जून 2026

पुस्तकदेश-देशान्तर     Posted: October 1, 2020

लघुकथा संग्रह- देश देशान्तर-सन्ध्या तिवारी,प्रकाशन- अयन प्रकाशन,सम्पादक-सुकेश साहनी एवं रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’,मूल्य-300/-

श्री भगीरथ परिहार जी ने लिखा है, ‘‘छोटी छोटी घटनाएँ, मामूली स्थितियाँ एवं अनचीन्ही मामूली सी बातें जो आम आदमी के जीवन में अहम भूमिका निभा रहीं थी उनकी ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करना जरूरी था आमजन उन नायकों की तरह नहीं थे, जिनके जीवन में महान घटनाएँ या त्रासदियाँ घटित होती हों। वह तो मामूली आदमी था, जिसका जीवन मामूली बातों से भरा था… मामूली आदमी के मामूली जीवन में महत्त्वपूर्ण होती मामूली बातों की अभिव्यक्ति लघुकथा कर सकती थी। जो कथा की प्रमुखता पर बल देती थी। इसलिए इस विधा को पुनर्जीवन मिला और इसके पुराने फ्रेम को तोड़ फोड़ दिया गया और नये फ्रेम में नई तस्वीर मढ़ दी गई।’’

लघुकथा ‘देश देशान्तर’ पढ़ते हुए भगीरथ जी की यह बात बहुत शिद्दत से महसूस की मैंने, कि वाकई मामूली कही जाने वाली बातों को भी अगर स्वर दिया जाय तो दुंदुभी नाद से कहीं कमतर आंकलन नहीं होगा।

जिन्हें हर घर की कहानी, घर घर की कहानी या औरतों की बातें कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता है उनकी कहानी आपस में कहते सुनते न जाने कितनी जिंदगियाँ ख़त्म हो गईं। और समाज के मुख से उफ़ तक नहीं निकला। लेकिन जिसने भी, जब कभी यही बातें गीतों में पिरोई तो लोकगीत और गद्य में कहीं तो लघुकथा मुखरित हुई। शायद जब पहली लघुकथा कही होगी तब लोगों को वह एक कहावत सरीखी ही लगी होगी छोटी लेकिन मायनों से भरपूर। तब कहीं जाकर धीरे-धीरे इसका आकार, साकार हुआ होगा।

लघुकथा देश देशान्तर मुझे सुकेश साहनी जी के सौजन्य से भेंट में प्राप्त हुई थी, लघुकथा देश देशान्तर को खण्डों में बांटा गया है जहाँ एक ओर आधारशिला में देश के जाने-माने लेखकों ने आधार- शिला रखी वहीं दूसरी और विश्व के प्रधान लेखकों का सृजन देखने को मिला।

आधारशिला देश के आमुख में लिखा है कि प्रस्थान बिंदु के रूप में मुंशी प्रेमचंद की लघुकथा “राष्ट्र का सेवक” को देखना चाहिए। वहीं लघुकथा का उत्कर्ष राजेंद्र यादव की लघुकथा “अपने पार” को , लेकिन जो उत्कर्ष ‘शरद जोशी’ और ‘हरिशंकर परसाई जी’ की लघुकथा में दिखा वह “अपने पार” में मुझे  द्रष्टव्य नहीं हुआ। ऐसा लगा कि “अपने पार” “आपका बंटी” का मिनिएचर हो। शेष मुण्डे- मुण्डे मतिर्भिन्ना।

आधारशिला_देशान्तर की पूर्वपीठिका लिखते समय सम्पादक द्वय ने लिखा की जहाँ हम अपने देश में लघुकथा के बीज पंचतंत्र, हितोपदेश, बोध कथाओं आदि में तलाशते हैं वहीं देशान्तर में यह लघुकथा अपनी स्वतंत्र अस्मिता में अभिव्यक्त होती रही है। और इस विधा की मान्यता एक स्वतंत्र धारा के रूप में अबाध गति से बह रही है।

देशान्तर के अन्तर्गत ‘किरिच’, ‘प्रेम’, ‘बच्ची और समुद्र’, ‘अलाव और चींटियाँ,’ ‘तस्वीर’, आदि विश्वसाहित्य से ली गई लघुकथाएँ निहित हैं। लघुकथा ‘प्रेम,’ लेखक ‘इवान तुर्गनेव’ अनुवादक ‘सुकेश साहनी’ ने इस कथा का इतना सुंदर अनुवाद अनुवाद किया जैसे- ‘फटी आवाज और काली छाती वाली बूढ़ी गौरैया’ बिल्कुल सम्मुख बैठी चीं चीं चीं चीं चीख रही हो। ‘बच्ची और समुद्र’ ईरानी लघुकथा है लेखक ‘तोरिज फ़राज़मंद’ अनुवादक ‘हसन जमाल’ ने इतनी खूबसूरत से कथा के बिंब और रूपक को प्रस्तुत किया है कि कई बार लगा हम लघुकथा नहीं एक पूरी कहानी पढ़ रहे हैं। ‘खलील जिब्रान’ की लघुकथा ‘निद्राजीवी’, ‘एतगार केरेत’ की लघुकथा ‘दीक्षा’, ‘एलन सनेगर’ की लघुकथा ‘खिड़की,’ ‘चेख़व’ की लघुकथा ‘कमजोर,’ ‘फ्रांज़ काफ्का’ की ‘पुल,’ ‘चार्ली चैपलिन’ की ‘याँत्रिक’ लघुकथाएँ बेहद मर्मस्पर्शी और बहुआयामी है। देशान्तर वाला पर्व इस पूरे लघुकथा संग्रह का सबसे ज़हीन भाग है। एक रचना में कैसे प्रवेश करना है, कैसे उसका उत्थान करके और किस बिंदु पर समापन करना है इसकी समझ यदि नये लेखकों को विकसित करनी हो तो इस खण्ड़ का बारीकी से अध्ययन करना चाहिए।

अविस्मरणीय परिच्छेद में सम्पादक द्वय ने उन लघुकथाओं को बहुत पहले ही चिह्नित कर लिया था, जो आगे चलकर कालजयी साबित होने वाली थीं। असगर वजाहत की ‘आग,’ भूपिंदर सिंह की ‘रोटी का टुकड़ा’, रमेश बतरा की ‘सूअर’, युगल की ‘पेट का कछुआ’, वरियाम सिंह संधू की ‘काली धूप’ अनुवादक अशोक भाटिया, पृथ्वीराज अरोड़ा की ‘कथा नहीं’ आदि लघुकथाएँ विश्व पटल पर अपनी दमदार उपस्थिति के लिए सदा के लिए अमर हो चुकी हैं। ये लघुकथाएँ केवल सुंदर नहीं क्योंकि ऐसा होना अपने में काफ़ी नहीं, जीवन में घटनाओं के लिए एक आधार होना चाहिए। जहाँ जाकर सुंदरता एक किनारे दुबक जाती है। वहीं आधार इन लघुकथाओं में परिलक्षित होता है।मन की सुंदरता की सीमा को पार कर कहन की और सम्वेदना की अन्तर यात्रा तय करती हुई लघुकथाएँ।

नई जमीन सोपान में दस लघुकथाओं को स्थान मिला है दस की दस लघुकथाएँ अपने में पूरी तरह मुकम्मल हैं। ‘मानुष गंध’- सरोज परमार ,की लघुकथा में किस तरह एक अकेला व्यक्ति अपने अकेलेपन में ऊब से घिर कर एक लुटेरे तक को गले लगाने के लिए तैयार हो जाता है। कथा की सम्वेदना उस एकाकीपन में छिपी है जहाँ व्यक्ति अपने उस एकाकीपन से छुटकारा पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। ‘पहला संगीत’- अखिल रायजादा, कहा जाता है- कि पेट में रोटी हो तभी कुछ और सूझता है लेकिन कभी कभी मानव मन पेट से कुछ ऊपर उठ कर मांग करता है। पहला संगीत उसी की कथा है एक भिखारी लड़की अपने भाई के जन्मदिन पर पैसे की जगह गिटार वाले लड़के से चाहती है कि वह उसके भाई के लिए हैप्पी बर्थडे की धुन बजा दे।सम्वेदना के महीन तार झंकृत कर जाती है यह लघुकथा। ‘आईना’- सत्यनारायण, ‘धरोहर’- आनंद, ‘समाजवाद’- उर्मिल कुमार थपलियाल, ‘खुलता बंद घर’- चैतन्य त्रिवेदी,और ‘स्मृतियों में पिता’- रघुनंदन त्रिवेदी की लिखी लघुकथाओं की बुनावट इतनी गझिन है कि उन्हें विश्व स्तर की लघुकथाओं से किसी भी रूप में कमतर नहीं आंका जा सकता।

सम्वेदना और बिम्ब के स्तर पर ये लघुकथाएँ इतनी परिपक्व हैं कि इनकी धमक को सदियों सुना जा सकता है।

इन लेखकों की लघुकथाओं में शब्दों, पात्रों, घटनाओं,आदि का ऐसा अनुकरणीय अनुशासन और चूंकि यह रूप आधारित विधा नहीं है, यह कथ्य प्रधान विधा है,इसलिए इनका कहन का तरीका रेखांकित करने योग्य है।

लघुकथा ‘पावर विंडो’ तो ‘शरद जोशी’ के नामचीन व्यंग्य ‘जीप पर सवार इल्लियाँ’ से एक कदम आगे ही लगती है । ‘स्मृतियों में पिता’ और ‘समाजवाद’ पढ़ते हुए कहीं से कहीं तक लगा ही नहीं कि ये विश्व साहित्य के समकक्ष नहीं।

इतने परिश्रम, अनुराग और मनोयोग से रची ये कृतियाँ लघुकथा इतिहास की अमिट रचनाएँ हैं।

सम्पदा खण्ड में सम्पादक की कलम से लिखा गया, इसमें वे कथाकार शामिल हैं ,जो विगत लम्बे समय से अपनी सृजन दक्षता बनाये हुए हैं इस परिच्छेद में कुल तीस लघुकथाएँ संगृहीत हैं

लघुकथा ‘उसका दर्द’- ‘विवेक निझावन’, ‘प्रबन्धन’- ‘सुदर्शन रत्नाकर,’ ‘अंतहीन सिलसिला’- ‘विक्रम सोनी,’ ‘बिन शीशों का चश्मा’- ‘रामकुमार आत्रेय ‘, ‘पाठ’- ‘अभिमन्यु अनत,’ ‘शिक्षा’- ‘भगीरथ,’ ‘कन्धे पर बैताल’- ‘बलराम अग्रवाल,’ ‘कबूतरों से भी खतरा है’- ‘एन. उन्नी’, ‘कपों की कहानी’- ‘अशोक भाटिया,’निःसंदेह बेहद बेहतरीन लघुकथाएँ हैं। जिन्हें समय के भाल पर अंकित होना ही होना है।

इसमें से भी बिन शीशे वाला चश्मा ,कन्धे पर बैताल, कबूतरों से खतरा है, अंतहीन सिलसिला लघुकथाएँ ऐसी है जो पाठक के मन मस्तिष्क पर कब्जा जमाये रहेंगी। समय की धूल इन्हें मटमैला नहीं कर सकती।

इन लघुकथाओं में घटनाओं के तर्क से उसकी अंतर्भावना पर ग्रहण नहीं लगाया जा सकता । लेखक ने जो कुछ कहना चाहा वह शफ्फ़ाक सा तैर कर ऊपर आ गया।

स्वागतम् खण्ड में हिन्दी चेतना पत्रिका के लिए आई लघुकथाओं में से श्रेष्ठतम लघुकथाओं को लिया गया है इसमें ‘चीरहरण’- ‘सुरेंद्र कुमार पटेल’, ‘मानसिकता’- ‘डॉ अनीता कपूर’, ‘अंधेरा’- ‘भावना सक्सेना,’ आउटगोइंग’- ‘शेफाली पाण्डे,’ ‘काठ’- ‘सुदर्शन प्रियदर्शिनी,’ ‘अच्छा सौदा’- ‘दीपक मशाल,’ ‘अपने अपने देश’- ‘रचना श्रीवास्तव’ की रचनाएँ भी खासी सराहनीय हैं।

मेरी_प्रिय_लघुकथाओं के अन्तर्गत ‘हरिमृदुल जी’ ने दो रचनाओं को चुना है उसमें से एक है ‘जोगिंदर पाल’ की लघुकथा ‘उपस्थित’ तथा दूसरी है ‘उदय प्रकाश’ की ‘डर’ । लघुकथा ‘उपस्थित’ सच में एक शानदार लघुकथा है।

‘डर’ लघुकथा में कथातत्त्व का अभाव लगा । कहावत या मुहावरे भी अपने में पूरे होते हैं उनमें भी बीज तत्त्व में एक पूरी कहानी छुपी होती है, लेकिन उन्हें कहानी या उपन्यास का दर्जा नहीं दिया जा सकता। डर लघुकथा में भले ही बहुत सारा सार समाहित हो लेकिन कहीं न कहीं अपूर्णता की कचोटन रह ही जाती है।

परिचर्चा के सोपान में सम्पादकद्वय ने लघुकथा से संबंधित कुछ प्रश्न लघुकथा दिग्गजों से किये है और उन्होंने बहुत गम्भीरता से उसके उत्तर दिये हैं। जोकि लघुकथा में आने वाली नई पौध और शोधकर्ताओं के लिए काफ़ी ज्ञानवर्धक है। और अंत में एक-एक लघुकथा काम्बोज जी ‘ऊंचाई’ और साहनी जी की ‘स्कूल’ भी इसमें शामिल हैं। इन दोनों लघुकथाओं ने तो इतिहास रच दिया है। इन लघुकथाओं को तो शायद ही ऐसा कोई लघुकथाकार हो जिसने न पढ़ा हो।

अंत में इतना ही कहना है कि लघुकथा संग्रह देश देशान्तर ऐसा है कि सभी लघुकथा प्रेमियों के पास होना चाहिए।इस संग्रह की एक एक लघुकथा माला के मनके की तरह सुंदर और अपरिहार्य है जैसे एक ही मनका गर इधर उधर हो जाय तो पूरी माला की न केवल सुंदरता बाधित होती है अपितु वह अनुपयोगी भी हो जाता है।

मेरी दृष्टि में यह संग्रह एक अनिवार्य की संज्ञा धारण करता है।

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