जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: May 1, 2021

1-मरुभूमि का पेड़                           

एक दिन जंगल के पेड़ों ने प्रेतों के मुखिया से कहा,”आप और आपके साथी अक्सर हमारी टहनियों पर बसेरा करते हैं और जब जी चाहे, किसी और जंगल में चले जाते हैं। हम आपकी बातें सुनते हैं तो हमारा भी मन होता है कि हम भी नई जगहें देखें, मौज करें। आपके पास तो असीमित शैतानी शक्तियाँ हैं। हमें भी चल सकने की सामर्थ्य दे दें। एक ही जगह खड़े-खड़े हम बुरी तरह ऊब चुके हैं।”

प्रेतों के मुखिया ने कहा,”मैं पेड़ों को चल सकने की सामर्थ्य दे सकता हूँ, पर इस क्षमता को प्राप्त करने के बाद तुम देख सुन तो सकोगे, महसूस भी कर सकोगे, पर बोल नहीं पाओगे। और हाँ, जिस दिन किसी के मोह में पड़कर तुम्हारे चलते क़दम रुक गए, उसी समय तुम चलने की शक्ति खो दोगे।”

पेड़ो को जैसे ही चलने की सामर्थ्य हासिल हुई, वे लम्बी-लम्बी यात्राएँ करने लगे। जहाँ मन रम जाता, वहाँ बरसों खड़े रहते। मन नहीं लगता तो कहीं और चल देते। एक दिन एक किशोर पेड़ मरुभूमि में आ पहुँचा। चारों तरफ़ सुनहरी रेत थी और विरल झाड़ियाँ। उसे रेत का यह सुनहरा विस्तार भा गया और उसने वहीं रहने का फ़ैसला किया। वहाँ अक्सर आँधियाँ आतीं और पेड़ को झकझोर देतीं। पेड़ जवान हो रहा था, उसमें चुनौतियों का सामना करने का जज़्बा था। वह यह सोचकर गर्वित महसूस करता कि आँधियाँ उसे तोड़ने की कोशिश करती हैं और अंततः ख़ुद टूट जाती हैं।

एक किसान हर रोज़ उस पेड़ की छाया में आकर बैठता था। दरअसल यह मरुभूमि उस किसान का खेत थी। जिस साल बारिश होती, किसान अपने ऊँट के पीछे हल जोत देता। बाजरा हो जाता, फिर चना। उन दिनों किसान बहुत ख़ुश नज़र आता। उपजे हुए अन्न का कुछ हिस्सा वह पेड़ की जड़ में रखता, पर ऐसा कभी-कभी ही होता। प्रायः तो वहाँ अकाल ही पड़ते, पर किसान बिला नागा वहाँ रोज़ आता, मेघविहीन आकाश को ताकता रहता, दोपहरी में पेड़ के नीचे सोता, दोपहर बाद घर चला जाता। धीरे-धीरे पेड़ का मन उचाट होने लगा था, साहस भी कम हो रहा था। रोज़ आँधियों की मार से वह निढाल होने लगा था। अब उसका कहीं और चले जाने का मन होता, पर फिर सोचता यह किसान किस के साये में आग उगलते दिन काटेगा। इसका हौसला तो देखो, सालों-साल बारिश के इन्तज़ार में काट देता है। वह किसान को प्रणाम करता तथा कहीं और चले जाने का इरादा मुल्तवी कर देता।

एक दिन अभी दोपहर भी नहीं हुई थी कि ज़ोरदार आँधी आ गई। ऐसी आँधी पेड़ ने पहले कभी नहीं देखी थी। उस समय उसे ऐसा लगा कि आज उसका अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। किसान ने पेड़ को कसकर जकड़ रखा था। प्रलयंकारी आँधी जब रुकी तो पेड़ ने देखा, उसके सारे पत्ते झड़ चुके हैं और किसान उसकी जड़ के पास बेसुध पड़ा है। पेड़ के आँसू निकल आए। अब यहाँ रहने का क्या प्रयोजन- पेड़ ने सोचा। उसके पैर निकल आए। उसने दो ही क़दम उठाए थे कि उसे किसान की कराह सुनाई पड़ी। ओह, यह ज़िन्दा है, उसे बेइंतहा ख़ुशी हुई और उसके बढ़ते पाँव ठिठक गए। तब से पेड़ वहीं खड़ा है। किसान की कई पीढ़ियाँ उसी पेड़ की छाया में आसमान ताकती रही हैं, पेड़ उनपर छाया का छत्र तान देने का भरसक प्रयास करता रहा है। यह सिलसिला आज तक जारी है। पेड़ की दुआओं में किसान की सलामती और भरपूर बारिश की कामना हमेशा शामिल रहती है।

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2-बीसवाँ कोड़ा

‌         अपने पालतू सफ़ेद कबूतर का पीछा करते हुए राजकुमार कब छोटी रानी के महल में दाख़िल हो गया, उसे पता ही नहीं चला। रानी के महल में राजा के अलावा किसी परिंदे को भी घुसने की इजाज़त नहीं थी, पर यहाँ तो परिंदा ही नहीं, परिंदे का मालिक राजकुमार भी महल में घुस आया था।उस समय रानी वस्त्र बदल रही थी। राजकुमार को रानी के महल में घुसने का दोषी पाया गया। अब वह दोषी था तो सज़ा  मिलना भी तय था; लेकिन एक तो राजकुमार, ऊपर से नाबालिग! सो तय किया गया कि राजकुमार को प्रतीकात्मक सज़ा दी जाएगी। हूबहू राजकुमार जैसा रुई का एक पुतला बनाया गया और उस पुतले को बीस कोड़ों की सज़ा सुनाई गई। दरबार में सज़ा देने का सिलसिला आरम्भ हुआ। एक सिपाही जाता, एक कोड़ा मारता, फिर दूसरा जाता, दूसरा कोड़ा मारता। इस तरह उन्नीस कोड़े पूरे हो गए। इस बीच सारे तमाशे को देखता हुआ राजकुमार ख़ामोश बना रहा। कभी उसकी आँखों से कोई आँसू टपक जाता, तो कभी किसी को बहुत धीरे से कूड़ा मारने की रस्म पूरी करते देख उसे हँसी आ जाती। अब बीसवाँ कोड़ा बचा था ।एक सिपाही ने पुतले को कोड़ा मारा। पर यह क्या?पुतले पर कोड़ा पड़ते ही राजकुमार की चीख निकल गई और वह दर्द से बिलबिलाकर दोहरा हो गया। सारे दरबारी हैरान होकर देख रहे थे। राजकुमार की पीठ पर एक धारी थी, जिसमें से लहू रिस रहा था। वज़ीर कुछ देर ध्यान से देखता रहा। उसे सारा माज़रा समझ में आ चुका था । उसने उस सैनिक को बुलाया और गरज कर कहा, ” सज़ा के तौर पर कोड़ा मारना तुम्हारा कर्त्तव्य था, पर तुम्हारे मन में गहरा द्वेष भरा था । इसीलिये कोड़ा सीधे राजकुमार की पीठ पर पड़ा और उनकी पीठ पर इतना गहरा घाव हो गया । बताओ, राजकुमार से तुम्हारी क्या व्यक्तिगत शत्रुता है?जल्दी बोलो, वरना सर धड़ से अलग कर दिया जाएगा। सिपाही ने इधर-उधर देखा । सारे सिपाही सर झुकाए खड़े थे। उसने इत्मीनान से वज़ीर की आँखों में आँखें डालकर कहा,” मेरी राजधानी में युवाओं को बैल की जगह कोल्हू में जोता जाता है और जब कोई युवा कोल्हू को खींचते हुए बेदम होकर साँस लेने के लिए रुकता है तो उस पर कोड़े बरसाए जाते हैं। कोल्हू में जुतने वाले युवाओं में एक मेरा भी बेटा है। वह रोज़ शाम को जब घर आता है तो उसकी पीठ पर मैं धारियाँ देखता हूँ जिनमें से लहू रिस रहा होता है ।आज जब मैंने राजकुमार के पुतले पर कोड़ा बरसाया तो बरबस मुझे अपने बेटे की पीठ याद आ गई थी।”

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3-आग

उन दोनों को बस्तियों में आग लगाने का काम सौंपा गया था। पहले के हाथ में आग से भरी बाल्टी थी, दूसरे के हाथ ख़ाली थे। पहले ने दूसरे से पूछा,”तुम्हारी आग कहाँ है, आग के बिना बस्ती कैसे जलाओगे?”

“मेरी आग मेरे मुँह में है। ज़रूरत पड़ने पर निकाल लूँगा।”

पहला हँसा, दूसरा भी हँसा। दोनों विपरीत दिशाओं में मुड़ गए। शाम को दोनों आक़ा के दरबार में मौजूद थे। पहले ने चार बस्तियाँ जलाई थीं, दूसरे ने चालीस। पहला ज़ाहिर है, हैरान था और हताश भी। लगातार आग का सेंक सहने पर भी वह दूसरे के मुक़ाबले बहुत पिछड़ गया था। निश्चय ही दूसरे का क़द आक़ा की नज़र में बढ़ गया होगा। मायूस पहले ने आक़ा से कहा,”मैंने पूरी मेहनत की पर कामयाबी बहुत कम मिली। भविष्य में मैं भी मुँह की आग से काम लूंगा।”

आक़ा ने हँसते हुए कहा,”ठीक है,ज़रा मुँह से आग निकाल कर दिखाओ।” पहले ने कई बार कोशिश की, पर कामयाब नही हुआ। वह मायूस हो गया। आक़ा उसे गले लगाते हुए बोला,” मुँह की आग को तुम हमारे लिए रहने दो। तुम बहुत कर्मठ हो। तुम्हारा योगदान दूसरे से ज़रा सा भी कम नहीं। मुँह में आग रख पाना सबके बस की बात नहीं है। मुँह की आग और हाथ की आग एक दूसरे की पूरक हैं। जब तक इन दोनों में गठबंधन है, तभी तक खेल है। तुम्हें सोच समझकर ही ज़िम्मेदारी दी गई है। समझे? अब जाओ, अगली ड्यूटी वक्त आने पर बता दी जाएगी।”

वह सब कुछ समझ गया था। उसने मुस्कुराते हुए आक़ा को प्रणाम किया, दूसरे ने भी ऐसा ही किया। दोनों एक दूसरे के हाथ में हाथ डालकर बाहर आ गए।

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4-तुझे तो लड़ना भी नहीं आता

दोनों भाइयों के घर अलग-अलग थे, पर ज़मीन अभी साँझे में चली आ रही थी। बड़ा भाई मस्तमौला था। उसे घुमक्कड़ी का शौक़ था या फिर ज़्यादातर समय गाँव तथा पंचायत के मसलों में उलझा रहता था, इसलिए ज़मीन का काम छोटा ही देखता था। पिछले कई सालों से वे लोग ज़मीन ठेके पर दे रहे थे। बड़े भाई को हर साल यह शिकायत रहती कि ज़मीन का ठेका कम मिला है। हर साल वह अपनी आपत्ति छोटे के सामने दर्ज कराता, पर हर आने वाले साल छोटा ही ज़मीन का फ़ैसला करता।

पिछले साल ज़मीन ठेके पर लेने वाले रामसरूप को मौसम की प्रतिकूलता की वजह से काफ़ी नुक़सान उठाना पड़ा था, सो इस बार छोटे ने उसे ज़मीन पिछले साल के मुक़ाबले पाँच हज़ार रुपये प्रति एकड़ कम में दे दी, जबकि गाँव के अन्य लोगों ने पिछले साल की अपेक्षा हज़ार-दो हज़ार फ़ालतू दाम पर ज़मीन ठेके पर चढ़ाई थी। पता चलने पर बड़ा आगबबूला हो गया। गालियों की बारिश के साथ उसने छोटे के घर में प्रवेश करते ही उसे ललकार दिया, “बड़ा दानवीर कर्ण बना फिरता है तू… लोगों का भला ही करना है तो बेच दे अपने हिस्से की ज़मीन और बाँट दे पैसे ग़रीबों में… तूने समझा क्या है अपने आप को… मैं तो अपने हिस्से के पूरे पैसे लूँगा, गाँव के रेट के हिसाब से… बड़ा आया सत्यवादी हरिश्चंद्र… हुँह…” बड़ा बोले जा रहा था ऊलजुलूल। छोटे ने कहा, “बैठो भाई साहब, बात करते हैं। आपकी सारी गालियाँ सिर माथे, मेरे तो बाप की जगह हो आप।” उसने बेटी को आवाज़ दी, “ताऊ जी के लिए पानी ला, चाय भी चढ़ा दे। कल तू ताऊ जी के घर लड्डू देकर आई थी न, वो तेरे ताऊ ने खाए थोड़े ही होंगे। वो भी ले आ, लड्डू इनको पसंद भी तो बहुत हैं।”

थोड़ी देर बाद चाय और लड्डू मेज़ पर थे और बड़े की बहुत प्यारी सी भतीजी उससे लड्डू खाने का इसरार कर रही थी। बड़ा अब भी बड़बड़ाए जा रहा था। छोटे ने कहा, “चाय पियो भाई साहब, लड्डू खाओ, लड़ तो बाद में भी लेंगे।” इस बीच भतीजी ने लाड़ में एक लड्डू अपने ताऊ के मुँह में डाल दिया।

खा-पीकर जब बड़ा उठा तो छोटे के कंधे पर हाथ धर कर कहा, “जा ओए छोटे, तुझे तो लड़ना भी नहीं आता, सारा मूड चौपट कर दिया।” बार बार सिर झटकता और आँखें मसलता बड़ा छोटे की चौखट पार कर गया।

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5-ख़ून और पानी

(निकट भविष्य में संभावित यथार्थ की कथा)

थाने में पकड़ कर लाए गए आदमी का अपराध यह था कि उसने एक ही बार में एक पूरा गिलास पानी पी लिया था, जबकि क़ानूनन हर आदमी को पूरे दिन में चार बार आधा-आधा गिलास पानी पीने की अनुमति थी। सज़ा सम्बन्धी प्रावधान स्पष्ट थे। थानेदार ने सिपाही से कहा, “ले जाओ इसे और इसका एक गिलास ख़ून निकाल लो।”

उस आदमी ने झुककर थानेदार के चरण पकड़ लिये और बड़े करुण स्वर में गिड़गिड़ाया, “थानेदार साहब, दो गिलास ख़ून निकाल लीजिए, पर मेहरबानी करके एक गिलास पानी और पिला दीजिए।”

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6-भेड़

चरवाहा भेड़ों को हाँककर बाड़े में ले जा रहा था। उसने देखा कि एक भेड़ क़ाफ़िले के साथ नहीं चल रही है, बल्कि एक जगह खड़ी आसमान को ताक रही है। चरवाहे ने उसकी पीठ पर लाठी जमाई। भेड़ थोड़ी बिलबिलाई, पर हिली नहीं। फिर तो चरवाहे ने एक के बाद एक कई लाठियाँ उसकी पीठ पर बरसा दीं। भेड़ की देह पर कई जगह ख़ून छलछला आया, पर वह अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई। चरवाहे ने लाठी एक तरफ़ रखी और ज़मीन पर बैठ गया। वह गहरी चिंता में डूबा था। उसे चिंता इस बात की नहीं थी कि उसके रेवड़ में एक भेड़ कम हो जाएगी। उसके पास हज़ारों भेड़ें थीं, एक के कम हो जाने से क्या फ़र्क़ पड़ता? उसे तो चिंता इस बात की थी कि इस भेड़ की देखा-देखी बाक़ी भेड़ों ने भी भेड़ होने से इनकार कर दिया तो…

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 7-दंगे

“दंगों की जाँच में अब तक क्या निकला?”

“अब तक पचास लोगों को हिरासत में लिया गया है सर।”

“कौन हैं ये लोग, किस दल से जुड़े हैं?”

“सैंतालीस तो आपके दल से या आपके किसी संगठन से जुड़े हैं। इनके पास बंदूकें, तलवारें और बम बरामद हुए हैं। तीन लोग विपक्षी दल से जुड़े हैं। इनके पास लाठियाँ और पत्थर पाए गए हैं।”

“ये पत्थरबाज़ समाज के बहुत बड़े दुश्मन हैं। देखिए, इनको किसी भी हाल में बचना नहीं चाहिए।”

“नहीं बचेंगे सर!”

“और यह जो आप कह रहे हैं, सैंतालीस लोग हमारे किसी संगठन से जुड़े हैं… कोई ग़लती तो नहीं हुई आपसे? हमारे लोग ऐसा कर नहीं सकते।”

“मुझे भी ऐसा लगता है सर! इसीलिए मैंने फिर से गहन जाँच के आदेश दिए हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि ये लोग निर्दोष साबित होंगे।”

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परिचय

जन्म : नवम्बर, 1958

जन्म स्थान : गाँव बिज्जुवाली, जिला-सिरसा (हरियाणा)

शिक्षा : एम.ए. (हिंदी ), एम.फिल.।

प्रकाशन : पाँच कविता -संग्रह ‘कोई अच्छी ख़बर लिखना ‘, ‘कुंभ में छूटी औरतें ‘, ‘ इसी आकाश में ‘, ‘ जहाँ कोई सरहद न हो ‘, ‘इन्तज़ार की उम्र’; एक कहानी संग्रह ‘हमकूं मिल्या जियावनहारा’। सारिका, जनसत्ता, हंस, कथादेश, वागर्थ, रेतपथ, अक्सर, जतन, कथासमय, दैनिक भास्कर, दैनिक,ट्रिब्यून, हरिगंधा आदि में रचनाएँ प्रकाशित। कुछ साझा संकलनों में रचनाएँ ।

पुरस्कार/सम्मान : एक बार कहानी तथा एक बार लघुकथा के लिए कथादेश द्वारा पुरस्कृत । कविता संग्रह ‘ कुंभ में छूटी औरतें ‘ को वर्ष 2011-12 के लिए तथा कविता संग्रह ‘ इसी आकाश में’ को 2016-17 के लिए हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कृति सम्मान ।

सम्प्रति : राजकीय महिला महाविद्यालय, रतिया से बतौर प्राचार्य सेवानिवृत्ति के बाद स्वतंत्र लेखन ।

सम्पर्क :406, सेक्टर-20, हुडा, सिरसा-125055 (हरियाणा )

मो, :+91-9354545440

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    सुकेश साहनी

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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

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