एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर के चक्कर लगाते-लगाते बेहद थक गया था मैं। बस अड्डा हालाँकि बहुत दूर नहीं था, मगर एक तो गर्मी फिर थकान की वजह से मुझमें पैदल चलने की हिम्मत रही नहीं थी। लाचार होकर मैंने रिक्शे वाले को पुकारा उससे वहाँ तक का किराया पूछा। उसने पाँच रुपये माँ गे। मैं, लेकिन चार पर अड़ा रहा।कुछ देर सौदाबाजी करने के बाद आखिर वह चार रुपये में मान गया।
रास्ता चढ़ाई का था और मौसम बेहद गर्मी का। सामने की तेज हवाओं ने उसकी दिक्कत और भी बढ़ा दी। उसके शरीर से पसीना चू रहा था और वह बुरी तरह हाँफ रहा था। उसकी स्थिति दयनीय थी। मैं द्रवित हो उठा, कैसे हाँफ रहा है बेचारा। इसे तो मुँह माँगे रुपये देने भी कम हैं। इस बेचारे को पाँच ही दूँगा। किराया चार तय हुआ तो क्या।
रिक्शे से उतरकर मैंने उसे पाँच का नोट थमाया और एक रुपया लौटाने की प्रतीक्षा किए बगैर चल पड़ा। उसने मुझे रोका, ‘‘साब एक रुपया लेते जाइये।’’
‘‘अरे रहने दे। तू पाँच ही रख ले।’’
‘‘लेकिन किराया तो चार रुपये तय हुआ था।’’ वह एक रुपया मेरी तरफ बढ़ाए हुए था।’’
‘‘क्या फर्क पड़ता है, तू रख इसे। तुमने किराया माँगा भी पाँच ही था।’’
‘‘माँगा तो था, पर आप राजी तो नहीं हुए थे। किराया अगर पाँच रुपये तय हुआ होता, तो मैंने ले लिया होता, लेकिन अब…’
‘‘अरे कोई नहीं, रख ले इसे। बख्शीश समझकर ही रख ले और नहीं तो।’’
‘‘उसका चेहरा उत्तेजना से तमतमा आया, ‘‘वाह साब, क्या खूब सोच है आपकी।
पहले मजदूर की लाचारी का फायदा उठाते हुए, उसकी मजदूरी कम तय कर उसका शोषण करना, फिर दान का टुकड़ा डाल उसे भिखारी बना देना…उसके श्रम का सम्मान तो नहीं देंगे आप, भिखारी का अपमान उसे जरूर देंगे।’’ उसकी आवाज में नफ़रत थी । उसने रुपया थमा दिया था।
वह चला गया। मैं अपराधी की तरह सिर झुकाए खड़ा था।
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