गगन से धरती तक फैले, नीले आसमानी पर्दों की बाँहों में, वह झूला झूल रही थी! हँसती, खिलखिलाती, गुनगुनाती – हर पेंग पर ऊँची, और ऊँची उठती हुई, वह मानों आसमान छू लेना चाहती थी, कि तभी अचानक किसी स्पर्श से उसकी आँख खुल गई! खीझकर बोली, “माँ! क्यों जगाया मुझे? कितना सुंदर सपना था!” माँ हँस दी, “अच्छा! वही नीले आसमानी पर्दों वाला?”
“हाँ माँ!” कहते हुए, माँ के गले में बाँहें डालकर, बड़े लाड़ से वह बोली, “माँ! घर में आसमानी परदे लगा दो न! मुझे बहुत अच्छे लगते हैं!”
“हाँ मेरी लाडो! जब अपने घर में जाएँगे, तब ज़रूर लगाएँगे! ये तो किराये का मकान है!” माँ ने उसका सिर चूमते हुए कहा!
उसकी मासूम ख़्वाहिश ने संतोष धर लिया!
इधर घर बना, उधर वह उम्र की सीढ़ियाँ चढ़ती-चढ़ती विवाह योग्य हो गई! नए घर को सजाते हुए जब पर्दों की बारी आई, तो उसे अपने स्वप्न की याद आई! उतावली होकर वह माँ से बोली, “माँ! अब मैं लगाऊँ … रेशमी, नीले, आसमानी पर्दे?” माँ कुछ कहती कि भाई ने छेड़ा, “अरे! बहना! अब तो तुम कुछ ही दिनों की मेहमान हो यहाँ! फिर तो दूसरे घर ही जाना होगा! वहाँ जाकर लगाना अपने नीले, आसमानी पर्दे! यहाँ तो तुम्हारी भाभी की पसंद के लगेंगे!” भाई ने मज़ाक ही मज़ाक में मानों फ़ैसला सुना दिया!
“माँ आ..आ..!..” कहते हुए वो माँ की तरफ़ देखा! माँ समझ न पाई, किसका पक्ष ले, सो चुप रह गई!
उसकी मासूम ख़्वाहिश ने समझौता कर लिया!
कुछ ही समय बाद विवाह हो गया! ससुराल पहुँचते ही पर्दों पर निगाह पड़ी – हर तरफ़ चटख़ रंग के पर्दे! सोचा, ‘मेरा घर! अब यहाँ मैं लगाऊँगी -अपने मनभावन नीले, आसमानी, रेशमी पर्दे!’ और मन ही मन मुस्कुरा उठी!
दो-चार दिनों बाद सास ने कहा, “बहू! किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो बता देना, शरमाना नहीं!” सुनकर मन को आस बँधी! सकुचाते हुए बोली, “माँ जी! क्या मैं इन पर्दों को हटाकर नीले आसमानी पर्दे लगा लूँ!” पास ही बैठी चचिया सास ने जेठानी को कुहनी मारी और बुदबुदाई, “ये लो जिज्जी! ये तो आते ही हक़ जताने लगी, घर को बदलने का सोच रही! हम्म… ये आजकल की लडकियाँ!…” सास ने नाक पर टिके ऐनक के ऊपर से आँखें टेढ़ी करके देखा और कहा, “अभी तो आई हो बहू, पहले घर के तौर-तरीक़ों को समझकर, ख़ुद को ढालो, घर को संभालो! मेरी आँखें तो मुँदने दो! पर्दे क्या, सबकुछ बदल लेना!…” वह सकपका गई, सहमकर चुप हो गई!
अपनी मासूम ख़्वाहिश को उसने कसकर भीतर ही दबा दिया!
एक प्यारे से बेटे की माँ बनी! घर-परिवार में ऐसी उलझी कि क्या अपना, क्या सपना.. सबकुछ भुला बैठी! माँ ग़ुज़र गई, सास चल बसी! बेटा बड़ा हो गया! बेटे का विवाह तय हुआ तो घर को नए सिरे से सजाया जाने लगा! अचानक मन के किसी कोने में कोमल सी थपकी पड़ी – ‘रेशमी नीले, आसमानी पर्दे!’ उसे याद आ गया अपना स्वप्न! अब तो वह इस घर की स्वामिनी है! अब अपना सपना पूरा कर सकेगी – सोचकर ही पुलकित हो उठी!
अचानक एक दिन, होने वाली बहू को लेकर, बेटा सामने आ खड़ा हुआ – “माँ! यह आपसे मिलना चाहती थी, घर देखना चाहती थी, तो मैं ले आया…” अपने समक्ष एक प्यारी, नाज़ुक सी, मधुर मुस्कान लिए लड़की को देखकर गद्गद हो उठी – उसे अपना समय याद आ गया! उसे गले से लगाकर उसका स्वागत किया! मासूम चेहरा मगर समझदार और आत्मविश्वास से भरपूर आँखें, पूरे घर का मुआयना कर रही थीं – एक-एक चीज़ को उत्सुकता लिए, गौर से देख रहीं थीं! बेटे ने उसे पूरा घर दिखाया! न चाहते हुए भी दोनों के बीच की बातें उसके कानों तक आती रहीं – “इस वॉल पर हम ये कलर कराएँगे, इस कॉर्नर पर प्लांट्स, और करटेन्स न.. बिलकुल कॉन्ट्रास्ट लगाएँगे, और इधर …” पूरे घर का चक्कर लगाकर दोनों जब उसके सामने आए तो उसने देखा – लड़की का चेहरा ख़ुशी दमक रहा था! बेटा भी बहुत ख़ुश था! दोनों ऐसे चहक रहे थे, जैसे चिड़िया अपने आशियाने के तिनके संजोते वक़्त चहकती है! बेटा बोला, “माँ! अब तुम बिलकुल टेंशन न लो! हम दोनों मिलकर सब सम्भाल लेंगे! तुम अब आराम करो!” वह अपलक उन्हें देखती रही!
उसकी मासूम ख़्वाहिश न जाने कहाँ गुम हो गई थी!
-0-