खुराक़ का मजा
हम एक भोज में शरीक हुए थे। वहाँ कई तरह के स्वादिष्ट भोजन के इंतजाम थे। कुछ लड़के मूविंग स्नैक्स लेकर इध्र–उधर घूम रहे थे। एक तरफ स्टार्टर के स्टॉल लगे थे। उनमें बिहारी लिट्टी से लेकर चायनीज मंचूरियन और चाऊमिन सजे हुए थे। दूसरी तरफ मेन कोर्स के लंबे–टेलिस्कोपिक काउंटर लगे थे। मैदान के बीच में कई तंदूर धधक रहे थे और नाना कार की रोटियाँ और नान दनादन बनकर निकल रहे थे। और अंत में बच्चों के यि डेजर्ट के रंगीन स्टॉल तो थे ही।
इतने सारे खाद्य पदार्थों के बीच हम हतप्रभ थे। हम इन अनगिनत चीजों का सिर्फ़ स्वाद भर ले सकते थे, क्योंकि इन्हें पूरी मात्रा में खाना हमारे पेट को गवारा नहीं था। हम भोजन के स्वाद पर ही केन्द्रित थे और उनपर तरह–तरह की प्रतिक्रया दे रहे थे। ‘‘न ! यह अच्छा नहीं बना है। हाँ, वो थोड़ा ठीक है। ये आइटम तो बड़ा अच्छा बनता है। मगर इस कुक ने तो बेड़ा गर्क कर दिया है। हाँ, सब मिलाकर ठीक ही है…..’’
हम प्रसन्न कम हो रहे थे और नाक–भौं ज्यादा सिकोड़ रहे थे। तभी हमने देखा, एक आदमी ने अपनी प्लेट में सभी आइटम का पहाड़–सा बना रखा है और उस पहाड़ पर इस तरह टूट पड़ा है, मानो एक भूखे शेर को मनुष्य का मांस मिला हो। हम उसे हैरत से देखते रहे। मैंने पास जाकर पूछा, ‘‘भाई साहब, खाना कैसा बना है ? लगता है बहुत स्वादिष्ट बना है।’’
उसने पलटते ही कहा, ‘‘खाना ठीके हई। बाकि हमनी के सुवाद से का मतलब ? भर पेट खाए के मिल जाए त समझू कि हमनी के ओही सुवाद हे।’’
इतनी बात कहते भर उसका खाना बंद रहा। फिर वह ताबड़तोड़ चालू हो गया।
स्वाद के बीमार हमलोग अपनी किस्मत पर तरस खा रहे थे।
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