाशित होकर आया है।  ‘धारा’ लघुकथा क्षेत्र में नये प्रयोग समेटे, मानवीय मूल्यों को समर्पित एक जीवन्त एवं सार्थक कृति है। इस लघुकथा संग्रह की रचनाओं में नदी, सागर, तालाब, झील, नहर, धारा, प्रवाह, जैसे अनेक शब्द जल से संबंधित हैं, इन शब्दों के भावों को वसुधा जी और अंतरा जी ने नवीन आयाम देने का प्रयास किया है जो पाठकों के भीतर नए चिंतन, नई दृष्टि की चमक पैदा करते हैं। दोनों रचनाकारों का प्रकृति प्रेम बहुत गहरा है। जीवन की विविध मार्मिक घटनाओं पर दोनों रचनाकारों की बारीक दृष्टि काबिलेतारीफ है। इस संग्रह में मानवीय संवेदनाओं को चित्रित करती मर्मस्पर्शी, प्रतीकात्मक भावुक लघुकथाएँ हैं। इस संग्रह की रचनाओं में पात्रों के मन की गाँठे बहुत ही सहज और स्वाभाविक रूप से खुलती हैं। इस लघुकथा संग्रह की भूमिका वरिष्ठ साहित्यकार श्री ब्रजेश कानूनगो ने लिखी है। उन्होंने लिखा हैं ‘ साहित्य संवेदनाओं का प्रतिफल होता है। प्रेम, करुणा, आनन्द, दु:ख कैसी कई भावनाएँ साहित्य में प्रवाहित होती रहती हैं। कई बार पढ़ते हुए हमारा मन भर आता है। कंठ रुँध जाता है। आँखों में नीर बहाने लगता है। आब से ही जीवन में आब है। कहा भी गया है, जल ही जीवन है। बिन पानी सब सून। यही कारण रहा होगा कि वसुधा गाडगिल और अंतरा करवड़े जैसी संवेदनशील लघुकथाकारों ने सबसे पहले ‘जल तत्व: पर कलम चलाने का विचार किया होगा। ‘धारा’ में प्रवाहित भावनाओं का जल निश्चित ही पाठकों के हृदय को भिगो देने ने सफल होगा।’

वसुधा जी ने विशाखा के मन की अनकही उथल-पुथल को शब्दों के सूत्र में सुंदरता से पिरोया है इस संग्रह की लघुकथा ‘फुहार’ में। अंतरा जी लघुकथा ‘फुहार’ में पूजा एक वृद्धा के स्नेह और ममता की फुहार से सरोबार हो जाती है। अपनों से विस्थापित होने का दर्द और रिश्तों की वही आर्द्रता को बयाँ करती है मर्मस्पर्शी रचना ‘आर्द्र’।वसुधा जी इस लघुकथा में बगीचे में काम कर रहे माली के माध्यम से अपने संयुक्त परिवार से दूर रह रहे व्यक्ति को जड़ों की आर्द्रता को पाने का मार्ग मिल जाता है वही अंतरा जी की इस लघुकथा में कोमल को अपनी बिटिया द्वारा की गई शीतल फुहार के माध्यम से रिश्तों की वही आर्द्रता महसूस होती है। अंतरा जी की ‘सरोवर’ रचना को पढ़ने के पश्चात राष्ट्रीय स्तर को एथलीट नित्या के हौसले, लगन, जोश और अटूट आत्मविश्वास को देखकर उसका प्रेरणादायी व्यक्तित्व मन-मस्तिष्क पर छा जाता है। वसुधा जी की ‘बाढ़’ लघुकथा में यथार्थवादी जीवन का सटीक चित्रण है। बाढ़ के तांडव को वसुधा जी ने सूक्ष्मता से रेखांकित किया है। ‘बर्तनों को तेजी से माँजते हुए सुशीला भर्राए स्वर में बोली, ‘बाढ़ कुछ देती नहीं मेमसाब, माल-मवेशी, आँगन-झोपड़ी… सब कुछ छीन लेती है !’ अंतरा जी ने स्तब्ध कर देने वाले एक व्यक्ति के मानसिकता तथा दोगलेपन  के वृत्तान्त को सूक्ष्मता से रेखांकित किया है इस साझा संकलन की लघुकथा ‘बाँध’ में। ‘आज ऑफिस में से ही भैया को फोन कर दिया था। कह दिया उन्हें, कि नदी किनारे बाजू का खेत बंटवारे में वे रख भी लेंगे तो हमें कोई समस्या नहीं। हमें कौन गाँव जाकर खेती करना है। उस खेत से ज्यादा उपज मिलेगी, तो माँ का इलाज, बिन्नी की शादी, बिट्टू की पढ़ाई सही तरीक़े से कर पाएँगे।’

 ‘लेकिन यही बात तो भैया कितनी बार दोहरा चुके थे। पिछली दीवाली पर मांजी भी …’

 ‘हाँ जानता हूँ… वो… आज हमारे ऑफिस में भी कुछ एनजीओ वाले आये थे। हां रहे थे, समय पर बाँध खोल दिये जाते, तो ये बाढ़ आती ही नहीं।’

 ‘सागर’ लघुकथा में इंसान की विवशताओं और विडंबनाओं को वसुधा जी ने स्वाभाविक रूप से शब्दबद्ध किया है। अंतरा जी ‘तरल’ रचना में निकिता के मन के भीतरी तहों में संजोए सच को स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त करती है – ‘नहीं दादी, अब मैंने तो उसके बारे में सोचना ही छोड़ दिया है। ये आदर्श संबंध अब नहीं हुआ करते।’

दोनों लघुकथाकार स्याह होती संवेदनाओं को उभार कर उनमें फिर से रंग भर देती हैं। वसुधा जी ‘कछार’ लघुकथा में यह संवाद गौरतलब है – ‘सर, बस्ती वाला छोरा है… बड़ी-बड़ी बातें कर रहा है! क्या बन पाएगा !’ टेक्नीशियन ने ताना मारा। शिवा को यह बात उसके अंतस में तीर की तरह चुभ गई। बरसों पहले का यह दृश्य सहसा शिवा की आँखों के सम्मुख तैर गया। ‘आइए अंकल, मैं शिवा…  नदी किनारे बस्ती वाला !’ आज शिवा सरकारी अस्पताल में डॉक्टर की कुर्सी पर बैठा था। शिवा को देख टेक्नीशियन हक्का-बक्का हो जड़वत् हो गया ! अंतरा जी की ‘झील’ लघुकथा में नीना अपनी बिटिया को पहाड़ी क्षेत्र के एक होस्टल में छोड़ने आती है तो लघुकथाकार ने एक माँ की छटपटाहट को स्वाभाविक रूप से रेखांकित किया है और जब वह होस्टल की व्यवस्थापिका से बातचीत करती है तो उसके मन में झील की स्थिरता आ जाती है। नीना और होस्टल की व्यवस्थापिका के संवाद को अंतरा जी ने बहुत ही खूबसूरत रूप से शब्दबद्ध किया है – ‘यहॉं शायद बेटियों को नदियों का नाम देना शुभ मानते हैं।’ नीना ने ऊपरी मन से कहा तो, लेकिन अपनी बिटिया को लेकर हिचकोले खाता मन स्थिर नहीं हुआ था। ‘नदियों का जीवन भी तो स्त्रियों जैसा ही होता है।’ व्यवस्थापिका कहने लगी। ‘लेकिन सच कहूँ, मैं तो मेरी पोती को पहले झील-सा बनाउंगी, उसे स्थिर हो जाना सिखाऊँगी, जिससे वह इस संसार की सारी कठिनाइयों के पर्वतों का प्रतिबिंब अपने मन में बनाकर उन्हें पहचान सके। उसके बाद उसे नदी का कोई प्यारा-सा नाम दे दूँगी। ऐसी नदी, जिसका अपने बहाव पर अधिकार हो।’ उन्होंने आश्वस्त करते भाव से नीना की ओर देखा। संग्रह की अन्य लघुकथाएँ भी पाठकों के मन को संवेदनाओं से भिगो देती हैं।

इस साझा संकलन की एक और विशेषता है कि दोनों रचनाकारों ने समान 50 शब्द शीर्षकों पर लघुकथा लिखी हैं। इस तरह इस साझा संग्रह में कुल 100 लघुकथाएँ हैं। प्रत्येक लघुकथा अपने अंदर कोई न कोई मूल्य या संदेश लिये हुए है। इस संग्रह को पढ़कर दोनों लेखिकाओं के मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था, उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता का परिचय मिलता है। इस संग्रह की रचनाओं में रचनाकारद्वय अपने दुखों को भूलकर खुद को उबार लेने वाली नारी के मन की उथल-पुथल, मानवीय स्वभाव और समाज की सूक्ष्म पड़ताल करते  हुए दिखती हैं। इस संकलन की रचनाएँ अपने आप में मुकम्मल और उद्देश्यपूर्ण हैं और पाठकों को मानवीय संवेदनाओं के विविध रंगों से रूबरू करवाती हैं। लेखिकाओं ने इन लघुकथाओं में समाज के मार्मिक और हृदयस्पर्शी चित्रों को संवेदना के साथ उकेरा हैं। कुल मिलाकर मानवीय स्वभाव और समाज के विविध रंगों की लघुकथाओं का यह संग्रह रिश्तों की अहमियत पर व्यापक प्रकाश डालता है और साथ ही समाज को आईना भी दिखाता है। आशा है प्रबुद्ध पाठकों में इस लघुकथा संग्रह का स्वागत होगा।

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