
साहित्य में एक समालोचक का कार्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण व जिम्मेदारी पूर्ण होता है।किसी भी लेखक की रचना के संदर्भ में समालोचक को तटस्थ भाव से , अपने व्यक्तिगत संबंध को दरकिनार करके रचना पर समग्र मूल्यांकन निरपेक्ष भाव से करना होता है। लघुकथा विधा में मैंने जिन दो रचनाओं का चयन किया है उनके लेखक लेखनी की गंभीरता से अपनी एक विशिष्ट पहचान रखते हैं। इनमें प्रथम लघुकथा चंद्रेश छतलानी की ‘खोटा सिक्का’, दूसरी मेघा राठी की तमाशा बंद हो गया है।
‘खोटा सिक्का’ लघुकथा का विषय व्यापक है । यह आपने आप में अनूठी कथा है।यह कथा स्त्री विमर्श के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी प्रेरित कर रही । स्त्री और वसुंधरा की तुलना वैसे तो अनेक रचनाओं में की गई है; किन्तु जिस प्रकार इस कथा में तुलना हुई है, वह प्रशंसा योग्य है।
लघुकथा में फिक्शन के अनूठे प्रयोग से प्रचलित कथानक अपने सौंदर्य को प्रदर्शित करने में सफल हुआ है।बिम्ब और प्रतीकों के माध्यम से रचना का शिल्प निखर गया है।
प्रदूषण के कारण पृथ्वी रोगी हो गई है, लेकिन हम अब भी सजग नहीं है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई व घटते जल -स्तर के कारण पृथ्वी पर जीवन.कैसा होगा इसका अंदाजा कोई भी लगा सकता है; किन्तु वर्तमान को सँवारने के लोभ में मनुष्य अपने भविष्य को ज़हर के कुंड में धकेल रहा है।
लेखक ने अपनी रचना के माध्यम से चेतावनी दी है कि यदि हम अब भी न सँभले तो विनाश तय है। लघुकथा में कथ्य एक अति आवश्यक घटक है।यदि कथ्य कमजोर हो तो कथानक का सम्प्रेषण प्रभावित होता है।हालाँकि कथा का शीर्षक साधारण लगा। अगर हम इसके कथ्य की बात करें तो ,’खोटा सिक्का’.का कथ्य प्रभावी है और लेखन के सौंदर्य शास्त्र से परिपूर्ण है।कथा की अंतिम पंक्ति में एक कटाक्ष है ,जो हमें भविष्य का आईना दिखा रहा है।
भाषा की बात करूँ तो लेखक की भाषा समृद्ध है।इसके संवाद और तीक्ष्ण हो सकते थे।फिर भी मेरा विचार है कि इस प्रकार और भी कथाएँ वर्तमान पीढ़ी के लिए लिखी जाएँ, ताकि वह समस्या की गहराई को समझ सकें व अपने भविष्य को सँवारने के लिए कुछ सबक ऐसी कथाओं के माध्यम से ले।
इस कथा का तीक्ष्णता के साथ प्रस्तुतीकरण व इसकी शैली प्रभावित करती है।यह कथा स्त्री -विमर्श पर लिखी गई है। लड़की की शादी होते ही उसके ऊपर जिम्मेदारियाँ लाद दी जाती हैं।एक अल्हड़ लड़की शादी के तुरंत बाद किस प्रकार अपनी इच्छाओं व पसंद को त्यागकर दूसरे के हाथ की कठपुतली बन जाती है,उससे कोई अनजान नहीं है। मदारी प्रतीक है सास का, जो अपने इशारे पर बहू को नचाती रहती है और अपने बेटे को किस प्रकार बहू पर अत्याचार करने के लिए उकसाती है यह कथा में बंदर के खेल के माध्यम से दिखाया। अत्याचार को सहते- सहते आखिर बन्नो विद्रोह कर देती है और सास और पति को सबक सीखा देती है।
यूँ तो यह एक सामान्य विषय है, जिस पर किसी न किसी रूप में लिखा गया है ; लेकिन लेखिका ने जिस प्रकार इसे सम्प्रेषित किया है, वह काबिले-गौर है।
बंदर का तमाशा हम सबने देखा है और खूब तालियां भी बजाई हैं; लेकिन लेखिका ने इस तमाशे को गहनता से अवलोकित कर अपने मस्तिष्क में इस कथा को बुना है। कथ्य कसा हुआ है और शिल्प उत्तम है।प्रतीक इस कथा की विशेषता है।सफल लघुकथा का उद्देश्य समाज में व्याप्त विसंगति को उभार कर सार्थक संदेश प्रेषित करना होता है , जिसमें यह कथा सफल हुई है।
इस कथा में व्यंग्य परोक्ष रूप में सम्मिलित है, जो सरला के संवाद में दिखाई दे रहा है। वह कहती है कि शर्म नहीं आती पड़ोसियों के सामने मुझे नचाते हुए।
मतलब साफ है कि दूसरों के घरों में क्या हो रहा है , यह जानने की ललक हमारे मन के कपट के राज खोल देती है।
मैंने इन दोनों कथाओं पर गहराई से मनन किया और अनुभव किया कि किसी भी साधारण विषय को जब भी लेखक अपने कथा का विषय बनाता है तो वह विषय पाठकों के सामने किस प्रकार विशिष्ट बना कर प्रस्तुत करता है ,यह उसके लेखन- कौशल के साथ विधा के प्रति गंभीरता, तथ्यात्मक अनुभव को प्रस्तुत करने की कला में निपुण होना भी आवश्यक है।खोटा सिक्का में प्रदूषण की भयावहता को दर्शाने के लिए महाभारत के द्रौपदी को दाँव लगाने वाले प्रसंग को सोचना तथा इसके साथ ही पृथ्वी के माध्यम से स्त्री की पीड़ा को प्रदर्शित करना,यह लेखक के सम्प्रेषण की कुशलता का उदाहरण है।
इसी प्रकार तमाशा बंद हो गया कहने को घरेलू हिंसा और महिला उत्पीड़न की कथा है; लेकिन इस कथा को लिखने के लिए मदारी के खेल को माध्यम बनाना ही इसे अन्य कथाओं से अलग कर रहा है।
कथाएँ और उनके किरदार हमारे चारों तरफ उपस्थित है। उनके अंतर्मन की पीड़ा, हर्ष, आदि भावों को समझने के लिए लेखक दृष्टिकोण को व्यापक करने की आवश्यकता है। प्रश्न के उत्तर सभी तलाशते हैं ,लेकिन जरूरत है हर उत्तर में निहित प्रश्न को तलाशने की।
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1-खोटा सिक्का-चन्द्रेश छतलानी
“ये लो! मैं बुध ग्रह को जीत गया।” उस सितारे की तीव्र तरंगदैर्ध्य वाली खुशी से भरपूर ध्वनि से आसपास की आकाशगंगाएं गुंजायमान हो उठीं।
सूदूर अंतरिक्ष में, जहाँ समय और विस्तार अनंत हैं, चार सितारे अपने ही प्रकार का जुआ खेल रहे थे। दांव पर लग रहे थे, उनके सौरमंडल के विभिन्न छोटे-बड़े ग्रह, उपग्रह, उल्कापिंड आदि। मनुष्यों से प्रेरित हो हमारा सूर्य भी उनमें से एक था। हालांकि उस समय उसका समय सही नहीं था। वह लगातार हार रहा था।
शनि के वलय, मंगल का सबसे ऊंचा पर्वत, बृहस्पति का एक चन्द्रमा हारने के बाद उसने कुछ बड़ा जीतने की उम्मीद में बुध को दांव पर लगा दिया। लेकिन जब समय साथ नहीं देता तो बड़े से बड़े ऊर्जावान का सक्रीय मस्तिष्क भी वक्रीय हो जाता है और खेल-खेल में ही दूसरे सितारे ने बुध को भी जीत लिया।
बुध को अब हमारे सौरमंडल को छोड़ कर कहीं और जाना था। सूर्य के लिए अपने सबसे छोटे पुत्र का यह बिछोह असहनीय था। उसने बुध को फिर से पाने के लिए अपनी बेटी धरती को दाँव पर लगा दिया।
धरती यह देख-सुनकर काँप- सी गई। खेल रहे बाकी तीन सितारों ने भी धरती पर दृष्टि डाली, एक-दूसरे से इशारों में बात की और फिर एकमत होकर सूर्य को धरती को दाँव पर लगाने से मना कर दिया।
चौंधते हुए सूर्य ने चौंकते हुए कारण पूछा तो उनमें से एक ने टिमटिमाते हुए कहा, “पिछली बार जब देखा था, तब तो नीले रंग की धरती बहुत सुंदर थी; लेकिन अब इसमें वो बात नहीं रही। यह काली होती जा रही है। खनिज तो क्या हवा भी ज़हरीली है, जल भी गंदा हो चुका है। खाद्यान्न भी विषाक्त! ऐसी खोटी धरती दाँव पर लगने लायक है ही नहीं।”
सूर्य धरती को दाँव पर नहीं लगा सका।
और धरती ने सौर वायु से चैन की साँस लेते हुए मानवों का शुक्र अदा किया।
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2-तमाशा बंद हो गया / मेघा राठी
” डुग -डुग – डुग, साहेबान अब ये बंदरिया , नहीं- नहीं बन्नो! सबको चाय बना कर पिलाएगी। “, डमरू बजाते मदारी के इतना कहते ही बन्नो ने फटाफट रसोई में जाकर गैस स्टोव जलाया और चाय बना कर सबको दी। सब खिलखिला रहे थे कि मदारी ने बंदरिया की रस्सी को पकड़कर हिलाया और कहा,” बन्नो फ़िल्म देखने जाएगी?” बंदरिया ने गर्दन हिलाकर हामी भरी।
” किसके साथ? क्या कहा? पास आकर कह।”
बंदरिया ने मदारी के कान में कुछ कहा।
” बोलती है सहेली के साथ जाएगी। बन्ने को टाइम नहीं इसलिए। अकेले नहीं जाएगी, बन्ना कहेगा तभी जाएगी।”
बंदरिया ने न में सिर हिलाया।
” बन्ने देख, ये मना कर रही है!”, मदारी के पीछे से बंदर सामने आया और बंदरिया के एक डंडा मारकर दाँत दिखाकर गुस्सा करने लगा । भीड़ ताली बजाने लगी।बन्नो सहम कर एक कोने में खड़ी हो गई।
” बस- बस ये समझ गई है, अब नहीं करेगी। तू जा कर अपना काम कर बन्ने।बन्नो मेहमान आ रहे हैं शाम को, क्या – क्या बनाओगी?”, मदारी ने बंदरिया की रस्सी थोड़ी ढीली छोड़ते हुए पूछा। जबाब में बंदरिया रसोई में जाकर कुछ बनाने लगी । थोड़ी देर में प्लेट सजाकर मदारी के पास लाई।
” क्या- क्या लाई हो बनाकर! बन्ने आ जा तू भी खा ले।” बंदर मदारी के पास बैठ कर खाने लगा मगर दो कौर खाते ही उसने खाना थूक दिया और डंडा उठाकर बंदरिया के पीछे भाग कर गुस्सा दिखाने लगा। बंदरिया मदारी के पीछे छिपने लगी मगर मदारी ने रस्सी कस कर उसे अपने सामने कर लिया।
” क्या हो गया बन्ने? इतना गुस्सा क्यों?”
बंदर ने कुछ चीखते हुए कहा।
” अच्छा- अच्छा ,नमक तेज हो गया। “, बंदरिया को एक चपत लगाकर मदारी ने तेज आवाज में कहा ” आगे से मत भूलना, नहीं तो बहुत पिटेगी।
बंदर ने गुस्से में आगे आकर फिर कुछ कहा।
” अरे, ये बन्ना क्या कहता है तू कपड़े सुखाने के बहाने छत पे किसी को देखती है। किसे देखती है?”, मदारी ने डंडा दिखाकर पूछा। डंडा देखकर बन्नो का स्वाभिमान जाग उठा और वह अपने असली रूप सरला के किरदार में आ गई।
” बस करो, मुझे नचाना। रोज पड़ोसियों के सामने मेरा तमाशा बनाते शर्म नहीं आती!”, सरला ने अचानक अपने गले मे बंधी रस्सी फेंकते हुए कहा ,” रिश्ते निभाने के नाम पर अब बंदरिया बन कर नहीं नाचूंगी मैं।
माँ- बेटे सरला के इस रूप को देख कर चुपचाप सोफे में धंस गये । तमाशा देखने वाली भीड़ भी धीरे- धीरे गुम होती चली गई।