आज पति–पत्नी एक–दूसरे से रुष्ठ हैं। बात कोई विशेष नहीं थी। रामानन्दजी अपने साहित्यिक मित्रों के मय बैठे बातचीत में खोए थे और उनकी पत्नी सुशीला देवी पर्दे की ओट से बार–बार संकेत से उनहें बुला रही थी। रामानन्द देख रहे थे, किन्तु बातचीत एवं उसका विषय कुछ इस प्रकार चल रहा था कि वे उसको बीच में छोड़कर जाना साहित्यिक गोष्ठी एवं मित्रों का अपमान एवं मर्यादा का उल्लंघन समझ रहे थे। यह उचित भी था । बस, पत्नी ने इसे अपना अपमान एवं प्रतिष्ठा का प्रश्न समझ लिया ।
मित्रों के जाते ही वह कमरे में गए और बोले, ”तुम शायद कुछ कह रही थी !”
सुशीला देवी इतने क्रोध में थी कि कोई उत्तर न दिया। हाव–भाव देखकर रामानन्द जी समझ गये कि आज कैकेयी कोपभवन में है।
अपराधबोध महसूस करते हुए उन्होंने पुन: कहा, ”देखो ! तुम्हारी नाराजगी वाजिब हो सकती है, किन्तु मेरी स्थिति एवं विवशता को भी तो समझने की चेष्टा करो। पत्नी होने के नाते ये सब तुम महसूस नहीं करोगी तो कौन करेगा?”
सुशीला देवी ने पति की ओर ऐसे देखा कि यदि उसका वश चले तो शायद उन्हें सूली पर चढ़ा दे ।
”अरे भाई! अब गुस्सा थूक भी दो ! जो हुआ, सो हुआ।” आपस में कड़वाहट न बढ़े, यह विचार करके उन्होंने समर्पण करते हुए कहा, ”अच्छा बाबा ! अब जाने भी दो, भविष्य में ध्यान में रखूँगा, तुम्हारी भावनाओं एवं अहम् को चोट न लगे। अब तो बोलो, कुछ तो बोलो । वह बात तो मुझे बताओ जिसके लिए तुम इतनी नाराज हो गई !”
किन्तु सुशीला देवी न मानी । वह शायद थोड़ी खुशामद और चाहती थी और मन में सोच रही थी कि एक–दो बार मान–मनौव्वल और हो, तो थोड़ा कह–सुनकर नॉर्मल हो जाऊँ। किन्तु रामानन्द आखिर पुरुष थे, साहित्यकार थे। उनका अहम् भी जाग उठा और उन्होंने भी कसम खा ली कि जब तक सुशीला को अपनी भूल का अहसास नहीं हो जाएगा, वह भी बात नहीं करेंगे।
अब स्थिति बड़ी विचित्र थी । घर में केवल दो प्राणी, पति और पत्नी । बीच–बचाव की कोई गुंजाइश नहीं । पत्नी प्रतीक्षा में रही, जब उन्हें भूख लगेगी या चाय की तलब होगी, तो बोलेंगे ही । आज तो बाहर दुकानें भी बन्द हैं। रविवार है न! पत्नी यह सब सोचकर अपने आपमें सन्तुष्ट एवं प्रसन्न है।
रामानन्द जी को भूख बहुत जोर से लगी है। सोचते हैं कि एक तो गोष्ठी में इतना बोलना पड़ा कि थकान हो गई और अब भूख भी कसकर लगी है। वह उठे और उन्होंने एक गिलास भरकर पानी पी लिया। मगर फिर भी मन में कई प्रकार की अजीब–सी बेचैनियाँ हैं, जिन्हें स्पष्ट तौर पर स्वयं वह भी नहीं समझ पा रहे हैं ।
उधर पत्नी ने भोजन बनाना आरम्भ कर दिया है। रसोई में हल्के–हल्के गैस का चूल्हा जलने का स्वर, कुछ बर्तनों की खटपटाहट सुनाई पड़ी। बर्तनों की खटखट से उनके साहित्यिक मन ने उन्हें समझाया, भाई ! जहाँ दो बर्तन होते हैं, खटपट तो होती ही है। किन्तु अगले ही क्षण उनका पुरुष–मन फुफकार उठा, ”मैंने तो सत्प्रयास किया ही था, मगर उसी ने मेरी भावनाओं पर तुषारापात कर दिया।”
रसोई से आती सब्जी बनने की सुगन्ध, फिर रोटियों की सौंधी–सौंधी खुशबू । मिला–जुलाकर स्थिति यह थी कि भूख बढ़ती ही जा रही थी। साहित्यिक मन कहता कि छोड़ो ! जीवनसंगिनी है। आपस में क्या मान और क्या स्वाभिमान ! किन्तु पौरुष है कि समझौते के निकट ही नहीं जाने देता ।
सुशीला देवी पति के मनोभावों को समझ रही है और इस प्रतीक्षा में है कि वह बस एक बार बोल दें, तो सारी बात समाप्त।
अब खाना तैयार है। वह परस रही है। पति का चेहरा इस समय उसे बहुत बेचारा–सा लग रहा है। ऐसा चेहरा देखकर उसके मन में ऐसा प्यार उमड़ रहा है, जो एक बेटे के लिए माँ के मन में उमड़ता है। पत्नी भी तो एक तरह से माँ ही होती है। बस एक ही तो अन्तर…. स्त्राी किसी भी भूमिका में हो, मूलत: वह माँ ही होती है।
रामानन्द परसे जा रहे खाने को इस प्रकार देख रहे हैं कि मन बार–बार ललचा रहा है। उन्हें लगता है कि उनका पुरुष–मन पराजित हो जाएगा । वह अपने को नियंत्रित किये हुए हैं, किन्तु उन्हें बार–बार लगता है कि मन उनके नियन्त्रण से बाहर होता जा रहा है और अब वह समर्पण कर ही देगा ।
पत्नी ने टेबल पर खाना लगाते हुए ममता भरी दृष्टि से पति की ओर देखा और कहा, ”आइए ! खाना खा लीजिये।”
रामानन्द बाबू थोड़ा इतराते हुए बोले, ”नहीं ! मुझे भूख नहीं है।”
”वह तो मैं समझ ही रही हूँ । किन्तु फिर भी मेरी खुशी के लिेखा लीजिए !”
रामानन्द बाबू भीतर तक भीग गए और झटपट खाने की टेबल की ओर बढ़ गए।
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डॉ सतीशराज पुष्करणा
बिहार सेवक प्रेस,‘लघुकथानगर’, महेन्द्रू, पटना–800 006
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जून 2026
देशझूठा अहम् Posted: June 1, 2015
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