जून 2026

पुस्तककिन्नर जीवन से साक्षात्कार कराती लघुकथाएँ     Posted: November 1, 2020

मेरी किन्नर केन्द्रित लघुकथाएँ;   पारस दासोत (जयपुर),प्रकाशक अक्षरधाम प्रकाशन  हरियाणा, पृष्ठ – १०४,मूल्य- १८० रुपये,आई. एस. बी. एन. – ९७८-९३-८२३४१-६७-३

लघुकथा साहित्य की प्राचीन विधा है , यह अलग बात है कि विगत दिनों में उस ओर लेखकों की दृष्टि कुछ कम गई । किन्तु सीमित ही सही जिन सहित्यकारों ने इस विधा में अपना रचनात्मक सहयोग प्रदान किया है उनमें स्व. पारस दासोत जी का नाम अग्रिम पंक्ति के लघुकथाकार के रूप में स्मरणीय है । वे न केवल लघुकथाकार थे वरन एक कुशल चित्रकार, मूर्तिकार एवं हायकुकार भी रहे । एक चित्रकार और मूर्तिकार की छाप हमें उनके समस्त लघुकथा संग्रहों के आवरण पृष्ठ पर मुखरित होती दिखाई देती है ।1986 से 2013 तक आप सतत लघुकथा लेखन से न केवल जुड़े रहे बल्कि अपनी अभूतपूर्व लघुकथाओं से लघुकथा जगत को समृध्द भी किया । जिनमें से कई संग्रह विषय विशेष को केन्द्रित कर रचे गये , जो कि अपने आप में दुर्लभ कार्य है । जिनमें ‘मेरी मानवेतर लघुकथाएँ, ‘यथास्थितिवाद के खिलाफ मेरी लघुकथाएँ’, ‘मेरी मनोवैज्ञानिक लघुकथाएँ’, ‘मेरी किन्नर केन्द्रित लघुकथाएँ, उनके विषय केन्द्रित एकल लघुकथा संग्रह हैं ।‘लघुकथा महोपाध्याय’ की मानद उपाधि से सम्मानित श्री दासोत द्वारा लिखित लघुकथाओं का देश ही नहीं विदेश की भी कई भाषाओँ में अनुवाद हुआ है । कई शोध कार्य उनकी लघुकथाओं पर हुए हैं । इसी से उनके साहित्य का मूल्यांकन किया जा सकता है ।

किसी भी एक विषय को केन्द्रित कर लघुकथाएँ रचना निःसंदेह बहुत चुनौती पूर्ण कार्य है । मेरी किन्नर केन्द्रित लघुकथाएँ ,दासोत जी का ऐसा ही विषय विशेष को केन्द्रित कर रची गई लघुकथा संग्रह है । निःसंदेह आज तकनीकी संसाधनों ने हमारे ज्ञान का विस्तार किया है किन्तु जब किन्नरों की बात आती है , उनके जीवन संसार से हम आज भी अनभिग्य हैं कारण उनकी अपनी दुनिया है , अपने कायदे कानून है जिन्हें सार्वजनिक करने से उन्हें परहेज है । ऐसे विषय पर लेखन हेतु बहुत अध्ययन एवं सावधानी की आवश्यकता होती है, क्योंकि जब हम किसी भी समुदाय की बात करते हैं तो समझो उसकी संस्कृति और संस्कारों की बात करते हैं । किन्नरों की जीवन शैली, उनकी अभिलाषा, कुंठा , आक्रोश , भाषा शैली ,हाव -भाव , आचार-विचार … उनके चिंतन के स्तर के पहचानना कठिन प्रक्रिया है । मैं यह नहीं कहूँगी कैसे कर लेते थे वे यह सब क्यों कि ऐसा ही प्रयोग मेरा भी रहा है …एक ही विषय को लेकर उस पर लेखन , इसलिए समझ सकती हूँ जब ठान लेते हैं तो पूरी तरह उसमें डूब जाते हैं । 

किन्नर इस संसार के तृतीय समाज का प्राणी, जिसे छक्का, हिजड़ा , किन्नर, खुसरो  या बहुत सभ्यता से हम थर्ड जेंडर कहते हैं । आखिर क्या वजह है जो उन्हें समाज से बेदखल किया गया …यह प्रश्न अनादिकाल से उनकी ओर से गूँज रहा है …क्या कमी है हममें …बस शरीर के एक अंग की कमी …? वेदना –संवेदना तो इस कमी से परे है …हममें भी दया ,धर्म, सम्बन्धों की गरिमा है …बल्कि आम इन्सान से अधिक …,उनके इसी उद्दात चरित्र को रेखांकित करती लघुकथा ‘किन्नर’ । “किन्नर ने अपने सहयात्री के गिरने पर ताली नहीं पीटी , तालियाँ बस में बैठे सभी यात्री पीट रहे थे । किन्नर तो संतों की तरह शांत खड़ा है ।” (पृ. -13)

कुछ शब्द हैं जिनका इनकी जिन्दगी से गहरा ताल्लुक हो गया है ,यथा- तालियाँ, तीसरा, छक्का …घाघरा उठाना आदि , गलती जो माफ नहीं इसी तीसरे शब्द को परिभाषित करती है …दरअसल लिंग की दृष्टि से भी तृतीय लिंगी कहे जाने वाले किन्नर जब सुनते हैं कि तीसरा बच्चा हुआ है तो बिना न्यौछावर लिए ही लौट जाते हैं । क्योंकि तृतीय समाज , तृतीय लिंगी, थर्ड जेंडर इन शब्दों ने तृतीय के प्रति मन में कसैलापन भर दिया है । तीसरा होना उनके लिए उत्सव का नहीं पीड़ा का विषय है । ऐसे ही तालियों का रिश्ता जीवन में इतना गहराया है कि दिन की शुरुवात ही तालियों से होती है , बचपन ही इन तालियों के बीच गुजरा है ,ये तालियाँ उनके जीवन के सारे रेश्मी सपनों को तार-तार कर देती हैं । आखिर वे भी इन्सान हैं , जाने- अनजाने जीवन की दमित अभिलाषाएँ दस्तक दे ही जाती हैं , भावनाएँ मचल ही जाती हैं , कोई सुख-दुःख का भागी हो , प्रेम रस जीवन में बरसे “प्रभात नहीं हुई की नायिका का सपना ऐसे ही तालियों की ध्वनि से बिखर जाता है , वह आभासी दुनिया से अचानक यथार्थ दुनिया में आ जाती है । ”x x x न जाने , किस हरामजादी ने , ताली पीट दी ! कमबख्त ने , प्रभात ही नहीं होने दी !”  (पृ. २०) हर किन्नर को शिद्दत से इंतजार है अपने जीवन की प्रभात का ।संवेदना जगाती है लघुकथा ।   

दासोत जी की लघुकथाएँ स्वयं किन्नर के अंतर्मन से निकली आवाज हैं जिन्हें उन्होंने  शब्दों का जामा पहनाया है ।ये लघुकथाएँ कभी पाठकों से कभी समाज से प्रश्न करती हैं । कभी अमानवीयता के लिए ललकारती है, कहीं उनके भीतर की औरत अपने अधूरेपन की व्यथा कहती है , कभी सूनी कोख का दर्द, रिश्तों का अभाव , अपनों का तिरस्कार उन्हें सालता है । तो कहीं एक नारी के रूप में प्रणय वेदना की टीस उनकी आँखों से बहती है । संग्रह के अधिकांश किन्नर पात्र स्त्री रूप में हैं ,लगता है वे स्त्री मनोविज्ञान के वे विश्लेषक हैं । संग्रह में कई स्थानों में उन्होंने किन्नर के स्त्री रूप का इतना सजीव चित्रण प्रस्तुत किया है कि बरबस उस पीड़ा से मन द्रवित हो जाता है । “क्या हुआ जो उनके स्तन में दूध नहीं उतरता …, उनकी कोख से कोई जिन्दगी नहीं उपजती…ममता , स्त्रीत्व इसकी  मोहताज तो नहीं…?” आखिर उनके भी अरमान है ,कि एक घर हो , जिसे वह सजाये –सँवारे …अपना आँगन हो जिसे लीपकर अल्पना सजाएँ.., रसोई पकाएँ …, अपनों की सेवा टहल करे ।  ‘औरत एक खुशबू का यह दृश्य उनकी वेदना को साकार करता है ,“तुम सभी ये कपड़े (पेंट-शर्ट ) पहनकर , जल्द बाबू साब बन जाओ ! आज मैं, अपने घर के आँगन को गोबर से लीपकर मांडना मांडूगी ।”(पृ २२ ) ऐसे ही स्त्रीत्व से जुड़ी भावुक कर देने वाली लघुकथा है ,‘आंचल की भूख ममता तड़पती है तो तकिये को गोद में ले उसकी पूर्ति करती किन्नर की व्यथा आँखों को सजल कर देती है ,

“तकिया s s ! तू तकिये को गोद में लिये …थी !” साथी किन्नर , किन्नर को तकिया वापिस सौंपते हुए बोला _”ले ! पिला ! पिला, अपने बच्चे को दूध पिला ।” (पृ २३ ) ममता की व्यथा कहती एक और कथा ‘दुर्भाग्य का दुर्भाग्य’ “देखो हमारा दुर्भाग्य! हम, ‘टेस्ट-ट्यूब’ भी नहीं बन सकतीं!” (पृ २४ ) ‘कोख का स्पर्श’ में वेश्या और किन्नर का परस्पर दर्द का रिश्ता महज कुछ पलों में ही कितना मजबूत हो जाता है …”वेश्या ने जैसे ही उसके सर को अपनी गोद में रखकर अपने हाथ का स्पर्श दिया, बूढ़े किन्नर ने , अपना शरीर त्याग दिया । वेश्या, किन्नर के शव को पागलों की तरह चूम रही थी ।” यह है दर्द का रिश्ता…अपनों की चाहत का रिश्ता …। संग्रह की बहुत मर्मस्पर्शी लघुकथा है ।

वहीँँरिश्तों के अभाव की पीड़ा और काम कुंठा की कसक भी उनके जीवन के दर्द को व्यक्त करती है ।‘बुढ़ापे का दर्द’ कथा रिश्तों की गर्माहट का सालता अभाव है ,”बुरा मत मानना !, मैं बूढी हो गयी हूँ री ! मुझको , अब इस दुलाई में भी ठण्ड लगती है ।” कह किन्नर , अपने साथी की दुलाई ऊँची कर , उसके साथ सो गया । (पृ २१) ‘मर्द- नामर्द’ के अंतर को परिभाषित करती लघुकथा ,”यह साला, x x x जो भी हो , ….पर नामरद नहीं है ।” (पृ २६ ) समाज के द्वारा उन्हें नपुंसक, नामरद  की संज्ञा पीड़ा देती है ,  ‘किन्नर होने का दर्द’ “देखो-री देखो ! ये पिल्ला किन्नर नहीं है !” / “सच ! ये हिजड़ा नहीं है !”/ सभी किन्नर नाच गा रहे थे । “अरे ! … ऐसा क्या हुआ ! नाचते -नाचते किन्नर , यकायक फूट –फूट कर रोने क्यों लग गये !” (पृ २७ ) एक नया दर्द बयान करती है लघुकथा , उनकी पीड़ा देखिये ‘हम इस कुत्ते से भी गये गुजरे” ….लघुकथा ‘अश्रुधारा’ – “भाई ! आप अपनी वासना को तृप्त कैसे करते हैं ?” / उत्तर में किन्नर की आँखों से अश्रु बहकर , उसके ओठों पर पहुँच रहे थे । उफ़ ! कैसा ये अनकहा दर्द !!! है । 

माँ का आँचल , बाबुल का दुलार ,घर की चार दीवारी होते हुए एक अनजानी दुनिया में स्वयं को पाकर प्यार भरा गुस्सा , कागजों पर फूट पड़ता है । उनका अपना परिवार है जिसमें कोई खून का रिश्ता नहीं, अगर है तो उपेक्षा और दर्द का …यही कारण है मत भेद होकर भी उनके बीच कभी मन भेद नहीं होता ‘प्यार ही तो है कभी जब घर की याद व्याकुल करती है तो सभी अपने प्यार की छाँव उस पर लुटाते हैं, क्या तेरे पास घर नहीं है …! साड़ियाँ नहीं है…! रोटी नहीं है …! समाज नहीं है …! सब कुछ तो है यहाँ ! क्यों री ,क्या तू हम साथियों पर बोझ है !” (पृ.६४) सीमित संसाधनों के बावजूद सुख-दुःख साँझा है उनका । सामान्य समाज को प्रेरणा देती लघुकथा । चाहत – वृध्द किन्नर डबलबेड अपने कमरे में लगवा रहा है । कारण इससे शरीर साथी की माँग करने लगता है । वहीँ ‘कमला किन्नर का अपने बेडरूम  को साफ करना, सजाना, , ‘बहते आँसू  ‘ –“एक किन्नर , मर्द के कटे लहूलुहान यौवनांग  को अपनी साड़ी पर कुछ इस तरह रखते हुए बोला –“स्साला मैं तो मर्द बन गया ।”(पृ १०३  )‘एक खिलौना और ,”किन्नर , अपना पेटीकोट ऊँचा करते हुए बोला – हमारे पास ऐसा कुछ नहीं है , फिर भी लोग , जाने क्यों ।”(पृ ६१ ) उनके जीवन की विसंगति एवं मानव समाज की कुत्सित मानसिकता दोनों का सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है ।

आज किन्नर समुदाय खफा है , अपने साथ हुए अन्याय के प्रति आक्रोश …यही वजह है वे अपने को साबित करना चाहते हैं …मानव समाज द्वारा किये दुर्व्यवहार का अपेक्षित जवाब है उनके पास । जीवन दर्शन की गुत्थी सुलझाती लघुकथा है, एक मुलाकात ईश्वर से’ काश! सभी इन्सान इस बात को समझ लें तो यह वर्ग भी अपनों का सानिध्य पा जाता । सम्पूर्ण कोई नहीं है …ईश्वर भी नहीं … इसका प्रमाण ईश्वर स्वयं उसे दे रहे है “ मैं –मैं क्या करता है ! देखो, मुझे गौर से देखो !”(इस बार , ईश्वर अपनी चड्डी नीचे किये खड़ा था ।” (पृ १५) वहीँ प्रत्येक इन्सान के भीतर एक ईश्वर होता है , किन्नर भी इन्सान है …यही होंसला ईश्वर उसे दे रहा है , “तुम तो अर्जुन हो, योध्दा अर्जुन ! तुम्हें महाभारत, अपना महाभारत जीतना है ।” (पृ. १५) बात तर्क संगत है, समस्त कृतियाँ ईश्वर की तो इस अपकृति के लिए वे दोषी क्यों …?  दर्शन की चाह सिध्द करती है “ईश्वर ने किन्नर से क्षमा क्या माँगी ! किन्नर को ईश्वर के दर्शन हो गये ।” (पृ. १६) तब जाहिर है ये भेद मानवीय है । योध्दा प्रथम और द्वितीय समाज को अभिमान है कि हम इस तीसरे समाज से बेहतर है , शायद सम्पूर्ण हैं । यह सम्पूर्णता  तब उजागर होती है जब मूर्ति गढ़ते एक किन्नर का उपहास उड़ाता एक राहगीर कहता है ,”देखो रे …! हिजड़ा, हिजड़ा, मूर्ति बना रहा है ।” (पृ. १७) किन्नर का उस राहगीर को चुनौती देना कि तू बनाकर बता …, राहगीर का असमर्थता जाहिर करना । प्रमाणित करता है सम्पूर्ण कोई नहीं । (उपहास की वजह भी यह हो सकती है कि जो स्वयं अधूरा है वह सम्पूर्ण मूर्ति कैसे गढ़ सकता है …? किन्तु किन्नर समुदाय ने ऐसी कई जीवित मूर्तियाँ सफलता पूर्वक गढ़ी हैं जिन्हें पूर्ण समाज ने ठुकरा दिया था ।)

किन्नर का कोई जात-धर्म नहीं होता….वे सभी धर्मों के होते हैं ईश्वर के प्रति उनकी अटूट आस्था है उसी आस्था के बल उनका चिंतन उभरता है, जब हमारी संस्कृति कहती है कण-कण में भगवान हैं ,। नर और नारी इन दो योनियों को जब हमने स्वीकारा है तो इनमें तो दोनों योनियों का मिश्रित भाव है …जब भगवान् शंकर इसी रूप में अर्ध्द नारीश्वर बनकर पूज्य हो जाते हैं तो ये उपेक्षा के हक़दार कैसे हो सकते हैं…? बड़ा सवाल है । ये तो सजीव हैं , साकार हैं ..! ये अगर अपने अधिकारों के लिए हमसे विनम्र भाव से मनुहार करते हैं तो यह उनका नारीत्व है किन्तु अपने प्रति जरा भी अभद्रता होने पर उनका पौरुष भाव तुरंत जाग जाता है । आप भूल रहे हैं ऐसे ही भाव को उजागर करती है , “आप न भूले कि ईश्वर ने इन्हें भी दो हाथ दिए हैं ।’ अपनी इस असफल रचना की जिम्मेदारी ईश्वर सहर्ष स्वीकारता है …इसी से वह अपनी इस भूल के लिए क्षमा याचना भी करता है लघुकथा ‘तुमको नमन , में ईश्वर का कथन  ,” मैं प्रात: उठते ही , सबसे पहले तुमको नमन कर , मैं तुमसे बारम्बार क्षमा माँगता हूँ ।”(पृ २५ ) वहीं ईश्वर जाने-अनजाने हुई अपनी इस गलती पर शर्मिंदा है , पश्चाताप करना चाहता है तभी तो अपने कर्म का मारा ईश्वर’ के नायक के पास आकर रोज सोता है जैसे एक माँ अपने कमजोर बच्चे को सदा सीने से लगाये रखती है। ”बेटे! अपने कर्मों का मारा ईश्वर सोये भी तो किसके पास सोये ।” (पृ.९४)  जब अपना कोई ईश्वर वह नहीं देखता तो स्वयं को ब्रह्मा मान बैठता है ।मैं ब्रह्म हूँ “(पृ.१०४)

 समाज की उपेक्षा , अपने अधूरेपन का आक्रोश दर्शाती कथा है पासा पलट गया’ , आग लगी आग ,रस्ते पर चलती दुआएँ , धर्मअधर्म ,स्वीकारोक्ति , ताली की , घर नये आगन्तुक को लेकर मानसिक स्थिति , किन्नरों का जीवन एक ऐसी नदी है जहाँ उसका समुदाय और जन्म लेने वाला परिवार दो किनारे हैं जो आपस में कभी नहीं मिल सकते , इस परिवार में आने के बाद उस परिवार का जिक्र स्वीकार नहीं …यहीं इतनी सी दुनिया है । बकबक कहानी इस सच्चाई को दर्शाती है ।प्रोमिस , दर्द के पीछे छिपा दर्द , जन्मों का विश्वास है यह जन्म अगर किसी बुरे कर्मों का फल है तो अगला जन्म अवश्य अच्छा होगा …तभी तो एक बच्चे द्वारा आंटी कहने पर जब माँ विरोध करती है तो किन्नर कहती है , इस जन्म में सही , अगले जन्म में तो मुन्ने के अंकल होंगे होंगे बेटे , ? (पृ ७५ ) ‘बकसीस , रेल में उनके द्वारा की गई वसूली और ग्राहकों से उनके व्यवहार की कथा है ।

अपने आक्रोशित स्वरूप के कारण मानव समाज में उनका दबदबा है , लोग उन्हें देख रास्ता बदल देते हैं, जब उसी किन्नर के घर चोरी होती है तो उन्हें पहचानने में समय नहीं लगता , एक किन्नर ओर’ , “साहब किन्नर के घर कोई मर्द चोरी करने से रहा ! वह कोई किन्नर ही है जिसने चोरी की है ।”(पृ ८५ )  भूख की भूख –प्यास की प्यास , आइने में उभरा किन्नर …भूख की आँखों में अपने को और भूख किन्नर की आँखों में वासना की प्यास को ढूँढ़ रही थी ।” (पृ ८६ ) ‘ऐसे ही आईने के सामने खड़ा किन्नर’ और पाप अपने जन्म पर अस्वीकृति को दर्शाती लघुकथा है । उनके जीवन के कुछ पहलू जिनसे वे समाज में भय व्याप्त करते हैं। ‘ताश के पत्ते’ अपने जिजमान से इच्छित न्योछावर निकलवाने हेतु घाघरा ऊँचा करना उसका आखिरी ताश का पत्ता होता है ।खेल-खेल में , में गेंदों का खेल जीवन में ओढ़े हुए थोथे स्वांग हैं जो संभवत: उनकी मज़बूरी है । हमारी वैज्ञानिकता पर प्रश्न अंकित करती कथा ‘शुभ अशुभ’ , ‘यवदोष का मारा’-“हरामजादी ! देख क्या रही है , जल्द दरवाजा बंद कर ! …तेरे को मालूम नहीं , तेरी भाभी पेट से हैं ।” (पृ ५९ ) हिल्लू, डॉक्टर क्रेग’ “किन्नर जैसे ही वैधराज के घर के बाहर आया , बोतल में भरी अपनी पेशाब, गट – गट करता पी रहा था ।” (पृ ९५ ) आशा-निराशा के पलों की विसंगति है यह लघुकथा । परिवार से बिछोह उन्हें मानसिक विकृति तक ले जाता है ।

संग्रह के माध्यम से कथाकार ने कई गंभीर प्रश्न किन्नर समुदाय की ओर से उठाए हैं , उन्हें समाज से अपेक्षा है इन प्रश्नों के जवाब दे । पासा पलट गया बड़ा ऐतिहासिक “सवाल” है अपने पर गर्व करने वाले समाज के लिए, “सखा अर्जुन !…यदि मैं , पितामहश्री के साथ खड़ा जाऊँ तो …!” (पृ ३७) इसका जवाब सभी जानते हैं मगर मानते नहीं …उसी तरह छोटे हम एक गंभीर कथा है वास्तव में उन्हें समझने के लिए हममें वह गंभीरता नहीं है ,बच्चे के मुख से ही सही मगर बहुत गंभीर बात कही है दासोत जी ने ,”आप छोटे हैं …! पापा . तो क्या किन्नरों को समझने के लिए बहुत बड़ा आदमी बनाना पड़ता है ?” एक और सवाल जिसका जवाब आज उन्होंने पा लिया है। काश ! शिक्षा का शस्त्र उन्हें मिल जाये तो अपनी आधी जंग वे जीत जायेंगे । अखुआ ,की नायिका को किन्नर होने पर स्कूल से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है । अपनी अधूरी कामना लिए नायक कहता रह जाता है, मैंने गलती नहीं की ।” शिक्षा के प्रति उनकी ललक को दर्शाता है । जीवन के दंश को झेलकर इतना आहत हैं कि अपने नाम का पर्याय ही उन्हें किन्नर दिखाई देता है ‘पारस’ की पीड़ा है उसे हर पारस में किन्नर दिखाई देता है । “तो’ सुरक्षा विभाग द्वारा उनकी उपेक्षा …वजह शायद उनका होना न होना मायने नहीं रखता …? उनके लिए या फिर वे उनसे कोई उगाही नहीं कर सकते । ‘अपना अपना उत्तर’ , इंसानी समाज के प्रति उनके मन में कितना आक्रोश भरा है इसके लिए कहीं न कहीं हम जिम्मेदार हैं गहरा कटाक्ष है यह लघुकथा “एक किन्नर ने अपने पास ही खड़े गाय के बछड़े को चूम लिया ।” (पृ ५६ ) पशु बनना मंजूर है मगर इन्सान नहीं । यह इंसानियत पर लगा बड़ा प्रश्न चिन्ह है ।

सम्वेदनाओं का स्तर हम उनमें अपने से कहीं बढ़कर पाते हैं । अपनों के द्वारा ठुकराए जाने पर भी उनकी मंगलकामना और उनके प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति उनके किरदार की ऊँचाइयाँ हैं ‘बधाई गीत “नाचो ! …तुम भी नाचो ! मेरे भतीजे के लिए नाचो !”… (पृ ३४) ये भी प्यार पाना और लुटाना चाहते हैं , यदि इन्हें अपना लें समाज तो सेवा भाव इनमें भी कम नहीं । “अरी आओ री ! जल्द आओ ! माँ बीमार है ! , किन्नर वयोवृध्द के घर की और दौड़ रहे थे ।” (पृ ७० )  महंगाई , उस पर कम बच्चों का पैदा होना …रोजी रोटी का कोई जरिया न होना … आज उनके सामने आर्थिक संकट को जन्म दे रहा है । …”पैसे का ढला कीला” –“स्साला ! यही तो मेरे पेट में चुभ रहा था ।” (पृ ५७ ) ‘यूँ ही’ उनके सुख – दुःख से बेपरवाही , लापरवाही की कथा है  । वहीँ तकनीकी के विकास ने उनकी जाति को कहीं न कहीं प्रतिबंधित किया है , भले ही गर्भ में हुई कमियों की पूर्ति कर (जिससे बच्चा इस योनि को पाता है) या फिर अल्ट्रासाउंड के कारण गर्भ में ही उसका समापन कर दिया जाता है । यह उनकी कौम के लिए संकट है, कोई और धरोहर पास न होने से अपनी आने वाली पीढ़ी के आश्रित रहते ये समुदाय जनसंख्या कम होने पर चिंतित हैं । तथा उनके बचाव हेतु प्रतिबध्द हैं । ‘पूज्य अमानत और गर्भ में पड़ा किन्नर लघुकथा अपने वंश के प्रति सम्वेदना है, डाक्टर द्वारा किसी मरीज के गर्भ में किन्नर की पुष्टि पर उसके अबार्शन पर किन्नर की प्रतिक्रिया सन्देश है मानव समाज के लिए कि हम अपने ही अंश को कोख में कभी बेटी तो कभी किन्नर के नाम पर मार देते हैं वहीँ किन्नर ,मानवता के समक्ष गिड़गिड़ा रहा है , “बाबू ! नहीं ,नहीं बाबू नहीं …! ये हत्या मत कीजिये ! वो हमारी पूज्य अमानत है , बाबू उसे मत फेंकिये !” (पृ ६७)

वस्तुत: किन्नर योनि में जन्मे शिशु को बचपन में तो छिपाया जा सकता है किन्तु उम्र के साथ उनमें कुछ गुण स्वाभाविक रूप से उत्पन्न हो जाते हैं जो उन पर लगा आवरण हटा देते हैं । अपने समुदाय के प्रति सहज आकर्षण, शरीर का लहराना, कंठ का फूटना , कुछ शब्दों का स्वत: ही मुख से निकलना …आदि । ‘किन्नर आये किन्नर आये सहज प्रवृति है जो उन्हें अपनी और आकर्षित करती है , माँ बेटी को कितना ही कोठरी में बंद कर दे किन्नरों की आवाज , उनके सुर उसे अपनी और आकर्षित कर ही देते हैं । स्वयं को अभिशापित मानते किन्नर जन्म पर शोक और मृत्यु पर उत्सव मानते हैं …उनके लिए मृत्यु श्राप से मुक्ति है । … उनके जीवन के इस कटु यथार्थ का सामना जब स्वयं मृत्यु से हुआ तो वह भी अचम्भित हो गई ।”किन्नर अपनी मृत्यु को देखकर बोला –“ठहरो  ! मैं एक बार और नाच लूँ ।” (पृ ४६) अभिशप्त जीवन की ख़ुशी … ‘भाल पर उभरे आँसू’ किन्नर की मौत पर नाचते हैं पूछने पर कि साथी की मौत पर कैसा जश्न है ये, रोना चाहिए तुम्हें …किन्नर माथे से पसीने को जमीन पर टपका कर कहता है …ये आँसू हैं ..मैं रो रहा हूँ । उनके जीवन संघर्ष को व्यक्त करता है ।

निःसंदेह आज समाज में उन्हें धीरे धीरे स्वीकृति मिल रही है, उनके हक़ में कानून भी बनाये जा रहे हैं…शिक्षा से लेकर आजीविका के लिए कुछ अधिकार भी …किन्तु पिछली खाइयों को भरने में काफी समय लगेगा …प्रगति पथ पर चलते उनके जीवन रथ को दर्शाती लघुकथा..वाहवाह ‘ “बाई जी ! आज हम आपके यहाँ नाचेंगी गायेंगी नहीं ।”x x x / आज हम काम करना चाहती हैं । बाई जी आपके इस बगीचे की साफ-सफाई कर दें ?” (पृ ३० )निःसंदेह आगामी जीवन में वे अपने जीवन की इस तनहाइयों से निजात पायेंगे …समय के शिलालेख पर एक नया इतिहास रचेंगी । इसका आरम्भ हो चुका है । महाम्न्द्लेश्व्र लक्ष्मी त्रिपाठी के नेतृत्व में 25 थर्डजेंडर का समूह हिमालय पर निकला है । साहित्यकारों का चिन्तन उन्हें शीघ्र ही समाज से जोड़ेगा ।अब तक मेकअप की मोटी परतों में खुद को ढककर अभिव्यक्त करने को मजबूर किन्नरों का जीवन अब तक ब्लेक एंड व्हाइट ही रहा । उनके जीवन में शीघ्र रंगों की फुहार होगी ऐसे शुभ संकेत दिखाई दे रहे हैं । 

दासोत जी का यह संग्रह महज लघुकथा विधा को समृध्द नहीं करता वरन समाज में एक चिंतन का बीज बोता है , एक दृष्टि प्रदान करता है समाज को जिसमें किन्नरों के प्रति सम्वेदना के सुर हैं । इसके अतिरिक्त किन्नरों के मनोवैज्ञानिक , सामाजिक , आर्थिक , व्यावहारिक , भाषिक पक्ष संग्रह को और भी मजबूत बनाते हैं । संग्रह का आवरण पृष्ठ अपने में अनूठा बोध होता है साथ ही यह भी ज्ञात कराता है कि लेखक इस वर्ग से महज लघुकथाकार  के रूप में ही नहीं जुड़ा है , वास्तव में समाज के एक प्रबुध्द वर्ग ने उनके दुःख , पीड़ा, संताप को भी आत्मसात किया है । सोये हुए समाज को जगाना , भूले समाज को सही राह दिखाना , रुढियों का पुनरावलोकन करना यही एक साहित्यकार का दायित्व है । दासोत जी का यह संग्रह इस तमाम कसौटी पर न केवल खरा उतरता है वरन पाठकों को आत्मचिंतन हेतु प्रेरित करता है । इसकी शुरुआत वे संग्रह के आवरण से स्वयं करते हैं । आवरण में उनकी छवि इस बात की स्वीकृति देती है कि उन्होंने इस वर्ग को स्वीकार किया है । यह संग्रह लघुकथा साहित्य की अमूल्य निधि है ।

डॉ लता अग्रवाल

भोपाल

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