
रश्मि अपनी दो बरस की बिटिया को अपने से चिपकाकर, नजरें झुकाए, ऐसे सिमट कर बैठी थी मानो कोई अपराध कर के आई हो, जबकि उसी सूजी हुई आँखे और बाहों पर नील के निशान कुछ और ही कहानी सुना रहे थे…।
बाबा ज़मीन पर ऊकड़ू बैठे अपनी पगड़ी हाथ में लिया, विलाप कर रहे थे, ‘है भगवान, अब क्या होगा। अभी तीन बरस पहले ही तो जैसे तैसे सिर से बोझ उतारा था….’
भैया भी गुस्से में चक्कर काटते बुड़बुड़ा रहे थे, ‘ऐसे कैसे घर से निकाल देंगें..…वही तेरा घर है, अब तू उनकी ज़िम्मेदारी है….मैं जाकर उनसे बात करूँगा…’
माँ भी अपना राग आलापने में लगी हुई थी, ‘अरी तेरे तो भाग ही फूट गए…..अब क्या होगा तेरा..…छोरी और गले में बँध गई…..’
ये सब अपने-से लगने वाले लोग जाने कैसी अजीब सी बातें कर रहे थे, रश्मि का दिल बैठा जा रहा था और उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वो करे, तो क्या …और जाए, तो कहाँ!
अब तो बस रह सह कर भाभी ही बची थी, और वो ठहरी पराई जाई, भला वो क्या समझेगी उसकी पीर…..रश्मि की आँखों के आगे मायूसी और आशंका के बादल और गहराते जा रहे थे……तभी कमला भाभी तेज़ी से कमरे से निकली, रश्मि की गोद से मुन्नी को ले, बड़े प्यार से बोली, ‘चलो जीजी, अंदर चल के हाथ मुँह धोकर कुछ खा लो…..कितनी देर से बाहर बरामदे में बैठी हो….’
अम्मा ने खिसियानी सी आवाज़ में फिर अपना राग छेड़ा, ‘अरे, पढ़ाया,… लिखाया, ….घर के सब काम काज भी सिखाए, ….दहेज भी हैसियत से ज्यादा ही दिया…..फिर पता नहीं किस बात की कमी रह गई….’ विमला भाभी बीच में ही टोकते हुए, बड़ी कड़क आवाज़ में बोली, ‘ माँ जी, कमी इस बात की रह गई कि हम अपनी बेटियों को उनकी ज़िम्मेदारियाँ तो खूब सिखाते है , पर उन्हें यह बताना भूल जाते हैं कि उनके कुछ अधिकार भी हैं….!
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