जून 2026

भाषान्तरआज़ादी     Posted: July 1, 2021

गढ़वाली अनुवाद डॉ. कविता भट्ट

 साक्यों की जग्वाळ क बाद बिगणति की ब्वेयों की खुकली सुन्न हूणा, बिगणति स्वागवंत्यों सि इन्द्रधनुस रुठणा क बाद कुज्याणि कथगा बिना ईदा का रोजों का बाद आखिर वा ऐ ई ग्याई। भादौं की कृष्ण पक्ष की अंध्यारी रात माँ वींका सत्कार माँ माणा जून अर सुर्ज अफुई भ्वीं माँ ऐ गे होन। सपेद कपड़ों, जैका चमकदा जुत्तौं पर सैत ई कब्बी बि माटा रिगस बि लगि हो, उ ढोल-बाजणौं की आगास तलक जाँदी अवाजू दगड़ी ‘वीं‘ पालखि परैं बैठाळी जुलूसै सकल माँ नाचदू-झुमदु जन्नी चौबाटा तकै पौंछिन त अचाणचक ‘वींकी‘ नजर बैं तर्फां गै। घनघोर अंध्यारा माँ कुजाणी कथगा बरसु बिटी बाटू हेन्नी बिगणती आँख्यों की आस का द्यूओं माँ बग्वाळ ह्वे ग्याई। ‘वींन‘ मयाळी आँख्योंन ऊँ लोखु की तर्फां देखी अर पालखि बिटी भ्वीं उतरी तैं जन्नी वे रस्ता माँ खुट्टु धारी त ढोल-बाजणौं कि अवाज बन्द ह्वे ग्याई। भैरा महौल माँ एक डरौंण्या सन्नाटु पसरी गे।

 ‘‘यू क्य? तुम कख छाँ जाणा?‘‘ एक सपेद कपड़ों वळा का माथा परैं लकीर पड़ि गेन।

 ‘‘कख…? , जौं लोखुन साक्यों तक तप करी, जौं का बड़ा तप माँ तपिक मैं यख ऐयों। अपड़ा ऊँ ई चाँदारौं का बीच छौं जाणू।” वींन खुस ह्वेकि विस्वासा क दगड़ा बोली।

 वीं का इरादौं भाँपि कि हत्थ जोड़िक सपेद कपड़ौं वळू बुड्या न अगनै बडी अर अंध्यारा माँ खड़ा लोखु तैं धै लगै कि ठंडा स्वर माँ बोलि, ‘‘ भै-बैण्यों! आजौ कु सुबदिन तुम सब्बु की कुर्बान्यों कु फल च अर याँ पर तुम सबुकु ई अधिकार च। पर मेरी एक हथजुड़ै च…।”

वेन गौळु खंकारी तैं फीर बोली, ‘‘यु आजी ऐंन। जन कि तुम सब्बी जणदा छाँ कि तुमरी तर्फां अंध्यारु भौत घनघोर च। आज रात हमू तैं यूँ कि सेवा कु मौका द्यावा। द्वी पौरै की बात त च, सुबेर होंदु ई जन्नी सुर्जै कि पैली किर्ण आली तन्नी मैं अफी ईं तैं तुमु तैं सौंपी द्योलु। तब तकैं तुम ईं का स्वागतै कि तैयारी करि ल्यावा।” वूँ लोखु न हुंगारा माँ मुंड हलकायी अर आस भर्यां आँखोंन चुप सैमति तैं पढ़िक वा बिमन सि पालखि की तर्फां बढ़ण लगि गे। सपेद कपड़ौं वळा मत्था पर लकीरी सपाट ह्वे गेन अर ओंटु पर ऐबी सी मुल्ल-मुल्ल हैंसी फैलि गे। वेन अपड़ा सपेद कपड़ौं वळा दगड़ियों तैं सनकाई…..ढोल-बाजणा हात्यों की तरौं जोर-जोर से चिंघाण लै गेन। ‘वीं का’ फीर सि पालखि माँ बैठदु ई सपेद कपड़ौं वळा, उल्याळी पक्की सड़का बाठा उल्याळा वळी इमारतु कि तर्फां बढ़ि गेनी। 

…..अर वु सब्बी लोग आज बि अँध्यारु खतम हूण जग्वाळा छन।” वींन खुस ह्वेकि विस्वासा क दगड़ा बोली।

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