तारिक असलम तस्नीम
1-दिल से….
दीवार घड़ी में ज्यों ही पाँच बजे। आफिस के कमरे से कुर्सियाँ छोड़ कार्यरत कर्मी बाहर निकले लगे। जैसे वे किसी कैद से आजाद हुए हों।
रहमान भी पुराने पुलिस अधीक्षक कार्यालय के समीप से गुजरते हुए हनुमान मंदिर के समीप सड़क की दूसरी ओर बनी दुकानों में से एक सब्जी की दुकान के नजदीक जा खड़ा हुआ। ‘‘चलो! एक रुपये की हरी मिर्ची खरीद ली जाए। बिना इसके धनिया की चटनी में स्वाद नहीं आने वाला…सुनो! हरी मिर्ची है क्या?’’
‘‘सलाम अलैकुम साब! कितना दूँ साहब।?’’
‘‘एक रुपए की दे दीजिए…।’’ रहमान सलाम का जवाब देते हुए उसके चेहरे की ओर ध्यान से देखा। फिर वह दुकानदार को देने के लिए छुट्ते पैसे जेब में टटोलते लगा। तभी उसने दुकान की दीवारों पर टँगी ढेर सारे देवी-देवाओं वाले कैलेंडर को आश्चर्यमिश्रत दृष्टि से घूरते हुए पूछा-’’ क्या यह आपकी दुकान है।?’’
‘‘नहीं साब! दूसरे की है। किराए पर ली है।’’ उसने हरी मिर्ची टोकरी से निकाल एक छोटे आकार के पॉलीथीन में डालते हुए कहा।
‘‘आपका नाम क्या है।?’’ इस बार वह कुछ सशंकित होकर बोला-‘‘ मैंने आपको दो बार मस्जिद में देखा, तो लगा कि आप भी मुसलमान है और यहीं कहीं रहते हैं। साब! आप यहाँ कहाँ रहते है।?’’उसने बेहद धीमे स्वर में पूछा।
‘‘मैं मोहरा के हाजी जी के मकान में रहता हूँ, बस बैंक के पीछे ही हूँ। मगर जब आप मुस्लिम हैं तो फिर ये तस्वीरें क्यों लगा रखी है, दुकान में?’’
‘‘बस यों ही साब!’’ यह कहते हुए वह मुस्कुराया।
‘‘नहीं यों ही नहीं बल्कि यों कहिए कि यह बिजनेस का मामला है। ग्राहकों को भ्रम बना रहेगा। क्यों? ऐसा ही है न?’’
‘‘जी साब! मगर मेरी एक दुकान पुल के नीचे भी है। वहाँ बेटा बैठता है। आप कभी -कभार वहाँ जाते हैं, सब्जियाँ लेने।’’ यह बताते हुए अब वह काफी खुश दिख रहा था।
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2-पुलिसिया टैक्स
किराना दुकान के सामने मनोहर बाबू काफी देर से खड़े थे। लेेकिन काउंटर पर खड़े खरीददार सामने से हटने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
यह देखकर सेठ जी ने उनसे पूछा-‘‘आपको क्या चाहिए सर! जल्दी बोलिए। पुलिसवाले आ गए तो गालियाँ तो देंगे ही। हरामखोर मारपीट करने से भी पीछे नहीं हटेंगे।’’
यह सुनते ही मनोहर बाबू ने पहले तो सहम कर अपने पीछे की ओर देखा। सचमुच कहीं पुलिस वाले आ तो नहीं धमके। फिर हड़बड़ाहट भरे स्वर में बोले-‘‘ सेठ जी! एक दस किलो वाला आटे का पैकेट दे दीजिए।’’
-‘यह रहा आपके आटे का पैकेट।’ यह कहते हुए एक नौकर ने पैकेट उनके सामने रख दिया।
-कितने पैसे हुए सेठी जी?
-चार सौ रुपए।
-आप बहुत अधिक माँग रहे हैं सेठ जी! आपकी दुकान से ही दो-चार पहले तीन सौ में मैं ही पैकेट ले गया था। दाम बहुत बढ़ गया है क्या? वह अचंभित से पूछने लगा।
-सर जी! मैंने कब कहा कि आपको नहीं दिया है मगर जब से चैराहों पर बेरियर लगा है और कोरोना के कारण शहरो से वाहनों के आवागमन पर रोक लगी है। पुलिसवालों के जैसे दिन फिर गए हैं। प्रत्येक माल लाने वाले वाहन से पाँच-दस हजार वसूल रहे हैं। बिना नकदी सें ऐंठें कोई वाहन मार्केट में घुसने ही नहीं देते।’’ फिर जरा रूक कर कहा-‘‘आखिर पुलिसिया टैक्स की भरपाई कैसे होगी मनोहर बाबू?’’
यह सुनते ही कुछ सोचकर उनकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया।
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3-काबिल लोग
‘‘रोजमर्रा की जिंदगी में मुसलमान अपना ज्यादा से ज्यादा वक्त मजहबी कामों में लगाएँ। मस्जिद में नमाज पढ़ें। औरतों और बच्चों को नमाज के लिए तैयार करें और दुनिया की तमामतर बुराइयों और बंद उनवानियों से दामन बचाकर सीधी-सादी जिन्दगी गुजारें।’’
ये तालीम देने की खातिर जमायतियों का एक समूह मस्जिद से निकला। तब उनके ही बच्चे ठीक मस्जिद के सामने मैदान में क्रिकेट खेलने में मशगूल थे। बाप ने उन्हें एक नजर देखा, मगर कुछ कहने की बजाय दूसरों को शिक्षित करने के लिए चल पड़े।
एक घर का दरवाजा खटखटाया गया तो एक बच्चे ने किसी के कुछ कहने से पहले ही बताया कि घर में अम्मी और बाजी के अलावा कोई नहीं है। यह सुनकर वे आगे बढ़े।
एक दूसरे घर का दरवाजा खुला तो एक नौजवान बाहर निकला सबके साथ दुआ -सलाम हुई। एक मौलाना सरीखे व्यक्ति ने शहजाद का हाथ अपने हाथों में लेते हुए, ‘‘देखो भाई! हम मुसलमान हैं और हमारा ईमान खुदा और उसके नबी पर है, जिनकी सुन्नतों को हम अपनी जिन्दगी में उतार लें तो दुनिया और आखिरत दोनों की संवर जाएगी। इसी के मुतल्लिक मस्जिद में नमाज के बाद बातें होंगी। अब आप भी हमारे साथ लें और ‘शामिल ए हाल रहें बड़ा नेकी का काम होगा।’’
शहजाद ने यह सुना। कुछ पल खामोश रहा, फिर उसने कहा, ‘‘बुजुर्गवार। आपसे कोई शिकायत नहीं, मगर नेकी कमाने का मतलब बगैर ये घर,घर नहीं लग रहा हम, ये सब बेच कर दूसरा घर ले लेंगे।’’
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4-खमियाजा
मिसेज सान्याल के दरवाजे के कॉलबेल की घंटी बजी और उनके दरवाजा खोलते ही नौकरानी कम्मो पर नजर पड़ी। वह गर्म होने लगीं-‘‘अरे! यह क्या तमाशा लगा रखा है कि एक सप्ताह से काम पर ही नहीं आ रही हो। अगर काम करने का मन न हो तो वह भी कह दो। मैं किसी और को रख लूँगी। ऐसी भी क्या आफत आ गई है कालोनी में नौकरानियों की जो ने मिले….।’’ यह कहते हुए मेमसाब ने आँखें तरेरीं।
कम्मो ने बिना किसी नाखुशी को प्रकट करते हुए मेमसाब से इतना भर कहा, ‘‘मेम साब उस दिन यहाँ से घर गई तो बेटी दामाद आए हुए थे। वह पेट से थी और उसे कुछ तकलीफ हो रही थी, जिसे दिखाने डाक्टरनी के पास गए तो उसने भर्ती कर लिया। आपको मैं क्या बताऊँ कि बेटी ने अपनी जैसी ही एक नन्ही- सी परी को जन्म दिया है ,वह इतनी सुन्दर है कि मैं आपको बता नहीं सकती…।’’ यह कहते हुए उसके चेहरे पर छलकती खुशी को मेमसाहब सहन नहीं कर पा रही थी। सो बोली, ‘‘अरे! इसमें इतराने की कौन सी बात है? लड़की ही हुई्र है न लड़का तो नहीं हुआ न? हमारे यहाँ तो खुशी लड़कों के जन्म पर मनाई जाती है….या फिर जब वह ब्याह कर बहू घर लाता है। समझी तू?’’ मेम साब ने उसकी खुशी पर पानी फेरने की कोशिश की।
लेकिन कम्मो के चेहरे की रंगत में तनिक भी अंतर नहीं आया। उनके चेहरे का रंग फीका पड़ने लगा। क्योंकि मेमसाब की बातें सुनकर उसने कहा था-‘‘मेम साब! हर कोई परिवार में केवल लड़के ही चाहेगा और हरेक स्त्री बेटा ही जनेगी तो वह ब्याह कर किसे लाएगा? गाय-भैेंसों को? यह आप क्यों नहीं सोचती कि समाज में यदि मर्दों की आवश्यकता है तो औरतों की तादाद भी उसी अनुपात में होनी चाहिए। मुझ से डाक्टरनी जी तो यही कह रही थी और वह गरीब जानकर भी मेरे मेहमान को बधाई दे रही थी कि उन्होंने पहली संतान बेटी होने के बावजूद पत्नी पर भ्रूण हत्या की लिए दबाव नहीं डाला। इतना ही नहीं उन्होंने हमें सरकार की ओर से मिलने वाली सुविधाओं की जानकारी भी दी। जिससे हमें उसकी परवरिश में मदद ही मिलेगी, फिर चिंता किस बात की मेम साब….।’’
कम्मों के मुँह से यह सब सुनकर उनका मन भारी हो उठा। वह अंदर से हिल सी गई। उसने मेमसाब को जैसे झिंझोड़ दिया था। उनकी पास तो किसी चीज की कोई कमी नहीं थी, यदि कमी थी तो एक बेटी की, जिसे उन्होंने पति की घोर आपत्ति के बावजूद जन्म नहीं लेने दिया था क्योंकि उन्हें लगता था कि उसके जन्म के बाद उन्हें ढेर सारा धन अनावश्यक रूप में व्यय करना पड़ेगा…जबकि वह स्वयं स्त्री थी।
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5-माँ
बहू ने बूढ़ी सास की ओर देखा और बड़बड़ाई-‘‘न जाने इस बुढ़िया से कब जान छूटेगी? बच्चों का खाना-पीना बैठकर घूरती रहती है।’’ सारा दिन सास ने उसके ‘ाब्द सुने और चुप ही रही। उसने बड़ी हसरत भरी नजरों से बहू की ओर देखा।
वह सोचती रही। एक वक्त ऐसा भी था कि वह अपने बच्चे को बुला-बुलाकर खाना खिलाती, उसे अच्छे से अच्छा कपड़ा सिलवाकर पहनने को देती। वह खा पी नहीं लेता तब तक खुद भी नहंी खाती….अहमद के लिए रोज नई-नई चीजें बनाती….ताकि उसका लल्ला आधे पेट ही खाकर न उठ जाए। तब उसके ‘ाौहर जिंदा थे।
आज वह अकेली थी। बहू अपने बच्चों को ठीक उसी तरह खिला पिलाकर लालन-पालन का दायित्व निर्वाह कर रही थी। बस फर्क इतना था कि वह भूल चुकी थी कि जिस कमरे की चैखट पर आज वह थकी-हारी बैठी है। एक दिन उसे भी ये दिन देखने हैं।
‘‘ले बुढ़िया खा ले और बस तू इतना याद रखना बहू कि आज तू जो कुछ है। मेरे बेटे की कमाई से ही है और एक दिन मैंने भी तेरी तरह ही अहमद की देखभाल की थी। जिसके दम पर तू इतराती फिर रही है मगर यह जवानी चार दिन से ज्यादा नहीं टिकने वाली…इसलिए बच्चों के सामने ऐसी बातें न कर, ताकि एक दिन तुझे भी मेरी तरह बुरे दिन देखने पड़े….और क्या कहूँ।’’ बहू ने सुना तो आवाक रह गई। लेकिन बूढ़ी माँ खुद को दिमागी तौर पर बहुत हल्का महसूस कर रही थी।
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