एक शीशा था। सदा खिलखिलाता रहता। कोई चेहरा सामने आता तो पेट पकड़ ठहाके लगाता।
‘सफेद झूठ है।’ चेहरा चीखते-चीखते रुआँसा हो जाता कभी, पर शीशा खिलखिलाता रहता।
‘राज क्या क्या है?’ चेहरे ने एक बार नुकीला पत्थर उठा लिया। शीशे की हँसी दुगनी हो गई।
हतप्रभ चेहरे ने आँखें फोड़ लीं।शीशा खामोश हो गया यकदम, फिर चीखते-चीखते रुआँसा हो गया मानो उसकी अपनी आँखें फूट गई हों।